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सोमवार, 18 अगस्त, 2008 को 15:52 GMT तक के समाचार
 
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दिल्ली में मुशायरों की धूम
 

 
 
मुशायरा
भारत में मुशायरे की परंपरा का रिश्ता मुग़ल दरबार से मिलता है जहां ग़ालिब, ज़ौक़ और मोमिन जैसे शायर अपना कलाम सुनाते थे
उर्दू के मशहूर शायर जोश मलीहाबादी की नज़्म ‘लम्हा-ए-आज़ादी’ का एक बड़ा लोकप्रिय शेर है:

कि आज़ादी का इक लम्हा है बेहतर
ग़ुलामी की हयाते-जाविदाँ से

यानी आज़ादी का एक पल भी ग़ुलामी के अमर जीवन से बेहतर है और शायद इसीलिए दिल्ली वाले अपने देश के स्वतंत्रता दिवस के मौक़े से आज़ादी के एक एक पल का लुत्फ़ लेते हैं.

हाल ही में जश्ने-आज़ादी के हवाले से दिल्ली उर्दू अकादमी के साथ साथ जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय और फिर इंडियन कल्चरल सोसाईटी ने लगातार तीन दिन तीन मुशायरे आयोजित किए.

इंडियन कल्चरल सोसाईटी ने आज़ादी के मौक़े से अपने अंतर्राष्ट्रीय मुशायरे को सांसद कुवंर नटवर सिंह को समर्पित किया और इस मौक़े से उन्हें विश्व शांति पुरस्कार से सम्मानित भी किया.

उर्दू अकादमी का मुशायरा

मुशायरे की शुरूआत करते हुए उर्दू अकादमी के उपाध्यक्ष प्रो. क़मर रईस ने कहा आज़ादी के आंदोलन में शायरों और साहित्यकारों ने प्रमुख भूमिका निभाई है.

उन्होंने ये भी कहा कि आज़ादी की चमक को सांप्रदायिक शक्तियाँ अपनी गतिविधियों से धुमिल कर रही हैं लेकिन उर्दू मुहब्बत की ज़बान है और शायर मुहब्बतों के रखवाले हैं इसलिए हमें उम्मीद है कि हम अपनी आज़ादी का असली रूप ज़रूर देख कर रहेंगे.

मुशायरा दिल्ली
दिल्ली उर्दू अकादमी हर साल स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस के मौक़े से मुशायरा कराती है

उर्दू अकादमी हर साल भारतीय स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौक़े से दो बड़े मुशायरे आयोजित करती है और देश के जाने माने शायरों को इसमें अपने ताज़ा कलाम सुनाने का मौक़ा मिलता है.

मुशायरे की शुरूआत दिल्ली के शायर जावेद मशीरी ने अपने कलाम से की और उनकी इन पंक्तियों को काफ़ी पसंद किया गया:

ख़ुशी के मौसम की आहटों से गुलाब दिल के महक रहे हैं
ये कौन आया है अंजुमन में चराग़ पलकें झपक रहे हैं

अज़्म शाकरी की इन चार पंक्तियों को चारों तरफ़ से काफ़ी दाद मिली:

हमारे ख़्वाब थे वो बुन रही थी
अंधेरी रात तारे चुन रही थी
मैं आँखों से बयाँ ग़म कर रहा था
वो आँखों ही से बैठी सुन रही थी

मंज़र भोपाली के इस शेर को काफ़ी वाहवाही मिली:

कोई बचने का नहीं सब का पता जानती है
किस तरफ़ आग लगानी है हवा जानती है

कुछ इन शेरों ने भी बेहद दाद हासिल की:

सुब्ह को आए, दिन भर ठहरे, शाम को वापस जाना है
इतनी देर बसेरा जग में, इतनी देर ठिकाना है (वक़ार मानवी)

सेहरा में चीख़ते रहे कुछ भी नहीं हुआ
मिट्टी की तरह रेत भी नम हो के रह गई (मनव्वर राना)

कल इसी मोड़ पे था खेलते बच्चों का हुजूम
फूल बिखरे थे जहाँ, राख बिछा दी किसने (मेराज फ़ैज़ाबादी)

लहरों के साथ साथ बहुत दूर तक गए
दरिया से गुफ़्तगू की इजाज़त नहीं मिली (मलिकज़ादा जावेद)

जामिया का मुशायरा
जामिया के शायर पापा
जामिया मिलिया विश्वविद्यालय नया सांस्कृतिक कें बनता जा रहा है

अगर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की एक भूमिका रही है तो जामिया मिलिया का भी भारत की आज़ादी में एक बड़ा हिस्सा रहा है और कॉंग्रेस से नज़दीक माने जाने वाले लोगों ने इसको काफ़ी प्रोत्साहन दिया.

