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कवयित्री कीर्ति चौधरी का निधन
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हिंदी नई कविता की जानी-मानी और मुखर कवयित्री कीर्ति चौधरी (1934-2008) का लंदन में निधन हो गया है.
उन्होंने भारतीय समयानुसार शुक्रवार की सुबह तीन बजकर 45 मिनट पर अंतिम साँस ली. पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहीं कीर्ति चौधरी लंदन में रह रही थीं और वहीं उनका उपचार हो रहा था.
कीर्ति चौधरी तीसरे सप्तक की एक मात्र कवयित्री थीं. ‘तीसरा सप्तक’ (1960) के संपादक अज्ञेय ने 60 के दशक में प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और मदन वात्स्यायन जैसे साहित्यकारों के साथ कीर्ति चौधरी को भी तीसरा सप्तक का हिस्सा बनाया.
तीसरा सप्तक के कवियों में से एक, जाने माने साहित्यकार केदारनाथ सिंह उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहते हैं, "तीसरा सप्तक के लिए यह दो ही वर्षों में तीसरा आघात है. इसी वर्ष प्रयाग नारायण त्रिपाठी का भी देहांत हो चुका है. इससे कुछ समय पहले मदन वात्स्यायन हमें छोड़कर चले गए." केदारनाथ सिंह कीर्ति चौधरी के कृतित्व की चर्चा करते हुए कहते हैं, "महादेवी वर्मा के बाद हिंदी कविता में जो एक रिक्तता आई थी, उसे कीर्ति अपने मौलिक लेखन से पाटती हैं. उनकी कविता एक नए सांचे में थी जिसकी बनावट अलग थी. उसमें एक ताज़गी थी. और अपनी रचनाओं के तल में उनके पास एक ख़ास तरह का स्त्री सुलभ संवेदना का ढांचा था जो उनके समय में किसी और के पास नहीं था." 'केवल एक बात थी' कीर्ति नई कविता की कवियत्री थीं. ऐसी, जिन्होंने महादेवी वर्मा के जाने के बाद आई रिक्तता में अपनी खनक घोलनी शुरू की थी.
नई कविता की शुरुआत आम तौर पर ‘दूसरा सप्तक’ ( 1951) से होती है और ऐसा माना जाता है कि 1959 में ‘तीसरा सप्तक’ के प्रकाशन के साथ वह अपने उत्कर्ष को पहुँच कर समाप्त हो जाती है. नई कविता के इसी उत्कर्षकाल की साक्षी और सारथी थीं कीर्ति चौधरी और उनकी रचनाएं. उनकी कविताओं में एक मोहक प्रगीतात्मकता देखने को मिलती है. उनकी कविता में मनुष्य और उसके समग्र अनुभवों को पकड़ने का यत्न हुआ है. वास्तव में कीर्ति चौघरी की कविता नई कविता के अन्य रचनाकारों की तरह ही संपूर्ण जीवन की कविता है. उनकी कविता में प्रतीकों और बिंबों का काफ़ी प्रयोग मिलता है. जीवन परिचय
एक जनवरी, 1934 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के नईमपुर गाँव में एक कायस्थ परिवार में उनका जन्म हुआ था. कीर्ति चौधरी का मूल नाम कीर्ति बाला सिन्हा था. उन्नाव में जन्म के कुछ बरस बाद उन्होंने पढ़ाई के लिए कानपुर का रुख़ किया. 1954 में एमए करने के बाद 'उपन्यास के कथानक तत्व' जैसे विषय पर उन्होंने शोध भी किया. साहित्य उन्हें विरासत में भी मिला और फिर जीवन साथी के साथ भी साहित्य, संप्रेषण जुड़े रहे. हालांकि पिता एक ज़मीदार थे पर कीर्ति चौधरी की माँ, सुमित्रा कुमारी सिन्हा ख़ुद एक बड़ी कवयित्री, लेखिका और जानी-मानी गीतकार थीं. पर कीर्ति चौधरी का लेखन माँ के प्रभाव से मुक्त था और अपनी मौलिकता लिए हुए था. उनकी रचनाधर्मिता के पीछे अनुभवों की विविधता भी एक कारण रहा होगा. इसका संकेत कीर्ति अपने बारे में लिखते हुए देती हैं.- "गाँव, कस्बे और शहर के विचित्र मिले-जुले प्रभाव मेरे ऊपर पड़ते रहे हैं."
कीर्ति चौधरी का विवाह हुआ हिंदी के सर्वश्रेष्ठ रेडियो प्रसारकों में से एक, ओंकारनाथ श्रीवास्तव से. बीबीसी हिंदी सेवा के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे ओंकारनाथ श्रीवास्तव केवल रेडियो को अपने योगदान ही नहीं, बल्कि अपनी कविताओं और कहानियों के लिए भी जाने जाते हैं. जानेमाने साहित्यकार अजित कुमार कीर्ति जी के भाई हैं. कीर्ति चौधरी की साहित्यिक यात्रा यों तो बहुत लंबा-चौड़ा समय और सृजन समेटे हुए नहीं है पर जितना भी है, उसे किसी तरह से कमतर नहीं आंका जा सकता. कीर्ति चौधरी के परिवार में अब उनकी बेटी अतिमा श्रीवास्तव हैं जो ख़ुद अंग्रेज़ी की लेखिका हैं. अतिमा के दो उपन्यास, 'ट्रांसमिशन' और 'लुकिंग फ़ॉर माया' प्रकाशित हो चुके हैं. |
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