पन्ना उद्यान में एक भी बाघ नहीं

बाघ

भारत में बाघों की संख्या लगातार घट रही है

भारत के मध्यप्रदेश में बाघों के लिए संरक्षित पन्ना राष्ट्रीय उद्यान में अब एक भी बाघ नहीं बचा है और इसकी स्वीकारोक्ति राज्य सरकार ने विधानसभा में की है.

राज्य के वन मंत्री राजेंद्र शुक्ल का कहना है कि इसी साल मई में विशेष तौर पर किए गए गणना में पाया गया है कि पन्ना उद्यान में एक भी बाघ नहीं बचा है.

पाँच सौ वर्ग किलोमीटर की परिधि में फैले इस पार्क में तीन वर्ष पहले 24 बाघ मौजूद थे.

पन्ना राष्ट्रीय उद्यान देश के उन 37 ‘टायगर रिज़र्व’ का हिस्सा है जहाँ विलुप्त होते 'रॉयल बंगाल टाइगर' को बचाने के लिए ख़ास कार्यक्रम चलाया जा रहा है.

राजस्थान के सरिस्का अभ्यारण्य के बाद पन्ना दूसरा टाइगर रिज़र्व है जहाँ बाघों की संख्या शून्य हो गई है.

वजह पता नहीं

मध्य प्रदेश वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि बाघों के ग़ायब होने के कोई ख़ास कारण सामने नहीं आए हैं.

दूसरी ओर केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय की तैयार की गई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पन्ना की तुलना सरिस्का से नहीं की जा सकती क्योंकि मध्य प्रदेश को इस ख़तरे से पिछले आठ सालों में बार बार अवगत कराया गया है. लेकिन राज्य सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया जिसके नतीजे में बाघ अवैध शिकार की भेंट चढ़ गए.

अभी यह विवाद जारी ही है कि ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि मध्य प्रदेश के एक और नेशनल टाइगर पार्क, 'संजय नेशनल पार्क' में सालों से बाघ दिखे ही नहीं हैं.

संजय नेशनल पार्क को तीन साल पहले ही भारत में सत्तर के दशक से जारी बाघ बचाओ अभियान का हिस्सा बनाया गया था. बताया जाता है कि नब्बे के दशक के अंत तक यहाँ 15 बाघ मौजूद थे.

भारत में अभी बचे करीब 14 सौ बाघों में से तीन सौ के आस पास मध्य प्रदेश में ही हैं इसीलिए इस राज्य को भारत का बाघ प्रदेश भी कहा जाता है.

राज्य के 25 संरक्षित वनों के अलावा छह राष्ट्रीय उद्यान भी हैं जहाँ ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ का विशेष अभियान चलाया जा रहा है.

जाँच होगी

मध्य प्रदेश के वन मंत्री ने कहा है कि सरकार ने सात लोगों की एक विशेष समिति बनाई है जोकि बाघों के ग़ायब होने के कारणों की छानबीन करेगी.

समिति के सदस्य और राज्य वन प्राणी के प्रधान संरक्षक एचएस पाबला ने बीबीसी को बताया कि यह रिपोर्ट अगस्त महीने तक तैयार हो जाएगी.

सरकार को एक द्वि-पक्षीय नीति अपनानी होगी जिसके तहत एक तो शिकारियों कर शिकंजा कसना होगा, दूसरे जिन देशों में बाघों के अंगों की मांग है उनपर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर दबाव बनाना होगा कि वे अपने क्षेत्र में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाएं.

एमके रंजीत सिंह

वन विभाग ने बाघों की संख्या में बढ़ोत्तरी के लिए हाल ही में दो मादा बाघों को पन्ना पहुँचाया है साथ ही केंद्र सरकार से चार और बाघ को, जिसमें दो नर होंगें, वहां ले जाने की इजाज़त मांगी है.

बताया जाता है कि भारत में 19वीं सदी के अंत तक 40 हज़ार बाघ थे लेकिन शिकार और बदलते भौगोलिक स्थिति के चलते उनकी संख्या दिन-ब-दिन कम होकर सत्तर दशक के अंत तक मात्र 1827 के आंकडे पर पहुँच गई.

बाघों को विलुप्त होने से बचने के लिए केंद्र सरकार ने सत्तर के दशक में विशेष बाघ बचाओ अभियान की शुरुआत की जिसके भीतर पहले से मौजूद संरक्षित वन्य क्षेत्रों या फिर दूसरे जंगलों के हिस्से को संरक्षित किया गया और वहां 'प्रोजेक्ट टाइगर' की शुरुआत की गई.

इससे बाघों की तेज़ी से गिर रही संख्या में कुछ रुकावट तो आई लेकिन ग़ैर कानूनी शिकार की वजह से बाघों पर ख़तरा बना हुआ है.

ऐसे लेख छपते रहे है कि उत्तर पूर्व के बहुत से देशों जैसे चीन, ताइवान और कोरिया आदि में बाघ की हड्डियों, पंजों, ख़ाल और शरीर के दूसरे अंगों की भारी मांग है जिसका इस्तेमाल वहां दवाइयों और अन्य कामों में किया जाता है.

राष्ट्रीय वन्य प्राणी सलाह समिति के सदस्य एमके रंजीत सिंह कहते हैं, " इस स्थति से निपटने के लिए सरकार को एक द्वि-पक्षीय नीति अपनानी होगी जिसके तहत एक तो शिकारियों कर शिकंजा कसना होगा और उसे बाहर भेजे जाने वाले रास्तो पर निगरानी कड़ी करनी होगी."

उनका आगे कहना है, "दूसरे, जिन देशों में बाघों के अंगों की मांग है उनपर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर दबाव बनाना होगा कि वे अपने क्षेत्र में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाएं."

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