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क्या हो बदलाव बॉलीवुड में? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी फ़िल्म जगत, जिसे एक नया नाम दे दिया गया है, बॉलीवुड. बॉलीवुड, अमरीकी फ़िल्म जगत, हॉलीवुड से हर साल तीन गुना अधिक फ़िल्में बनाता है. लेकिन बॉलीवुड की फ़िल्में अमरीकी दर्शकों को लुभा पाने में ना तो अधिक सफल रही हैं ना ही उनकी कोई गंभीर पहचान बन सकी है. ऐसी ही स्थिति पर बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन ने टिप्पणी करते हुए कहा है, "बॉलीवुड एक आंदोलन का नाम है लेकिन अमरीकी इसे सिर्फ़ उपहास के ज़रिए ही जानते हैं. यह स्थिति बदली जानी चाहिए". आपकी राय में अंतरराष्ट्रीय पटल पर बॉलीवुड की ऐसी तस्वीर क्यों है और ऐसा क्या किया जाए जिससे बॉलीवुड उपहास नहीं बल्कि सम्मान का प्रतीक बन सके? अपने विचार आप यहाँ पढ़ सकते हैं हॉलीवुड में हर नई फ़िल्म में नए विचार होते हैं, नई थीम होती है, नई तकनीक होती है, वहीं बॉलीवुड की फ़िल्मों में केवल प्यार, संबंध और नाच-गाने होते हैं. रोहित अठाले, ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश मैं अमरीका में एक साल से हूँ और मुझे नहीं लगता कि हिंदी फ़िल्में हॉलीवुड के मुक़ाबले कमज़ोर होती हैं. भागीरथ दहल, अमरीका बॉलीवुड और हॉलीवुड में बहुत फ़र्क़ है. हॉलीवुड में फ़िल्में लंबाई में कम होती हैं और उनका तकनीकी पक्ष बहुत बेहतर होता है. आजकल लोगों के पास तीन घंटे फ़िल्म देखने का समय नहीं होता. हमें इसका ध्यान रखने की ज़रूरत है. रवींद्र बरास्कार, यवतमाल भारत भारत की फ़िल्में विदेशों में बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि हॉलीवुड की फ़िल्मों में इतना अच्छा संगीत नहीं होता. पश्चिमी सभ्यता को मानने वाले बहुत से लोग भारतीय संगीत को पसंद करते हैं. गुडो लूला, शिकागो यह कटु सत्य है कि बॉलीवुड हॉलीवुड जैसी फ़िल्में नहीं बना सकता. इसकी सबसे बड़ी वजह धनाभाव है. लेकिन नई पीढ़ी में जिस तरह प्रतिभाशाली लोग आ रहे हैं उससे लगता है कि हमने हॉलीवुड को चुनौती देना शुरू कर दिया है. श्रवण बिश्नोई, संचौर, भारत भारत के फ़िल्म निर्माताओं का ध्यान घरेलू मार्केट पर ही रहता है. इसलिए वे अंतरराष्ट्रीय स्तर की फ़िल्में बनाते ही नहीं हैं. शरीफ़ुल शेख़, जद्दा, सऊदी अरब सबसे पहले तो हमें बॉलीवुड शब्दो को ही दिमाग़ से निकाल देना चाहिए. ये हमारी हीन भावना को दर्शाता है. दूसरी बात ख़राब फ़िल्में तो हॉलीवुड में भी बनती हैं. हमारी फ़िल्मों की तुलना हॉलीवुड की फ़िल्मों से नहीं हो सकती. संदीप कुमार शर्मा, वैशाली, ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश भारत में अच्छे फ़िल्म निर्देशक नहीं हैं. लोग भी फ़िल्मों में कुछ बदलाव नहीं चाहते हैं. ऋषि परिहार, कनाडा बाज़ार की ज़रूरतें समझेंगे तो इनसान की ज़रूरतें भूल जाएंगे. हॉलीवुड और हमारा मुंबइया सिनेमा अलग संस्कृति क है. अलग-अलग माहौल में रह रहे इन्सानों की तरह... हॉलीवुड से प्रभावित फ़िल्मकार राह से भटक गए हैं. सागर, नोएडा, उत्तर प्रदेश मेरा ख़याल है कि बॉलीवुड की अच्छी फ़िल्मों को मार्केटिंग की ज़रूरत है. मेरा अनुमान