शुक्रवार, 08 सितंबर, 2006 को 08:11 GMT तक के समाचार
देवानंद
अतिथि संपादक, बीबीसी पत्रिका
मैं तो फ़िल्मों का आदमी हूँ. कहानियाँ लिखता हूँ, फ़िल्में बनाता हूँ और निर्देशित करता हूँ. मैं पढ़ा-लिखा हूँ और दुनिया को जानता हूँ. मैं ख़बरों से जुड़ा हुआ हूँ.
लेकिन अब तक मैंने संपादक के रुप में कोई काम नहीं किया है. पहली बार ही मुझे अतिथि संपादक बनने को कहा गया है. और जब यह प्रस्ताव बीबीसी हिंदी की ओर से आया है तो मुझे अच्छा भी लग रहा है. उम्मीद करता हूँ कि यह ज़िम्मेदारी भी मैं बखूबी निभा सकूँगा.
बीबीसी के साथ मेरा संपर्क और संबंध बरसों पुराना है. पहली बार बीबीसी में मेरा इंटरव्यू 50 के दशक में आया था, जब मैं लंदन गया हुआ था. इसके बाद ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ के रिलीज़ के लिए मैं फिर वहाँ गया और फिर ‘देश-परदेश’ की शूटिंग के लिए. अपनी पिछली फ़िल्म ‘मैं 16 बरस की’ की शूटिंग के लिए मैं स्कॉटलैंड में था. और हर बार बीबीसी वालों ने मुझे पकड़ लिया. मैं ख़ुशी-ख़ुशी पकड़ा भी जाता रहा. मेरे कई मित्र वहाँ हैं.
बीबीसी मुझे प्रिय रहा है. मैं जब भी ख़बरों के बारे में सोचता हूँ तो बीबीसी के बारे में ही सोचता हूँ. बीबीसी ईमानदार है, इसका नेटवर्क अच्छा है और वह अपने लोगों को ऐसी-ऐसी जगह भेजता है जहाँ कोई नहीं जाता.
मैं भी ऐसा ही रहा हूँ. मैं ही था जो पहली बार यूरोप गया, नेपाल गया और दुनिया के दूसरे हिस्सों में गया. मैंने वो बात की जो कोई और नहीं करता. मैंने वो फ़िल्में बनाईं जो कोई और नहीं बना रहा था. मैंने नए आइडिया पर विचार किया और उनको आत्मसात भी किया.
जब ‘नवकेतन’ ने ‘गाइड’ बनाने का फ़ैसला किया तो लोगों ने कहा, ‘ये क्या कर रहा है’, ‘पैसा डुबोएगा’, ‘यह कोई कहानी है जिसमें हीरो साधु बन जाता है और फिर मर जाता है’. लेकिन हमने फ़िल्म बनाई और आज वह एक इतिहास है.
मैं किसी की नकल नहीं करता. मैं शुरु से ही अपने आपको एक्सक्लूसिव ही समझता हूँ. इसलिए बीबीसी से जुड़ना अच्छा ही लग रहा है क्योंकि बीबीसी भी अपने आपको एक्सक्लूसिव ही बनाए रखता है.
लोग मुझे सदाबहार कहते हैं. मैं नहीं जानता कि वो ऐसा क्यों कहते हैं. शायद इसके पीछे मेरी ‘क्रिएटीविटी’ है. मैं लिखने-पढ़ने वाला, सोच-विचार वाला आदमी हूँ.
मुझे लगता है कि जब तक आप सोच विचार करते रहेंगे, अपने-आपमें व्यस्त रहेंगे तो युवा बने रहेंगे. मैं ऐसा करता हूँ और साथ में बहुत से युवा लोगों के साथ काम करता रहता हूँ.
मैं हमेशा चुनौतियाँ स्वीकार करने को तैयार रहता हूँ. मैं साठ साल से फ़िल्म इंडस्ट्री में काम कर रहा हूँ और मेरी क्रिएटीविटी ही है कि मैं आज भी चल रहा हूँ. ऐसा कोई दूसरा नहीं है.
बीबीसी हिंदी भी एक चुनौती स्वीकार कर रहा है. यह उम्मीद जगाने वाली बात ही है.