मुठभेड़ की रिपोर्ट पर उठे सवाल

बाटला हाउस

बाटला हाउस मुठभेड़ में दो छात्र मारे गए थे जिन्हें पुलिस चरमपंथी मानती है

दिल्ली में विवादास्पद जामिया नगर मुठभेड़ मामले में दिल्ली पुलिस को 'क्लीन चिट' दिए जाने पर जामिया टीचर्स सॉलिडेरिटी ग्रुप ने अनेक सवाल उठाए हैं.

बुधवार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने पुलिस को क्लीन चिट देते हुए ये रिपोर्ट दी थी. जामिया टीचर्स सॉलिडेरिटी ग्रुप ने इस रिपोर्ट के आधार पर सवाल उठाए हैं.

जामिया टीचर्स सॉलिडेरिटी ग्रुप जामिया विश्वविद्यालय के छात्रों को क़ानूनी मदद उपलब्ध कराता है और उसने इस मामले में बार-बार प्रदर्शन किए थे और निष्पक्ष जाँच की माँग भी की थी.

इस ग्रुप की अध्यक्ष मनीषा सेठी ने बीबीसी संवाददादाता फ़ैसल मोहम्मद अली के साथ बातचीत में इस मामले में आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं.

बुधवार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पिछले साल 19 सितंबर को दिल्ली के जामिया नगर में हुई मुठभेड़ के बारे में कहा कि दिल्ली पुलिस की ओर से मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं हुआ.

इस मुठभेड़ में जामिया विश्वविद्यालय के दो छात्र मारे गए थे और पुलिस का आरोप था कि वे दोनों चरमपंथी गतिविधियों में लिप्त थे. इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर मोहनचंद शर्मा मारे गए थे.

स्थानीय लोगों और कई ग़ैर सरकारी संगठनों ने इस मुठभेड़ को 'फ़र्ज़ी' बताया था और बार-बार इस मामले की न्यायिक जाँच की माँग की थी जो प्रशासन ने ठुकरा दी थी.

'आधार क्या है?'

हमें गुस्सा आ रहा है कि एनएचआरसी ने किस ख़ुफ़िया ढंग से जाँच की है कि लोगों को कानों कान ख़बर नहीं हुई. बाटला हाउस इलाक़े में तो आयोग किसी परिवार से मिला नहीं है. आज़मगढ़ लोग आयोग के सामने पेश होना चाहते थे, सबूत देना चाहते थे. हमने इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट बनाई थी लेकिन हमसे भी किसी ने नहीं पूछा.

सॉलिडेरिडी ग्रुप की अध्यक्ष मनीषा सेठी

बुधवार को बीबीसी के साथ बातचीत में जामिया टीचर्स सॉलिडेरिटी ग्रुप की अध्यक्ष मनीषा सेठी ने कहा, "ये बहुत ही हास्यास्पद है और हमें गुस्सा आ रहा है कि एनएचआरसी ने किस ख़ुफ़िया ढंगसे जाँच की है कि लोगों को कानों कान ख़बर नहीं हुई. बाटला हाउस इलाक़े में तो आयोग किसी परिवार से मिला नहीं है. आज़मगढ़ लोग आयोग के सामने पेश होना चाहते थे, सबूत देना चाहते थे. हमने इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट बनाई थी लेकिन हमसे भी किसी ने नहीं पूछा.."

मनीषा सेठा का कहना है, "इस रिपोर्ट का क्या आधार है? ऐसा लगता है कि केवल़ पुलिस अधिकारियों से मिलकर ये रिपोर्ट बनाई गई है."

उनका कहना था कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कामकाज में पहले ही कईदिक्कतें हैं क्योंकि आयोग के पास अदालत की तरह मुकदमा चलाने के अधिकार नहीं हैं. उनका कहना है कि इसलिए इस मामले में आयोग से निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच की उम्मीद थी.

मनीषा सेठी ने आरोप लगाया, "आयोग ने इस मामले में शुरु में तो एक दो बार रिपोर्ट माँगी लेकिन बाद में आयोग इस मामले में बचता रहा है. हाई कोर्ट के फटकार लगाने के बाद ही आयोग ने इस मामले की जाँच की थी"

उन्होंने तो आयोग पर राजनीतिक दबाव होने तक का आरोप लगा डाला और कहा कि एनएचआरसी ने इस मामले में साबित किया है कि वह न तो स्वतंत्र है और न ही निष्पक्ष है.

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