ये है कि अमरीकी लोग उत्सुक होते हैं और उन्हें भारतीय फ़िल्में पसंद आ सकती हैं क्योंकि वे हॉलीवुड से अलग होती हैं. नेहा, कैलीफ़ोर्निया, अमरीका बॉलीवुड में अच्छी फ़िल्म शायद इसलिए नहीं बनती हैं कि उसके पास उस स्तर के लोग नहीं हैं जो नाच गाने के अलावा कुछ और भी देखना चाहते हैं. विवेक, किसनगंज हमारे यहाँ भी सिनेमा में गंभीर लोग हैं. मगर कमाई और दर्शकों को लुभाने के चक्कर में स्थिति ये आ गई है कि हॉलीवुड हम पर हंसता है. नई तकनीक आई है मगर इसके बावजूद हमारा सिनेमा विश्वस्तरीय नहीं बन सका. रघुविंदर कुमार भंडारी, ब्रैम्पटन दो चीज़ें दोबारा नहीं बन सकतीं, ताजमहल और शोले. अब आप भारतीय फ़िल्मोद्योग को बख़ूबी समझ गए होंगे. पंकज खोवाल, दिल्ली मैंने कई ऐसी बॉलीवुड की फ़िल्में देखी हैं जो कम बजट की होने के बावजूद बेहतरीन हैं. ये कहना सही नहीं होगा कि हॉलीवुड की फ़िल्में इसलिए अच्छी होती हैं क्योंकि उनका बजट अधिक है. सच्चाई ये है कि बॉलीवुड के निर्देशक पटकथा और नए आईडियाज़ पर ध्यान ही नहीं देते. प्रविंदर, शेओरन, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया बॉलीवुड एक ऐसा शब्द है जो ये बताता है कि हममें एक हीन भावना है. और ये कहना ग़लत है कि हमने दर्शकों पर कोई छाप नहीं छोड़ी है. हमारी फ़िल्में अलग हैं और अलग रूप से श्रेष्ठ हैं. हमें उनको अमरीकी फ़िल्मों के तराज़ू में तौलने की आवश्यकता नहीं. डेविड सिंडिया, कनाडा बॉलीवुड को आवश्यकता है ऐसे फ़िल्मकारों की जो साहसी और सृजनात्मक फ़िल्में बना सकें. आशा है कि भविष्य में बॉलीवुड में भी कुछ स्पीलबर्ग होंगे जो उसे नया अर्थ दे सकेंगे. आशुतोष, विस्कोंसिन, अमरीका सारे निर्देशक लापरवाह हैं और केवल अपनी कमाई के बारे में सोचते हैं, समाज की परवाह नहीं करते. अमित कुमार चौधरी, बेगूसराय, बिहार हमारे पास ना तो अच्छी तकनीक है और ना ही अच्छी कहानी. अगर हम अपनी इस ग़लती को सुधार दें तो ज़रूर अपनी पहचान बना पाएँगे. दीपक पूर्ति, मानगो, जमशेदपुर, झारखंड ये कहना सरासर ग़लत होगा कि बॉलीवुड में अच्छी फ़िल्में नहीं बनतीं. इतिहास गवाह है कि भारत की पुरानी फ़िल्में और पुराने गीत आज भी सदाबहार हैं. हिम्मत सिंह भाटी, जोधपुर, राजस्थान बॉलीवुड की फ़िल्में भावनाओं और संवेदनाओं के निकट होती हैं जबकि हॉलीवुड की फ़िल्मों का आधार तकनीक और अमरीकी भावना और संस्कृति होती है. दोनों के बीच कोई तुलना नहीं हो सकती. डॉ. एस. एस. ठाकुर, दक्षिण कोरिया बॉलीवुड भारतीय समुदाय को लेकर गंभीर नहीं है. माँग के नाम पर भारत की नई पीढ़ी को एक-के-बाद-एक ग़लत सांस्कृतिक संदेश दे रहे हैं. ईश्वर उनको सद्बुद्धि दे. वैसे बॉलीवुड को हॉलीवुड पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. अच्छी भारतीय फ़िल्मों का भी अपना बाज़ार है. मुकुट मणि त्रिपाठी, कोरिया इसमें कोई शक नहीं है कि भारतीय फ़िल्मोद्योग सबसे बड़ा है. भारतीय फ़िल्मों का विदेशियों की समझ में आना मुश्किल है क्योंकि वे भारतीय संस्कृति से परिचित नहीं हैं. वे पारिवारिक मूल्यों पर आधारित फ़िल्मों को कैसे समझ सकते हैं. संक्षिप्त में 'रोटी' और 'हॉट डॉग' में बहुत बड़ा अंतर है. हम अब भी अच्छी