|
पाकिस्तानी शायर फ़राज़ नहीं रहे
|
|||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के सुप्रसिद्ध शायर अहमद फ़राज़ का निधन हो गया है. वो 77 वर्ष के थे.
फ़राज़ पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे और इलाज के लिए अमरीका भी गए थे. ग़ज़ल गायक मेहदी हसन की आवाज़ में अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल- अहमद फ़राज़ पाकिस्तान में जितने लोकप्रिय रहे उतने वह भारत में भी थे. पिछले दिनों वह भारत में काफ़ी रहे, वह इसे अपना दूसरा घर भी कहते थे. भारत के किसी भी बड़े मुशायरे में उनकी शिरकत ज़रूरी समझी जाती थी. यही बात है कि पिछले दिनों होने वाले शंकर-शाद मुशायरे के अलावा जश्ने-बहार में भी वह उपस्थित थे और उन्होंने लोगों की फ़रमाइश पर अपनी मशहूर लंबी ग़ज़ल, 'सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं, सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं', बार बार पढ़ी.
अहमद फ़राज़ ने एक बार कहा था कि पाकिस्तान में विरोध की कविता दम तोड़ चुकी है लेकिन जनता का विरोध जारी है. उन्होंने कहा कि हमने पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान सरकार को लौटा दिया मगर फिर भी शायरी में अब वह विरोध देखने में नहीं आता है. उनकी शायरी सिर्फ़ मुहब्बत की राग-रागिनी नहीं थी बल्कि वह समसामयिक घटनाओं और सियासत पर तीखी टिप्पणी भी होती थी. फ़राज़ की तुलना इक़बाल और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ जैसे बड़े शायरों से की गई है. अहमद फ़राज़ की यह पंक्तियां याद आती हैं जो उनके जाने को अच्छी तरह बयान करती हैं: क्या ख़बर हमने चाहतों में फ़राज़ उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा कि दुखी लोगों ने मुझे बहुत प्यार दिया. उनका एक मशहूर शेर है: अब और कितनी मुहब्बतें तुम्हें चाहिए फ़राज़, उन्हें 2004 में पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान हिलाले-इम्तियाज़ दिया गया जिसे उन्होंने बाद में विरोध प्रकट करते हुए वापस कर दिया. उनकी कविताओं के 13 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उन सब को उन्होंने शहरे-सुख़न के नाम से प्रकाशित किया है. भारत में हिंदी में उनकी कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं. ख़ानाबदोश चाहतों के नाम से उनकी प्रमुख कविताएं और गज़लें हिंदी में छपी हैं. अहमद फ़राज़ के कुछ लोकप्रिय अशआरः इस से पहले के बे-वफ़ा हो जाएं दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभानेवाला वक़्त ने वो ख़ाक उड़ाई है के दिल के दश्त से करूँ न याद अगर किस तरह भुलाऊँ उसे जो भी दुख याद न था याद आया तुम भी ख़फ़ा हो लोग भी बरहम हैं दोस्तो अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें |
इससे जुड़ी ख़बरें
मलिका पुखराज नहीं रहीं04 फ़रवरी, 2004 | मनोरंजन एक्सप्रेस
उर्दू में छपी रामायणों का ज़ख़ीरा10 दिसंबर, 2004 | मनोरंजन एक्सप्रेस
साहित्यकार निर्मल वर्मा का निधन26 अक्तूबर, 2005 | मनोरंजन एक्सप्रेस
संगीतकार नौशाद को एक श्रद्धांजलि05 मई, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस
शहनाई के बेताज बादशाह21 अगस्त, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
|
|||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
|
||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||