BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
 
गुरुवार, 26 अक्तूबर, 2006 को 18:51 GMT तक के समाचार
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
'हर फ़ासला झूठा है, हर दूरी सियासत है'
 

 
 
इक़बाल की शायरी किसी सीमा की बंदी नहीं है
दो साल पहले की बात है,मैं वर्सोवा में अपनी लाइब्रेरी में जिगर मुरादाबादी के संग्रह आतिशेगुल से एक ग़ज़ल पढ़ रहा था-

वह कब के आए और गए भी, नज़र में अब तक समा रहे हैं
यह चल रहे हैं, वह फिर रहे हैं, वह आ रहे हैं, वह जा रहे हैं

और सोचता रहा, इस ग़ज़ल में फ़िल्म में इस्तेमाल होने वाली फ्लैश बैक की तकनीक का किस ख़ूबसूरती से प्रयोग किया गया है.

अतीत को वर्तमान में देखने की इस फ़िल्मी तकनीक का सेहरा शायर-आलोचक सरदार जाफरी ने साहिर लुधियानवी की एक लंबी कविता 'परछाइयां' की भूमिका में साहिर के सिर बांधा था. उन्हें इस संदर्भ में जिगर क्यों नहीं याद आए. यह एक ऐसा प्रश्न है जो हर युग में हर भाषा की आलोचना के माथे पर लगा नज़र आता है. किसी का काम किसी के नाम कर देना पुराना चलन है. फ़िल्म इंडस्ट्री में यह अकसर होता है.

फ़िल्म दीदार में एक गीत मुहम्मद रफी की आवाज़ में है. गीत के बोल हैं-हुए हम जिसके लिए बर्बाद, वह हमको चाहें करें न याद...यह गीत जो शकील बदायूँनी के नाम से फ़िल्म में है उसके शुरू में एक शेर भी है -

असीरे पंजए एहदे शबाब करके मुझे
कहाँ गया मेरा बचपन ख़राब करके मुझे

यह शेर मुज़तर ख़ैराबादी का है, जो मशहूर शायर-गीतकार जाँनिसार अख्तर के पिता थे लेकिन गीत के साथ शकील का नाम जाता है इसलिए कि शकील फ़िल्मों के लिए लिखते थे और मुज़तर अपने दूसरे समकालीनों की तरह सिर्फ़ कागजों तक सीमित थे. कागज़ पर छपी किताब पांच सौ या हज़ार की संख्या में प्रकाशित होती है और फ़िल्म एक होते हुए भी पूरे संसार में घूमती फिरती है.

मुज़तर एक ऐसे शायर हैं जिनकी ग़ज़लों का कोई संकलन नहीं छपा. इसके बावजूद उनके शेर कई लोगों की जुबान पर मुहावरों की तरह रहते है. उनके ऐसे ही दो शेर सिंधिया के ग्वालियर से उड़कर उन्नीसवीं सदीं के आखि़र में वहाँ पहुँच गए जहाँ उस जमाने में दाग़ देहलवी नवाब हैदराबादी के उस्ताद की हैसियत से रहते हैं.

इलाजे दर्दे दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकता
तुम अच्छा कर नहीं सकते मैं अच्छा हो नहीं सकता
तुम्हें चाहूँ, तुम्हारे चाहने वालों को भी चाहूँ
मेरा दिल फेर दो मुझ से यह सौदा हो नहीं सकता

जब उन्होंने ये दो शेर सुने तो इन गुमनाम शेरों की सरल सहज भाषा और शोखी देख कर उन्हें इन शेरों पर अपने होने का शक हुआ और उन्होंने इन शेरों में पांच-सात और शेर जोड़ कर अपनी ग़ज़ल बना ली.

दाग़ की शोहरत उन दिनों आसमान को छू रही थी. तवायफ़ों के कोठे से, कव्वालियों की महफिलों तक में उन्हीं की ग़ज़लों की हुक्मरानी थी. मुज़तर को जब ऐसी किसी महफिल में इसका पता लगा तो निहायत अदब से उन्होंने दाग़ साहब को ख़त लिखा-चचा हुजूर (मुज़तर दाग़ के समकालीन अमीर मीनाई के शागिर्द थे, चचा इसीलिए लिखा) आपकी ग़ज़ल सुनी, बहुत अच्छी है लेकिन इसे गुस्ताखी न समझें, तो मैं यह कहने की इजाज़त चाहूँगा कि इसमें पहले दो शेर मेरे कहे हुए हैं.

दाग़ ने जवाब में लिखा-बरखुरदार, तुम्हारे शेर हमारी शायरी के रंग में इतने मिलते थे कि हमें भी धोखा हो गया. तुम्हारे शेरों पर तुम्हें मुबारकबाद. इन्हें हम इस ग़ज़ल से निकाल देंगे. मैं अपनी लाइब्रेरी में जिगर से मुज़तर और मुज़तर के दाग से मिलने जुलने में व्यस्त था कि अचानक टेलीफोन की घंटी ने मुझे 19वीं सदी से 20वीं सदी की आखिरी दहाई की चौखट पर खड़ कर दिया.

नाम

टेलीफोन से आवाज़ आ रही थी. निदा फ़ाज़ली, मैं जावेद शेख हूँ. पाकिस्तान से आया हूँ. एक फ़िल्म 'यह दिल आप का हुआ' के नाम से बना रहा हूँ. आपसे गीत लिखवाना चाहता हूँ. जावेद शेख पाकिस्तान की फ़िल्मों और सीरियलों का लोकप्रिय नाम है. भारत में उनकी पहचान का एक हवाला जो मेरे जेहन में था वह सलमा आगा से उनके रिश्ते का भी था जो बाद में ख़त्म हो गया था.