फ़िल्में बना रहे हैं, बस उन्हें समझने की ज़रूरत है. पवन कुमार, वर्जीनिया, अमरीका कृपया अच्छी फ़िल्में बनाएँ. तरलोक सिंह, लंदन हिंदी फ़िल्मोद्योग की 95 प्रतिशत फ़िल्में रद्दी होती हैं. निर्माता, निर्देशक, कलाकार सभी लोग बस रातों-रात पैसे कमाना चाहते हैं. फ़िल्मों की गुणवत्ता से किसी को कोई सरोकार नहीं है. अब तो यह उद्योग माफ़िया के पैसे से ही चलता है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान कैसे बन सकती है. राकेश सिंह, अमरीका इतने बड़े भारत देश में अच्छे लेखक, उपन्यास्कार, कवि, साहित्यकार, कहानीकार भरे पड़े हैं जिनके पास अच्छी से अच्छी कहानी लिखने की क्षमता है पर बॉलीवुड के फ़िल्मी लेखन कहानी चुराने में ही व्यस्त रहते हैं. कभी-कभी तो हॉलीवुड की फ़िल्म की ही चोरी हो जाती है. इस सब को सोचना पड़ेगा ताकि बॉलीवुड और हॉलीवुड में फ़र्क़ नज़र आए. महिन्दर सिद्धू, स्वीडेन मैं यह बताना चाहता हूँ कि बॉलीवुड हॉलीवुड से ज़्यादा लोकप्रिय क्यों नहीं है. हॉलीवुड ने हमेशा वास्तविकतापूर्ण और अच्छी क्वालिटी की फ़िल्में बनाईं. लेकिन बॉलीवुड ने सैंकड़ों का तादाद में ऐसी फ़िल्में बनाईं जिनके पीछे मक़सद केवल पैसा कमाना होता था. बॉलीवुड को चाहिए कि वह कम फ़िल्में बनाए लेकिन क्वालिटी का ध्यान रखे. तभी वह हॉलीवुड का मुक़ाबला कर पाएगा. भास्कर डोभाल, विएना, ऑस्ट्रिया क्या करना है, दुनिया को दिखाने की ज़रूरत नहीं है. अमरीका से क्या कोई सर्टिफ़िकेट लेना है. हमारे लोग अच्छी फ़िल्में बनाते हैं. अच्छा-बुरा सब जगह होता है. अंदाज़ अपना-अपना, मुन्नाभाई एमबीबीएस, ब्लैक, देवदास, स्वदेस जैसी फ़िल्में किसी मायने में कम नहीं हैं, हॉलीवुड के पीछे भागने की ज़रूरत नहीं है मेरे भाई. ख़ुद अपनी राह बन रही है, बनने दो न! नीरज, नोयडा बॉलीवुड की फ़िल्मों में वही दिखाया जाता है जो भारत की जनता चाहती है. यदि हम अमरीकी दर्शकों को लुभाने वाली फ़िल्में भारत में बनाएँगे तो उन्हें भारतीय दर्शक पसंद नहीं करेंगे. दोनों देशों की संस्कृति एकदम अलग है. अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारतीय फ़िल्मों को भारतीय नज़रिए से देखना चाहिए. रोशन, दुबई हम पहले भारतीय हैं. हमें अपने देश से प्यार है. अमरीका के लोगों को हमारी फ़िल्में पसंद नहीं आतीं क्योंकि उन्हें हिंदी की समझ नहीं है. नई पीढ़ी के निर्देशकों को नए युग के अनुरूप फ़िल्में बनानी चाहिए जो सब को आकर्षित करें. विकास, दिल्ली विदेशी तकनीक का सही उपयोग और हिंदी की वास्तविक और काल्पनिक के बीच तालमेल से ही काम चलेगा. अश्लीलता के सहारे परोसने वाली सामग्री से बचना होगा तभी हमें हॉलीवुड में पहचान मिल पाएगी. कृष्णराम प्रधान, सरगुज़ा, भारत ये पूरी तरह सत्य तो नहीं है कि अमरीका में लोग बॉलीवुड पर हंसते हैं, मगर सामान्य तौर पर ऐसी भावना है. एक बात पर तो हम सहमत हैं कि बॉलीवुड ना केवल हॉलीवुड बल्कि पूरी दुनिया से आईडियाज़ उड़ाता है. जब तक हम गुणवत्ता और विश्वसनीयता नहीं पैदा करते, बॉलीवुड की तस्वीर नहीं बदलेगी. मुकेश न्याती, ऐन आर्बर, अमरीका पहले हमें अपने देश में ही लोगों के लिए सार्थक फ़िल्में बनानी होंगी तभी हम आगे क़दम बढ़ा सकते हैं. तेजेंदर पन्नू, कैलिफ़ोर्निया, अमरीका अगर फ़िल्मकार स्वयं आपस में फ़िल्मों और अपने दर्शकों के बारे में अपनी धारणा नहीं बदलते, हॉलीवुड और बॉलीवुड की तुलना करना मुश्किल होगा.