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लंदन में कृष्णभक्ति की ओर बढ़ता रुझान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भौतिकता और आधुनिक जीवन शैली के पीछे भागमभाग की हो़ड़ से परे यहाँ लंदन में पश्चिमी देशों के काफ़ी लोग ईसाई धर्म त्याग कर कृष्णभक्ति के सहारे मोक्ष की प्राप्ति में लगे है. इनमें से कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अपनी उम्र के अलग-अलग पड़ावों में ईसाई धर्म छोड़, वैष्णव धर्म अपना लिया तो नई नस्ल के कुछ ऐसे युवक-यवती भी, जिन्हें कृष्ण भक्ति विरासत में मिली है. तौर-तरीक़ों और वैष्णवी परम्पराओं की कसौटी पर गोरी और काली चमड़ी के ये पश्चिमी युवा पीढ़ी किसी भी तरह भारतीय मूल के कृष्णभक्तों से कम नहीं लगती. 18 वर्षीय रसमयी देवी दासी हालैंड की हैं और फिलहाल पूर्वी लंदन के श्री चैतन्य सरस्वत मठ में रहती हैं. इनकी मां ने वैष्णव धर्म अपनाया था. उन्होंने तब अपना नाम सियासीले से बदल कर साची देवी रख लिया था. रसमयी हलके गेरुवे रंग की साड़ी और माथे पर लगे तिलक मे आत्मविश्वास से भरी नज़र आती हैं. रसमयी कहती हैं, " कृष्णभक्ति जीवन जीने का बेहतरीन तरीक़ा है जो भौतिकवादी चमकदमक से परे आपके अन्तर्मन को शांति और प्रसन्नता देती है". कनाडा की श्रीलेखा ने मात्र 19 वर्ष की आयु में वैष्णव धर्म अपना लिया था. तब वह श्रीलेखा के बजाये स्टेफोनी ओहनले हुआ करती थीं. आज 56 वर्ष की है. खुद को सरस्वत मठ का दासी मानती हैं.
वैष्णव धर्म और कृष्ण की उपासना संबंधी किसी भी प्रश्न का उत्तर वह ब्रह्मसंहिता के श्लोकों और मज़बूत तर्कों के आधार पर देती हैं. वह बताती हैं "यह मेरे पति श्री गोविंद प्रभु का प्रभाव है. गोविंद प्रभु पहले राबर्ट नाम से जाने जाते थे. जब इन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से धर्मशास्त्र का अध्ययन किया तो वैष्णव धर्म को ही अपने लिए उपयुक्त पाया". सवालों के जवाब श्रीलेखा कहती हैं "मेरे अनेक प्रश्नों का उत्तर मेरे पुराने ईसाई धर्म में नहीं मिला. अनेक देवी देवताओं की उपासना के बजाये हम कृष्ण की उपासना को ही महत्व देते हैं क्योंकि कृष्ण ईश्वर के रूप हैं". 35 वर्षीय कृष्ण कीर्तन दास अमरीकी देश वेनेजुएला से हैं.पहले इनका नाम फराडे था चैतन्य मठ में रह कर वैष्णव धर्म के प्रति लोगों में जागृति लाने का काम करते है. वह कहते हैं " क्रश्चियानिटी के बजाये हमें कृष्णभक्ति में संतोष मिला". एक सवाल के जवाब में कृष्ण कहते हैं "मैं हिंदू इस लिए नहीं हूँ क्योंकि मैं इंडिया का नहीं हूं. मैं तो वैष्णवी हूं". वह कहते हैं "ईश्वर का वजूद अपने दासों को डराने के लिए नहीं है. कृष्ण तो ऐसे ईश्वर हैं जो गायों और अपने नन्हे मित्रों के साथ खेलते हैं और जिनकी कल्पना करने से किसी तरह का भय मन में नहीं आता, बल्कि एक प्रेम का एहसास होता है". जगह की कमी इंग्लैड में कृष्णभक्तों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है. गैर भारतीय मूल के कृष्ण भक्तों की संख्या का आंकड़ा सरस्वत मठ के पास तो नहीं है लेकिन यहाँ के पूजारी ब्रजकिशोर कहते हैं " यहाँ प्रार्थना करने आने वालों की संख्या इतनी अधिक हो गई है कि अब श्रद्धालुओं को जगह नहीं मिलती. हम दूसरे स्थान की तलाश कर रहे हैं".
मठ के पूजारी ब्रजकिशोर ने 15 वर्ष की आयु में वैष्णव धर्म अपना लिया था. पहले उनका नाम रिकार्डो था और उनका परिवार पारम्परिक तौर पर कैथोलिक था. लेकिन जब उन्होंने अपनी आस्था बदलने की बात अपने पिता को बताई तो उन्हें काफी विरोध का सामना करना पड़ा. कई सालों बाद हालात सामान्य हुए. अभी तक उनका बाक़ी परिवार कैथोलिक धर्म का पालन करता है लेकिन इनके विचारों में कोई टकराव नहीं होता. ब्रजकिशोर शादीशुदा हैं. पत्नी भी कृष्णभक्त हैं. पूर्वी लंदन स्थित चैतन्य मठ में हर रविवार को कृष्णभक्तों की बड़ी संख्या पूजा के लिए आती है. इनमें धर्म परिवर्तित नए कृष्णभक्तों की संख्या भी काफी होती है. | इससे जुड़ी ख़बरें लंदन में जगन्नाथ यात्रा की झलकियाँ20 जून, 2004 | पहला पन्ना अपनी पहचान चाहते हैं ब्रिटेन के हिंदू11 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना ब्रितानी हिंदुओं को अन्य वर्गों का समर्थन18 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना पिछड़ी जाति में शादी करने पर इनाम!14 सितंबर, 2006 | भारत और पड़ोस लेबनान के मंदिर में सारे भगवान25 अगस्त, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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