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एक नई साहित्यिक पत्रिका 'बया' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी में साहित्य की सुपरिचित पत्रिकाओं और कई अल्पज्ञात लघु पत्रिकाओं के बीच एक और नाम जुड़ा है, साहित्य वार्षिकी ‘बया’ का. इसका पहला अंक अभी बाज़ार में आया है. इस पत्रिका में पढ़ने की सामग्री इतनी है कि लगता है कि अपने भीतर चार किताबों की सामग्री लेकर आई है. इसमें कहानियाँ हैं, कविताएँ हैं, एक पूरा उपन्यास है और विचारोत्तेजक लेख हैं. इसका पहला खंड ‘आज की चिंता और चुनौतियाँ’ विचार को समर्पित है. 18 लेखों के इस खंड में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर विश्लेषण है. किसान समस्या से मीडिया की चुनौतियों तक का बारीक और बहस-तलब ढंग से जायज़ा लिया गया है. विभिन्न विधाओं की आलोचनात्मक पड़ताल के साथ ही फ़िल्म, फैशन और सेहत जैसे साहित्य से बाहर के विषयों के भी अलग-अलग कॉलम रखे गए हैं. यहाँ कमलेश्वर, शिवमूर्ति, अरुण कुमार, चित्रा मुद्गल, राजेन्द्र यादव, रामशरण जोशी, अतुल तिवारी के लेख हैं. दूसरा खंड में 17 कहानियाँ हैं. इसमें विद्यासागर नौटियाल, गिरिराज किशोर, कामतानाथ, असगर वजाहत और जाबिर हुसैन जैसे वरिष्ठ कथाकारों के नाम हैं. दूसरी कतार अवधेश प्रीत, तारा पंचाल, हरि भटनागर, मुकेश वर्मा जैसों की है. इनके साथ अल्पना मिश्र, कैलाश बनवासी जैसे युवा कथाकारों की उपस्थिति भी है. तीसरा खंड 25 कवियों की लगभग 100 कविताओं का है. राजेश जोशी, अरुण कमल, पंकज सिंह, लीलाधर मंडलोई, सविता सिंह, विनीत तिवारी जैसे चर्चित कवियों की कविताएँ हैं. अफ्रीकी कवि जॉर्ज आउनर विलियम्स, तेलुगु के वरवर राव और मैथिली के विद्यानंद झा की कविताएँ भी हैं. साथ में विनय कुमार और रामकुमार कृषक की सोलह ग़ज़लें भी हैं. चौथे खंड में कथाकार अमरकांत का ताज़ातरीन उपन्यास ‘विदा की रात’ है. इस उपन्यास की पृष्ठभूमि 1947 से 6 दिसंबर,1992 तक फैली हुई है. इस बीच, बार-बार और अलग-अलग स्तरों पर, बँटवारे की दंश की कथा है. आवरण सहित पूरे अंक की साज-सज्जा वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक ने की है जो पत्रिका के कला संपादक भी हैं. भीतर के पन्नों पर युवा चित्रकार पंकज दीक्षित और श्रीराम जोग के रेखांकन और कोलाज ध्यान खींचते हैं. हरेक कहानी के आरंभ में महाराष्ट्र के मेहनतकश वर्ग की कलाकृति ‘वारली पेंटिंग’ है. ‘बया’ के संपादक हैं गौरीनाथ, जो ख़ुद कथाकार तो हैं ही, अरसे से हिंदी के साथ मैथिली में भी संपादन-कर्म से जुड़े रहे हैं. कहा जा सकता है कि ‘बया’ एक पठनीय और संग्रहणीय पत्रिका है. बया | इससे जुड़ी ख़बरें लघु पत्रिकाएँ और नया संसार05 जनवरी, 2007 | पत्रिका साहित्य से दोस्ती29 दिसंबर, 2006 | पत्रिका क्यूँ अलग होती है इंटरनेट पत्रिका..?28 सितंबर, 2006 | पत्रिका पत्रकारिता की कालजयी परंपरा 15 सितंबर, 2006 | पत्रिका कैनवास बड़ा करने की कोशिश07 सितंबर, 2006 | पत्रिका कश्मीर की पहली महिला पत्रिका 'शी'23 मई, 2006 | पत्रिका पत्र-पत्रिकाओं का एक अनूठा संग्रहालय23 फ़रवरी, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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