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सोमवार, 19 नवंबर, 2007 को 10:24 GMT तक के समाचार
 
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बच्चन: लोक जीवन के गीतकार
 
हरिवंश राय बच्चन
बच्चन के काव्य का पूरा मूल्यांकन अभी बाकी है
( दिवंगत साहित्यकार धर्मवीर भारती के बच्चन जी के बारे में लिखे एक लेख का अंश)

कोई 40 बरस से ज़्यादा हो गए होंगे पर आज तक याद है वह सड़क, वह नदी, वह गीत.

गऊघाट से ज़रा पहले बाईं ओर मुड़ जाती थी वह सड़क. सड़क के दोनों ओर सौ, दो सौ जाने कितने साल पुराने घने नीम के पेड़, सड़क पर चलो तो दोनों ओर हरी पत्तियों का मोटा अपारदर्शी परदा और सीधे चली जाती सीमेंट की सड़क.

नीम के कारण सड़क का नाम था निमहरा. उस रहस्यमयी सड़क पर बेसाख़्ता साइकिल चलाने का एक अपना रोमांच था.

इतनी घनी छाँह कि जैसे अँधेरे से गुम होती जा रही हो सड़क. बीच-बीच में जहाँ पंक्ति में एकाध पेड़ गायब हो वहाँ थोड़ी रोशनी दीखती थी और दाईं ओर दीखती थी ऊँचे कतारों को काट कर बहती हुई जमुना.

यह पूरी सड़क जमुना के किनारे-किनारे चलती है पर इतनी घनी कि नदी दीखती ही नहीं. जहाँ-जहाँ दीखती है वहाँ ऊबड़-खाबड़ किनारों से बँधा जमुना का चौड़ा पाट. उसकी हल्की हरे रंग की धारा और धूप में चमकती लहरें. पर एक झलक दिखाकर फिर जैसे छिप जाती थी.

'निशा निमंत्रण' और 'एकांत-संगीत' के गीतों ने हमारी सारी पीढ़ी के कैशोर्य को उद्वेलित किया है. लगता था हमारी पीड़ा, हमारी कसक, हमारे सुख-दुख, हमारा अकेलापन जाने कैसे इस गीतकार के साथ एकाकार हो गया है

यही नवंबर की दोपहर रही होगी. सर्दी तो उधर नवंबर में पड़ने ही लगती है, ऊपर से घनी छाँह और नदी की ओर से आते ठंडे झकोरे. बीच में एक जगह थोड़ा खुलाव था और धूप थी. धूप सेंकने के लिए मैं वहीं साइकिल रोक कर उतर पड़ता हूँ.

लोक की अनुभूति

जमुना की कलकल और नीम की सरसराहट के अलावा एक और आवाज़ आ रही है. किसकी है. कोई उधर से आया है.

इस जाड़े में भी नंगे पैर, पीठ पर लदा बोरा ज़मीन पर पटक कर कगार के ऊँचे धूप खिले पत्थर पर बैठकर सुस्ता रहा है. थोड़ी देर में उठता है और बोरे के सहारे टिक कर खँखारता है और फिर खुले गले से गाने लगता है

जाबै तो हइए ना, सैंया डोली लैके आएं
टिकुली लाएं, कजरा लाएं, कंगना तो हइए ना
जाबै तो हइए ना सैंया डोली लैके आएं

मेरा क्वारा मन इस गीत की लय पर कैसा तो काँपने सा लगता है. कैसा मान है ग्राम वधू का. साजन मेले से टिकुली लाए हैं, काजल लाए हैं लेकिन उसने कंगन मंगाया था वह तो लाए ही नहीं. फिर क्यों जाए वह. अपनी डोली लेकर साजन लौट जाए, वह तो नहीं जाएगी.

फिर क्या हुआ? उसे कैसे मनाया साजन ने. मैं मोहाविष्ट साइकिल हाथ में ले पैदल निमहरा की सड़क पर चला जा रहा हूँ.