भारत में हमेशा ये शिकायत की जाती है कि फ़िल्मकार नया नहीं करते, नकल करते हैं, मगर कोई नई चीज़ वहाँ सफल हुई भी है? जबतक भारत में कौन, एक हसीना थी, ब्लैक, स्वदेस, दीवार, आंखें, जैसी फ़िल्में सफल नहीं होतीं, तबतक बॉलीवुड की तस्वीर नहीं बदलेगी. कमल राठी, मिनेसोटा, अमरीका सारा दोष दर्शकों का है. श्रृजनशील कलाकार और निर्देशक बेचारे सिनेमाहॉल में दर्शकों के लिए तरसते हैं. आख़िर 'मैं आज़ाद हूँ', 'ख़ामोशी' और 'स्वदेस' जैसी सुपर स्टारों से सज्जित फ़िल्मों को क्यों तरसना पड़ा. दूसरी ओर लंदन और न्यूयॉर्क में नाटक देखने के लिए दर्शक महँगी टिकटें भी ख़रीदते हैं.शायद शिक्षा के प्रसार से दर्शकों का मानस बदले. पुनीत, लीड्स, ब्रिटेन वो कहते हैं न कि 'क्वालिटी इज़ बेटर दैन क्वांटिटी'. हॉलीवुड और बॉलीवुड के साथ भी यही बात है. सिर्फ थोक के भाव में फिल्में बनाना ही बहादुरी नहीं होती, ज़रूरी यह है कि बॉलीवुड जो भी बनाए सोच-समझकर एक रणनीति के तहत बनाये. इसके लिए फिल्म निर्माण के हर मोर्चे पर तैयारी पुख़्ता करके ही निर्माताओं को मैदान में उतरना चाहिए. शशि सिंह, मुम्बई बॉलीवुड, हॉलीवुड के समक्ष कुछ नहीं. हॉलीवुड चूहे जितनी छोटी चीज़ को भी काफ़ी दिलचस्प रूप से पेश करता है, मगर बॉलीवुड बिल्कुल पुराने ढर्रे पर. मगर अब रानी, प्रीति, अमिताभ, अभिषेक, शाहरूख़ और रामगोपाल वर्मा जैसी हस्तियाँ इससे बाहर निकलना चाह रही हैं. उन्हें कोशिश जारी रखनी चाहिए, लोगों को अच्छा लगेगा. आशी कपूर, दिल्ली बॉलीवुड को अपनी घिसी-पिटी बोल्ड छवि से बाहर निकलना चाहिए. हॉलीवुड के निर्देशक छोटे से मुद्दे को बेहतरीन रूप में पेश करते हैं, लेकिन भारतीय निर्देशक नकल करने में भी अकल का इस्तेमाल नहीं करते. नैना, दिल्ली भारतीय दर्शक इन तथाकथित बोल्ड फ़िल्मों से उब गए हैं जिनमें सस्तापन होता है. बॉलीवुड में दुनिया को उच्चकोटि का सिनेमा देने की अपार क्षमताएँ हैं. इसलिए उसे हॉलीवुड की नकल नहीं करनी चाहिए. एक अच्छा विषय उठाएँ, उसे ढंग से प्रस्तुत करें, और फिर छा जाएँ दुनिया पर. नीतू सिंह, दिल्ली, भारत भारत के चलचित्र पूर्णतया पश्चिम की नकल पर बनते हैं. बॉलीवुड को भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अनुसार फ़िल्में बनानी चाहिए. विदेशी जब भारत भ्रमण पर आते हैं तो वे भारत की असली रूपरेखा लेकर आते हैं. भारत की फ़िल्में, मदर इंडिया, गंगा जमुना, मुग़ले आज़म, लगान विदेशों में भी लोकप्रिय हुए हैं. शीला मदन, हेरिटेज लेन, शिकागो, अमरीका हॉलीवुड और बॉलीवुड दोनों ही अच्छे हैं मगर दोनों की संस्कृति भिन्न है. एस पी सिंह, इटली बॉलीवुड की अपनी एक अलग पहचान है. इसकी तुलना हॉलीवुड से नहीं की जा सकती है. दोनों जगहों की संस्कृति और मूल्यों में बहुत अधिक अंतर है. हालाँकि विश्वव्यापीकरण के इस दौर में ये अंतर कम हो रहा है लेकिन अभी इसमें थोड़ा समय लगेगा. नवीन कुमार त्रिपाठी, भारत |
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