जावेद शेख़ पाकिस्तान में काफ़ी लोकप्रिय हैं

यहाँ मेरे साथ काम करने की ख़ुशी उन्होंने जाहिर की. मैंने फ़िल्म की कहानी सुनी, कहानी मुझे अच्छी लगी, कहानी पसंद आने के बाद पैसों के लेनदेन की बात हुई. वह पाकिस्तान के बजट के हिसाब से देना चाहते थे. मैं हिंदुस्तान के बाज़ार के हिसाब से लेना चाहता था. आखिरकार थोड़ा वह बढ़े थोड़ा मैं पीछे हटा और फिर काम शुरू हो गया.

इस फ़िल्म में सात गीत थे. इन सारे गानों को पाकिस्तानी धुनों पर हिंदुस्तान की प्ले बैक आवाजों में, बंबई के स्टु़डियोज में रिकार्ड किया गया. फ़िल्म जावेद शेख की निर्देशन में बहुत सफल साबित हुई. पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ ने ख़ास तौर से कॉपी मंगाकर इसे अपने परिवार के साथ देखा. लेकिन जब अपने घर में मैंने इसकी सीडी देखी तो फ़िल्म में न मेरा नाम था न किसी पार्श्व गायक का.

इस बार काम के साथ नाम न रहने की वजह राजनीति थी. दोनो मुल्कों के संबंध अच्छे नहीं थे. बाद में जब जार्ज बुश की मेहरबानी से दोनो तरफ से दोस्ती के हाथ बढ़े तो फ़िल्म को जो पुरस्कार दिए गए उनमें से एक मेरे नाम की भी ट्रॉफी थी.

मैंने मुज़तर की तरह शिकायत भी न की थी, न जावेद शेख ने दाग़ की तरफ़ कोई सफ़ाई दी थी. मैंने किसी एलबम में लिखा था-

हर फ़ासला झूठा है, हर दूरी सियासत है
ये दुनिया जहाँ तक है इन्साँ की विरासत है

कायदे के मुताबिक जब फ़िल्म कामयाब होती है तो फ़िल्म से संबंधित पूरी टीम को दोहराया जाता है. जावेद शेख ने अपनी दूसरी निर्माणाधीन फ़िल्म 'खुले आसमान के नीचे' में गीत लिखने के लिए मुझे इस बार लाहौर बुलाया. दो-तीन दिन में सारे गीत पूरे कर दिए और फिर एक दिन दोस्तों के साथ शहर का वह हिस्सा देखने गया जहाँ बाबा नानक के ननकाना साहब से थोड़ी दूर पर डॉक्टर इक़बाल का मज़ार है.

इक़बाल को भले ही देश विभाजन के बानियों में शुमार किया जाए लेकिन यह एक हक़ीक़त है कि उनकी शायरी गालिब, मिल्टन, कबीर, टैगोर आदि की तरह किसी सीमा की बंदी नहीं है.

उनका गीत 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' आज भी भारत में हर जगह सुना जाता है और उनकी काव्य व्यापकता का ध्वज फहराता है. उनके मज़ार में जब दाखिल हुआ तो एक बुर्कापोश स्त्री हाथ फैलाए दुआ माँग रही थी, या इक़बाल शेख़ मेरी ख़ाली गोद भर दो.

उसकी दुआ सुनकर मुझे लगा जैसे सियासत ने फ़िल्म से मेरा नाम निकाल दिया था. इस स्त्री की अकीदत इक़बाल से उनकी शायरी छीन कर उन्हें पीर बना रही है.

 
 
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़अंदाज़े बयाँ और...
निदा फ़ाज़ली बता रहे हैं कि 'ताला' खुलने का ताल्लुक अनुभव से है.
 
 
इस्मत चुग़ताईअंदाज़-ए-बयाँ और...
निदा फ़ाज़ली कहते हैं कि इस्मत चुग़ताई आज़ाद औरत की ज़िंदा पहचान थीं.
 
 
कैफ़ी आज़मीअंदाज़-ए-बयाँ और...
निदा फ़ाज़ली कहते हैं कि कैफ़ी आज़मी समाज के शोषित वर्ग के शायर थे.
 
 
राज कपूरअंदाज़-ए-बयाँ और...
फ़िल्म अभिनेता राजकपूर आज भी यादों के रूप में मेरे ज़हन में ज़िंदा हैं.
 
 
ग़ालिबअंदाज़-ए-बयाँ और...
इस हफ़्ते से पढ़िए मशहूर शायर और लेखक निदा फ़ाज़ली की क़लम से.
 
 
इससे जुड़ी ख़बरें
यादों का एक शहर...
22 सितंबर, 2006 | पत्रिका
ताले और अक्षरों का तालमेल
08 सितंबर, 2006 | पत्रिका
सुर्ख़ियो में
 
 
मित्र को भेजें कहानी छापें
 

  मौसम |हम कौन हैं | हमारा पता | गोपनीयता | मदद चाहिए
 
BBC Copyright Logo ^^ वापस ऊपर चलें
 
  पहला पन्ना | भारत और पड़ोस | खेल की दुनिया | मनोरंजन एक्सप्रेस | आपकी राय | कुछ और जानिए
 
  BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>