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सोमवार, 19 नवंबर, 2007 को 10:52 GMT तक के समाचार
 
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महादेवी वर्मा का महारूप
 

 
 
महादेवी वर्मा
महादेवी का गद्य लेखन सामाजिक यथार्थ से रूबरू करवाता है
कोई कहता है वे अदभुत कवयित्री हैं. कोई कहता है, महादेवी के बिना छायावाद की कल्पना भी अधूरी है. कोई उन्हें आधुनिक युग की मीरा कहता है, तो कोई उनके काव्य में न जाने कितने गहरे समाए रहस्यों की खोज करता है.

कुछ लोग उनकी कविता के दार्शनिक पक्ष को सामने रख स्वयं को बुद्धिजीवी होने का प्रमाणपत्र देते हैं, तो कुछ समझदार लोग उनकी कविता में बिखरे अकेलेपन की अज़ीबोग़रीब व्याख्याएँ करते हैं.

बात जब यहाँ नहीं ख़त्म होती तो वे बौद्ध धर्म के दुखवादी सिद्धांत के आधार पर उनकी कविता को समझाने की कोशिश करने लगते हैं.

 पर बहुत गहरे साहित्यिक विवेचन में न जाकर उन्हें समझने की एक सीधी कोशिश तो उनके गद्य के माध्यम से ही की जा सकती है
 

यह महादेवी वर्मा का जन्म-शताब्दी वर्ष है. बहुत सारे आयोजन और बहुत बड़ी-बड़ी बातें. अनगिनत आलोचक और अनगिनत व्याख्याएं.

पर बहुत गहरे साहित्यिक विवेचन में न जाकर उन्हें समझने की एक सीधी कोशिश तो उनके गद्य के माध्यम से ही की जा सकती है.

उनका गद्य, उनकी कविता के कंधे से कंधा मिलाकर चलता है.

स्त्री चेतना

वे सच्चे अर्थों में आधुनिक नारी, उसकी संवेदना, उसकी आशाओं, हौंसलों, उसकी ताकत और संभावनाओं के साथ-साथ उसके दुख, उसकी पीड़ा और तकलीफ़ के बावजूद उसकी उम्मीदों का प्रतीक है.

औरत की ज़िंदगी से जुड़ा ऐसा कोई पक्ष नहीं जिसे महादेवी ने महसूस न किया हो, उसके बारे में लिखा न हो.

 वे हर उस क़ानून पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं जिसका निर्माण स्वयं पुरुष ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए किया है
 

बात स्त्री-शिक्षा के महत्व की हो या शिक्षा के अभाव में अपनी पहचान को तरसती नारी की. बात नारी की आर्थिक आज़ादी की हो या उससे जुड़े पारिवारिक और सामाजिक पहलू की. या फिर घर-बाहर, अपने और परायों के बीच अपने वजूद, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती औरत की. महादेवी की सशक्त कलम से कुछ भी नहीं छूटा.

उनका गद्य नारी पर समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा किए जा रहे शोषण का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, उसमें कहीं गूंगी ज़बान है तो कहीं विद्रोह की हलचल.

महादेवी वर्मा ने गंभीर से गंभीर समस्या को जिस ईमानदारी और संवेदना के साथ पाठकों के सामने रखा है, वह बहुत गहरे में उतरकर चोट करता है और सोचने-समझने पर विवश भी.

बात सिर्फ़ लिखकर ख़त्म नहीं हो जाती. महादेवी तो इन जीती-जागती औरतों को अपनी शक्ति पहचानने में मदद करती हुई उन्हें हर संभव भावानात्मक, मानसिक और आर्थिक सहयोग भी प्रदान करती चलती हैं.

जन से जुड़ाव

कई बार हैरानी होती है कि इतनी नामी-गिरामी कवयित्री, इतना व्यस्त और परिचित नाम. पर उसे एक गूंगी औरत की दर्द भरी कहानी सुनने, समझने की भी फुरसत है और गाँव वालों की चिट्ठियाँ लिखने की भी साथ ही उन्हें पढ़ाने-लिखाने का हौंसला और धैर्य भी.

वे घर के नौकर ‘रामा’ के जीवन से भी जुड़ी हैं. उसकी तकलीफ़, उसके दर्द को महसूस कर सकती हैं. गाँव की अहीर लड़की ‘लछीमन’ से भी उनका गहरा संबंध है.

 बात स्त्री-शिक्षा के महत्व की हो या शिक्षा के अभाव में अपनी पहचान को तरसती नारी की. बात नारी की आर्थिक आज़ादी की हो या उससे जुड़े पारिवारिक और सामाजिक पहलू की. या फिर घर-बाहर, अपने और परायों के बीच अपने वजूद, अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती औरत की. महादेवी की सशक्त कलम से कुछ भी नहीं छूटा
 

समाज की क्रूरता के कारण टूटी हुई उस औरत को वे अपने घर में जगह देती हैं. उसे नया नाम ‘भक्तिन’ और नई पहचान देती हैं.

वे एक चीनी फेरीवाले की बहन बन जाती हैं और उसके दुख-दर्द को बाँटने का अवकाश निकाल लेती हैं.

वे अपनी बद्रीनाथ की यात्रा में उनका सामान ढ़ोने वाले कुलियों को अपनी दुनिया में शामिल कर लेती हैं और उन्हें अपार सहानुभूति और स्नेह देती हैं.

फिर पुरुष के अत्याचारों को सिर झुका स्वीकार न कर उसके विरुद्ध सिर उठाने वाली ‘बिबिया’ को महादेवी कैसे न अपनातीं?

वे हर उस क़ानून पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं जिसका निर्माण स्वयं पुरुष ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए किया है.

उनका पूरा विश्वास है कि औरतों को उनके अधिकार तभी मिल सकते हैं जब वे पढ़-लिखकर पुरुषों के समक्ष आ जाएँ और पुरुषों की भाँति सामाजिक उत्पादन में हाथ बटाएँ.

मैं उन्हें ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ या ‘बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी’ जैसी सैकड़ों कविताओं के साथ-साथ उनकी यादों के साए में ढले रेखाचित्रों, एक सशक्त स्वाभिमानी, स्वावलंबी औरत के रूप में परिवार, समाज और राष्ट्र के हर पहलू पर उनके स्वतंत्र विचारों के साथ याद करना होगा.

महादेवी के महारूप को उनके गद्य के माध्यम से ही समझा जा सकता है.

 
 
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