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शुक्रवार, 29 जुलाई, 2005 को 18:40 GMT तक के समाचार
 
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रचना दृष्टि की प्रासंगिकता -मन्नू भंडारी
 
प्रेमचंद
सुपरिचित लेखिका मन्नू भंडारी का कहना है कि लेखक की प्रासंगिकता की बजाय लेखक की रचनाओं की प्रासंगितकता पर ध्यान देना चाहिए, इस दृष्टि से प्रेमचंद इस समय भी प्रासंगिक दिखाई देते हैं.

वे मानती हैं कि जो भी समस्याएँ समाज में थीं प्रेमचंद ने सभी पर अपनी कलम चलाई.

दिल्ली में विनोद वर्मा से हुई बातचीत के प्रमुख अंश..

आप प्रेमचंद को किस तरह याद करती हैं?

हमारी पीढ़ियाँ रही हैं जिसने प्रेमचंद को आत्मसात किया है. मैं दूसरों के योगदान को नकारती नहीं हूँ पर मुख्य रुप से जैसी हमारी पीढ़ी, उनके सामाजिक दृष्टि थी उनके जो सामाजिक सरोकार थे, वह मुझे लगता है कि किसी भी लेखक के लिए अनिवार्य शर्त है. वह मुझे लेखकीय अनिवार्यता लगती है कि आप अपने समाज और समय के साथ गहरे से जुड़े हुए हों और उन समस्याओं को, उन स्थितियों को, अपने उस परिवेश के अंदर जो कुछ भी हो, उससे आपका जुड़ाव हो.

अपने समय के या अपने समय की समस्याओं के प्रति ख़ासकर, भावनाओं के प्रति लेखक का जो लगाव होता है वह अभिव्यक्ति देता है रचनाओं में वहीं मुझे उनका सबसे बड़ा योगदान लगता है.

उनके संपूर्ण साहित्य और उनके संपूर्ण जीवन दृष्टि को दृष्टिगत रखकर बात करनी चाहिए. साहित्य के प्रति और साहित्य के हर दृष्टि के प्रति यानी चाहे राजनीतिक, सामाजिक, पारिवारिक सभी को उन्होंने जिस तरह अपनी रचनाओं में समेटा और खासकरके एक आम आदमी को, एक किसान को, एक आम दलित वर्ग के लोगों को वह अपने आप में एक उदाहरण था. साहित्य में दलित विमर्श की शुरुआत शायद प्रेमचंद की रचनाओं से हुई थी.

क्या आपको लगता है कि नारी विमर्श की शुरुआत भी प्रेमचंद ने की थी?

नारी विमर्श, सच पूछा जाए तो प्रेमचंद ने साहित्य में ख़ास एक शुरुआत तो की थी हर चीज़ की. प्रेमचंद ने समाज के समय की जो भी समस्याएँ थीं उन सभी को उन्होंने चित्रित किया था. उसमें जैसे दलित भी आते हैं, नारी भी आती हैं. लेकिन बहुत सी ऐसी चीज़ हैं जैसे गोदान का जो गाँव वाला पक्ष है उसकी मैं बहुत समर्थक हूँ. लेकिन आपको रचनाओं को उनके समय के संदर्भ में देखना चाहिए, संदर्भ से काटकर नहीं.

लेकिन उनकी बहुत सी रचनाओं से आज सहमत होना संभव नहीं है. सेवासदन में जो समाधान उन्होंने प्रस्तुत किए हैं उससे मैं सहमत नहीं हूँ. वेश्याओं के लिए उन्होंने एक सदन खुलवा दिया या ऐसे जो एक आदर्शवादी, आदर्शवाद उनके भीतर था. कहीं गाँधी से हृदय परिवर्तन की बात भी आई थी और एक आदर्श का पुट उनकी रचनाओं में शुरू में, बाद में वे उससे धीरे-धीरे मुक्त हो गए थे. और उनकी आरंभिक रचनाओं में बहुत अच्छी तरह से देखा जा सकता है.

क्या उनकी रचनाएँ और उनके समाधान आपको अब भी प्रासंगिक नज़र आते हैं?

मुझे लगता है कि किसी लेखक की रचनाओं की प्रासंगिकता की बात करने की बजाए उस लेखक की जीवन दृष्टि की बात करनी चाहिए. आज हमको प्रेमचंद रचनाओं की वजह से नहीं पर वही उनके जो सरोकार थे उसकी वजह से प्रासंगिक लगते हैं. आज तो और भी ज़्यादा उस दृष्टि की ज़रूरत है. जो राजनीतिक और सामाजिक हालत हमारे देश में हो गई है, उसके चलते यदि ख़ून न खौले किसी लेखक का और वह उसे अभिव्यक्ति न दे, तो शायद वह अपने दायित्व को पूरा नहीं करेगा.

इसीलिए मुझे लगता है कि रचनाएं कि ये रचनाएं प्रासंगिक हैं. रचनाओं की बात करने के बजाए उनकी जो पूरी जीवन दृष्टि थी उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

 
 
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