
राजस्थान के कई परिवारों के लिए शिक्षा क़ानून एक बड़ी राहत साबित हो सकता है
राजस्थान ने शिक्षा के क्षेत्र में तरक्की तो बहुत की है लेकिन आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए अब भी शिक्षा दूर की कौड़ी है.
राज्य की राजधानी जयपुर में ही ऐसे अनेक बच्चे हैं जिनकी स्थिति ऐसी है कि अ- आया नहीं कि क- कमाने चलो.
हालाँकि शिक्षा का अधिकार क़ानून को शिक्षाविद बहुत उम्मीद के साथ देख रहे है पर साथ-साथ उन्हें संदेह है कि इसे ठीक से लागू किया भी जायेगा या नहीं.
राजस्थान विश्वविद्यालय सिंडीकेट के पूर्व सदस्य प्रकाश चतुर्वेदी कहते हैं, वो शक्तियां बहुत प्रबल हैं जो निर्धन भारत को अनपढ़ ही देखना चाहती हैं.
बीबीसी विशेष
भारत सरकार हाल ही में सभी को मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक ले कर आई है लेकिन क्या ये आसानी से लागू होगा. ज़मीनी सच्चाई को खोजने की कोशिश कर रहे हैं विभिन्न बीबीसी संवाददाता. पढ़िए, तीसरी कड़ी राजस्थान से ...
देश में शिक्षा का अधिकार क़ानून को लेकर नीति निर्माता एक मोहक तस्वीर पेश कर रहे हैं मगर क्या 11 साल के रामू के लिए ये क़ानून कोई बड़ा बदलाव लेकर आएगा या उसे हर रोज़ अपने पिता की वाहनों के पंक्चर ठीक करने की दुकान पर जाते रहना पड़ेगा.
जयपुर में फुटपाथ पर अपने पिता रमेश शर्मा के काम में हाथ बंटाते रामू की हसरत तो डॉक्टर बनने की है मगर हालात ने उसे फुटपाथ पर ला बैठाया है.
कुछ समय स्कूल गया भी, मगर अब तो पापा के साथ ही काम करता हूँ. हाँ, अगर अवसर मिला तो फिर से पढ़ना चाहूँगा
रामू, स्कूल छोड़ चुका एक बच्चा
वो हमारे सवाल पर कि स्कूल क्यों नहीं जाते, कहता है, ''कुछ समय स्कूल गया भी, मगर अब तो पापा के साथ ही काम करता हूँ. हाँ, अगर अवसर मिला तो फिर से पढ़ना चाहूँगा."
राज्य के दौसा ज़िले में एक गांव से रोजी-रोटी के लिए जयपुर आये रमेश कहते हैं, मेरे दो बेटे ज़रूर स्कूल जाते हैं मगर रामू को नहीं पढ़ा पाया.
वो कभी सरकारी स्कूल की बदइंतज़ामी को दोष देते है तो कभी हालत को. कहने लगे, "रामू को यहाँ स्कूल भेजा मगर पढ़ाई तो होती नहीं. एक दो बार मैंने इसे भी फटकारा मगर इसे क्या दोष दूँ, स्कूलों में टीचर पढ़ाते ही नहीं."
क्या बदलेगी तस्वीर..
इन पिता पुत्र को नहीं मालूम की देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद ऐसा कोई चमत्कारी क़ानून बना रही है जो रामू जैसे बच्चों का भाग्य सवांरने की इबारत लिखना चाहता है.
अभी पूरी जानकारी जुटा रहे हैं. क़ानून बना ही है. थोड़ा इंतज़ार करिए. हर माँ-बाप की ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा पढ़े, हम इस ख्वाहिश को पूरा करने का काम करेंगे
भंवरलाल मेघवाल, शिक्षामंत्री-राजस्थान
शिक्षाविद प्रकाश चतुर्वेदी कहते हैं, "मुझे तो लगता है ये क़ानून देश का भाग्य बनाने का एक बहुत समर्थ साधन होगा क्योंकि ये देश के 19 करोड़,50 लाख बच्चों को, जिन्हें नहीं मालूम की तालीम क्या होती है, उनका भविष्य संवार सकता है."
वो कहते हैं, "अगर उन्हें सक्षम बनाया जाए तो भारत में बहुत बड़ी बात होगी. मुझे नहीं मालूम कि सरकारें कितनी ईमानदारी से इसे लागू करेंगी लेकिन इसे लागू किया गया तो भरी गुणात्मक परिवर्तन आएगा."
भौगोलिक पैमाने से राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है. राज्य में 51 हज़ार,724 प्राथमिक विद्यालय और 50 हज़ार उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं. छह से 11 साल के नामांकित विद्यार्थियों की संख्या क़रीब 47 लाख और 11 से 14 वर्ष के बच्चों की तादाद लगभग 12 लाख,51 हज़ार नामांकित है.
मुझे तो लगता है ये क़ानून देश का भाग्य बनाने का एक बहुत समर्थ साधन होगा क्योंकि ये देश के 19 करोड़,50 लाख बच्चों को, जिन्हें नहीं मालूम की तालीम क्या होती है, उनका भविष्य संवार सकता है
शिक्षाविद प्रकाश चतुर्वेदी
राजस्थान में साक्षरता 65 प्रतिशत है. महिला शिक्षा में राजस्थान ने ख़ासी तरक्की की है. 1951 में यह महज तीन फीसदी थी, अब महिला साक्षरता 44.34 प्रतिशत है.
राजस्थान के शिक्षामंत्री भंवरलाल मेघवाल कहते हैं कि राज्य सरकार ये सुनिश्चित करेगी कि कोई बिना पढ़े ना रहे. उन्होंने कहा, ''अभी पूरी जानकारी जुटा रहे हैं. क़ानून बना ही है. थोड़ा इंतज़ार करिए. हर माँ-बाप की ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा पढ़े, हम इस ख्वाहिश को पूरा करने का काम करेंगे."
पर क्या निजी स्कूल इसके लिए तैयार होंगे, इसपर शिक्षामंत्री कहते हैं, अगर उनको अपनी मान्यता बरक़रार रखनी है तो वंचित बच्चों को पढ़ने का मौका देना ही होगा.















