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शुक्रवार, 20 जुलाई, 2007 को 22:45 GMT तक के समाचार
 
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महुआ माजी को इंदु शर्मा सम्मान
 

 
 
महुआ माजी
महुआ माजी को अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा सम्मान से नवाज़ा गया
साठ वर्ष पहले एक देश... जिसे झेलनी पड़ी थी विभाजन की त्रासदी. देखते ही देखते एक देश के दो टुकड़े हो गए- बने भारत और पाकिस्तान, मानो एक वृहद वृक्ष को दो फाड कर दिया गया हो.

और फिर चंद साल ही गुज़रे हे थे उस वृहद वृक्ष की एक और टहनी अलग हो गई-बांग्लादेश के रुप में. और इस पूरे घटनाक्रम में न जाने कितने ही जीवन बिखर गए जो आज भी उन तारों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

कुछ संयोग ही था कि लंदन में हिंदी साहित्य के लिए दिए गए अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान और पद्मानंद साहित्य सम्मान पाने वाले दोनों लेखकों की कृतियाँ कहीं न कहीं विभाजन और उससे होने वाली टीस के इर्द-गिर्द घूमती थीं.

लंदन में शुक्रवार शाम कथा यूके ने हाउस ऑफ़ लार्ड्स में ये समारोह आयोजित किया.

इंदु शर्मा सम्मान

 बांग्लादेश के गठन की कहानी के ज़रिए मुझे ये दिखाना था कि धर्म के नाम पर जो लोग दंगे फ़साद कर रहे हैं, वो धर्म की लड़ाई है ही नहीं. असली लड़ाई सत्ता के लिए है. भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना और फिर पाकिस्तन से अलग होकर बांग्लादेश.अगर धर्म ही महत्वपूर्ण होता तो एक ही धर्म के लोग एक दूसरे से नहीं लड़ते और बांग्लादेश नहीं बनता
 
महुआ माजी

इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान भारत की युवा लेखिका महुआ माजी को उनके उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' के लिए दिया गया.

ये उपन्यास 1942 से शुरु होता है और अब तक के बांग्लादेश की कहानी को बयां करता है. वर्षों पहले लेखिका महुआ माजी का परिवार बांग्लादेश से भारत आकर बसा था और अपने उपन्यास में उन्होंने विभाजन की पीड़ा शब्दों के ज़रिए दर्शाने की कोशिश की है.

अपने पहले ही उपन्यास में इतना गंभीर विषय क्यों चुना उन्होंने, इस पर महुआ माझी कहती हैं, "बांग्लादेश के गठन की कहानी के ज़रिए मुझे ये दिखाना था कि धर्म के नाम पर जो लोग दंगे फ़साद कर रहे हैं, वो धर्म की लड़ाई है ही नहीं. असली लड़ाई सत्ता के लिए है. भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना और फिर पाकिस्तन से अलग होकर बांग्लादेश.अगर धर्म ही महत्वपूर्ण होता तो एक ही धर्म के लोग एक दूसरे से नहीं लड़ते और बांग्लादेश नहीं बनता."

पद्मानंद साहित्य सम्मान

डॉक्टर गौतम सचदेव को पद्मानंद साहित्य सम्मान दिया गया

बँटवारे से जुड़ी कुछ ऐसी ही दास्तां है कहानी संग्रह 'साढ़े सात दर्जन पिंजरे' जिसके लिए डॉक्टर गौतम सचदेव को पद्मानंद साहित्य सम्मान से नवाज़ा गया.

डॉक्टर सचदेव का परिवार पाकिस्तान में बसा था और वे करीब सात वर्ष के थे जब विभाजन के बाद उनके परिवार को घर-बार छोड़ भारत आना पड़ा.

डॉक्टर सचदेव कहते हैं कि वे स्मृतियाँ भुलाए नहीं भूलती और अपनी कहानी संग्रह के ज़रिए उन्होंने इन स्मृतियों को शब्दों में उताकर उनसे मुक्ति पानी की कोशिश की है.

वे कहते हैं, "विभाजन इतनी बड़ी त्रासदी थी जो इतना गहरा असर छोड़ गई, बहुत संघर्ष करना पड़ा भारत में आने के बाद मेरे परिवार को और मुझे. वो जो अनुभव थे वो मिटाए नहीं मिटते. मस्तिष्क अजीब कम्प्यूटर है जिसमें न जाने कब-कब की घटनाएँ और व्यक्ति समा जाते हैं और फिर पता नहीं कब उभर उठते हैं. शायद उन अनुभवों से मुक्ति पाने के लिए शब्द फूट पड़ते हैं-कभी कविता में, कभी कहानी में."

समारोह में पाकिस्तान की लेखिका नीलम अहमद बशीर, कथा यूके के महासचिव तेजेंद्र शर्मा और ब्रितानी मंत्री टोनी मैक्नल्टी समेत कई वरिष्ठ साहित्यकार शामिल थे.

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना कथा लेखिका और कवियत्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गई थी . हिंदी साहित्य में योगदान के लिए लोगों को सम्मानित करने के लिए पिछले कई वर्षों से कथा यूके ये समारोह लंदन में आयोजित करता आया है.

पद्मानंद साहित्य सम्मान पाने वालों में डॉक्टर सत्येंद्र श्रीवास्तव, दिव्या माथुर, नरेश भारतीय, भारतेंदु विमल, अचला शर्मा और ऊषा राजे सक्सेना शामिल है.

 
 
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