वह उठता है बोरी, लाठी और जूता वहीं छोड़कर गाते-गाते यमुना की ओर जाने लगता है. गीत के स्वर धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं,

मैं बेकल हूँ. और सुनना चाहता हूँ, सुनते जाना चाहता हूँ, चाहता हूँ. न यह गीत ख़त्म हो, न यह सड़क. और लो चलते-चलते मैं अपनी पतली-सी आवाज़ में गुनगुनाने लगता हूँ.

कोई पार नदी के गाता
भंग निशा की नीरवता कर
यह देहाती गायन का स्वर
ककड़ी के खेतों से उठकर
आता जमुना पर लहराता.
कोई पार नदी के गाता

सुनकर यह एकाकी गायन
आज न जाने क्यों करता मन
सदा इसे मैं सुनता रहता
सदा इसे वह गाता जाता.
कोई पार नदी के गाता

किसकी हैं ये लाइनें. और किसकी हो सकती हैं सिवा बच्चन जी के.

ऐसे गीत जो पढ़ते ही मन में कहीं गहरे बैठ जाएँ. जीवन-जीवन भर के लिए बैठ जाएँ और कब जाने अनजाने में आपके अधरों से फूट पड़ें-ऐसे गीत तो हिंदी में एक ही कवि ने लिखे हैं-बच्चन.

'जेनुइन कविता'

'निशा निमंत्रण' और 'एकांत-संगीत' के गीतों ने हमारी सारी पीढ़ी के कैशोर्य को उद्वेलित किया है.

लगता था हमारी पीड़ा, हमारी कसक, हमारे सुख-दुख, हमारा अकेलापन जाने कैसे इस गीतकार के साथ एकाकार हो गया है. एक पूरी ज़िंदगी बीत सकती है उनके साथ. उन गीतों में रमकर.

सोचिए, आज लगभग 40-42 वर्ष बाद भी वह गीत ज्यों का त्यों मन में फूट पड़ा है अनायास और तरोताज़ा हैं ज्यों के त्यों उस गीत के सारे बोल, वह नीम की घनी डालियाँ, वह धूप में चमकता जमुना का हरियर पानी, वह नदी किनारे की धूप.

 ऐसे गीत जो पढ़ते ही मन में कहीं गहरे बैठ जाएँ. जीवन-जीवन भर के लिए बैठ जाएँ और कब जाने अनजाने में आपके अधरों से फूट पड़ें-ऐसे गीत तो हिंदी में एक ही कवि ने लिखे हैं-बच्चन
 

मैं नहीं जानता हिंदी के गणमान्य आलोचक 'जेनुइन' कविता किसे कहते हैं. पर मैंने जो कुछ थोड़ा-बहुत पढ़ा है उसमें सबसे जेनुइन लगे हैं बच्चन जी के ये उदासी भरे गीत.

मैं कहीं किसी प्रकार की तुलना के फरेब में नहीं डालना चाहता आपको. निराला, पंत, महादेवी, प्रसाद, मैथिलीशरण सभी अपनी जगह महान थे, बच्चन अपनी जगह बहुत आत्मीय थे.

हम जैसे सामान्य, भावप्रणव युवकों के ब्यौंत भर की थी वह कविता. मानो हमी ने अपने किसी तन्मय मूड में लिखी हो. पर क्या हममें से कोई वैसी एक पंक्ति भी लिख सकता था?

कितना कठिन होता है इतनी सहज भावानुमति की इतनी सहज कविता लिखना, बच्चन जी ने कहाँ से पाई यह शक्ति?

कैसा सामान्य जीवन उन्होंने कैसे असामान्य ढंग से जिया है इसका साक्षी है उसकी आत्मकथा का पहला खंड ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ आपने पढ़ा है? न पढ़ा हो तो एक बार ज़रूर पढ़िए.

क्या अनुभूति प्रवणता है, कैसी किस्सागोई और कैसा टटका गद्य. संस्कृत के आचार्यों ने कहा है ‘गद्यं कवीनाम् निकषं वदंति.’ यानी कवियों की प्रतिभा का असली कसौटी तो गद्य है.

बच्चन जी का गद्य पढ़कर पता चलता है कि यह कहावत कितनी सच है.

 
 
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