जामिया का मुशायरा परंपरागत तरीक़े पर शुरू हुआ लेकिन इसकी ख़ास बात ये रही कि इसमें जामिया के शायरों को ही शामिल किया गया. इतने बड़े विश्वविद्यालय में शायरों की क्या कमी थी इसलिए मुशायरे की शुरूआत एक छात्र शायर से हुई तो इसका समापन सबसे सीनियर जामिया ओल्ड बॉयज़ असरार जामई के कलाम से हुआ.

जामिया के उर्दू विभाग में अध्यापक कौसर मज़हरी की इन पंक्तियों को काफ़ी सराहा गया:

मैं सबके वास्ते अच्छा था लेकिन
उसी के वास्ते अच्छा नहीं था
मगर तश्बीह उसको किससे देते
अभी तो चाँद भी निकला नहीं था

इन शेरों को काफ़ी सराहना मिली, कुछ आप भी सुनते चलिए:

जीने की तमन्ना है तो मर क्यों नहीं जाते
पानी की तरह सर से गुज़र क्यों नहीं जाते (उबैद सिद्दीक़ी)

सीने से आग, आँखों से पानी, रगों से ख़ून
इक शख़्स हम से छीन के क्या क्या न ले गया (ग़ज़नफ़र)

कभी सहरा में रहते हैं कभी पानी में रहते हैं
न जाने कौन है जिसकी निगहबानी में रहते हैं (शमीम हनफ़ी)

जब से उनकी दुम का छल्ला बन गए
हम अकेले थे मुहल्ला बन गए (पापा)

बेगम ने एक दिन कहा नौकर से बदतमीज़
उसने दिया जवाब कि कमतर नहीं हूं मैं
मैडम ज़रा तमीज़ से बातें किया करो
नौकर हूँ आपका, कोई शौहर नहीं हूं मैं (असरार जामई)

नटवर सिंह के लिए

नटवर सिंह
मुशायरे में नटवर सिंह को विश्व शांति पुरस्कार भी दिया गया

इंडियन कल्चरल सोसाइटी के जश्ने-आज़ादी के मुशायरे के मौक़े पर सांसद नटवर सिंह को विश्व शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. अहमद इम्तियाज़ को ग़ालिब गद्य पुरस्कार और ईटीवी उर्दू को उर्दू की ख़िदमत के लिए पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

इस मौक़े पर डॉ. नटवर सिंह ने कहा कि वे जब पाकिस्तान में भारत के राजदूत थे तो उन्होंन जनरल ज़ियाउल-हक़ से कहा था कि पाकिस्तान से ज़्यादा मुसलमान भारत में बसते हैं और वे लोग कभी कभी ऐसी बातें कह जाते हैं जिस से दोनों देश के हज़ारों लोगों को नुक़सान होता है.

इस मुशायरे में ये भी कहा गया कि मुशायरा सिर्फ़ भाषा की हिफ़ाज़त नहीं करता ये संस्कृति की भी हिफ़ाज़त करता है. मुशायरे के संस्थापक मैकश अमरोही ने कहा जैसे जैसे ग़ैर मुस्लिम उर्दू से अलग होते गए देश में उर्दू की स्थिति ख़राब होती गई.

इस मुशायरे की शुरूआत परंपरागत तौर पर नात से की गई जिसमें होश नोमानी की इन पंक्तियों को काफ़ी पसंद किया गया.

महफ़िल सजा के देखिए ख़ैरुल-अनाम की
बारिश फ़लक से होगी दरूदो-सलाम की
सरकार अब ये आप की उम्मत को क्या हुआ
उठने लगी तमीज़ हलालो-हराम की

अलीगढ़ के शायर जॉनी फ़ॉस्टर की ये पंक्तियाँ भी काफ़ी पसंद की गई:

एक तरफ़ है लौ दीपक की एक तरफ़ रुख़सार तेरे
देखें अब पागल परवाना किस पर जान लुटाए है

उसके बंदों से मुझे जिस दम मुहब्बत हो गई
आसमाँ से इक सदा आई इबादत हो गई

सविता सिंह के ये शेर भी पसंद किए गए:

लड़की गुमसुम सोच रही है
दुनिया इतनी दानी क्यों है

कभी कभार तो वो मेरे काम आ जाता
जवान बेटे को घर से निकालना ही न था (मैकश अमरोही)

हमें रोना नहीं आता, तुम्हें हंसना नहीं आता
ख़ुशामद आप की फ़ितरत हमें झुकना नहीं आता (अख़्तर संभली)

 
 
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