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ठहरा हुआ नहीं दिखना चाहिए | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया जो कहती है, वह कहती ही रहेगी. कोई भी अच्छी चीज़ करने जाओ तो लोग पहले रोकते हैं, टोकते हैं. फिर धीरे-धीरे पसंद आने लगती है तो आहिस्ता-आहिस्ता इसकी तारीफ़ करने लगते हैं. दरअसल लोगों को वही चीज़ पसंद आती है जो उन्हें अपनी सी लगती है. अगर, आपने किसी चरित्र को कहानी में उसी तरह से ढाला है जिस तरह से महसूस करते हैं को लोगों को कहानी में आनंद आएगा. जब तक आप लोगों को यह महसूस नहीं करवाएँगे कि आप उन्हें कल्पनाशील होने का मौक़ा दे रहे हैं तब तक वे इसका आनंद नहीं ले पाएँगे. मैं मूलरुप से गुरदासपुर का रहने वाला हूँ. मेरे पिता वहाँ वकालत किया करते थे. गुरुदासपुर से मैं कॉलेज में पढ़ाई के लिए लाहौर चला गया फिर भारत-पाकिस्तान के विभाजन से पहले मुंबई आ गया. मुंबई में दो-ढाई साल के संघर्ष के बाद मुझे काम मिलना शुरु हुआ. तब से मैं फ़िल्मों में काम शुरु करने से पहले अपनी स्क्रिप्ट पढ़ता रहा हूँ. अब तो मैं ख़ुद ही इस पर काम करता हूँ और हमेशा ओरिजनल पर भरोसा करता हूँ. जैसै ही आप नकल की बात करते हैं, फ़िल्मों के लिहाज़ से देखें, तो जैसे ही आप रीमेक की बात करते हैं तो आप एकाएक आप ज़ाहिर कर देते हैं कि आपका अपना दिमाग़ ख़ाली हो गया है. 15-20 साल पहले बनी फ़िल्मों को अगर फिर से बनाने की बात चल रही है तो इसका अर्थ यह है कि आप डरे हुए हैं. जो चल चुका है, जो मशहूर है आपको लगता है कि वह फिर एक बार चल जाएगा. मैं तो उसकी तारीफ़ करता हूँ जो अपने दिलो-दिमाग़ से नई बात निकाले, उसे सफल बनाए. पचास साल बाद भी लोग उसकी तारीफ़ करेंगे.
मैं तो भविष्य के बारे में सोचता हूँ. कई बार इसका नुक़सान भी होता है. फ़िल्मों की अगर बात करुँ तो कई बार लोगों को बात एकबारगी समझ में नहीं आती. जब धीरे-धीरे वे समझने लगते हैं तब तक फ़िल्म चली जाती है. फिर भी मैं कोशिश नहीं छोड़ता. मुझे ऐसा करने की कोई मजबूरी नहीं है. मेरे पास वो सब कुछ है जो एक आराम की ज़िंदगी के लिए ज़रुरी है. मेरे पास खाने के लिए दो वक़्त की रोटी है, कार है, परिवार है. कुल मिलाकर मैं सुखी हूँ. लेकिन बार-बार लगता है कि कुछ तो ऐसा काम कर जाऊँ जिसे लोग याद रख सकें. अगर मैं अपने अनुभव का, दिमाग़ का इस्तेमाल नहीं करुँगा तो कौन करेगा? और फिर मैं ख़ुद क्या करुँगा? मैं ठहरा हुआ नहीं दिखना चाहता. जो देवानंद नहीं हैं, वो इस बात को नहीं समझ सकते. | इससे जुड़ी ख़बरें यह भी एक चुनौती है08 सितंबर, 2006 | पत्रिका देवानंद को मिला दादा साहब फाल्के सम्मान30 दिसंबर, 2003 | पत्रिका देवानंद : एक सदाबहार अभिनेता30 दिसंबर, 2003 | पत्रिका देवानंदः एक लंबा सफ़र09 दिसंबर, 2003 | पत्रिका त्रिलोचन की दो कविताएँ07 सितंबर, 2006 | पत्रिका उपन्यास 'आकाश चम्पा' का अंश08 सितंबर, 2006 | पत्रिका कायांतरण08 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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