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मंगलवार, 10 मई, 2005 को 05:26 GMT तक के समाचार
 
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मंटो के एक पाठक का नज़रिया
 

 
 
नीरज कुमार 'आयुश'
साहित्य में रुचि होने के कारण मैं अपने दिन का कुछ समय पुस्तकालयों में गुज़ारा करता था. ऐसे ही एक दिन पुरानी पत्रिकाओं में अंक खंगाल रहा था कि मेरे नज़रों के सामने एक पत्रिका आई.

यह 'सारिका' का जब्तशुदा कहानियों का विशेषांक था.

अंक पलटते हुए एक पन्ने पर मेरी नज़र ठहर गई, “मंटो ने काटे लम्हे गिन-गिन “ठंडा गोश्त” पर फैसले के दिन.” मेरी जिज्ञासा बढ़ी तो मैंने उसके और अंक निकाले.

और मैं सचमुच में अवाक रह गया जब मैंने मंटो की कहानी “ठंडा गोश्त” पढ़ी.

वह मेरा मंटो से पहला परिचय था.

क्या गज़ब की मानवीय विश्लेषण और सहजता थी. अभी मैं इस विस्फोट से उबर भी नहीं पाया था कि एक दूसरे अंक में “धुआँ” और “बू” पढ़ने को मिली.

मैं सोचने लगा कि अब तक जो मैंने पढ़ा क्या वह फिज़ूल था. फिज़ूल न भी रहा हो तो अब तक पढ़ा साहित्य अधूरा तो ज़रुर था.

तस्वीर

इन तीन कहानियों से मेरे ज़ेहन में मंटो की दो तस्वीर उभर कर आई. पहला, मंटो मानवीय रिश्तों का कुशल चितेरा था और मात्र इन्ही कहानियों के बदौलत मैंने उसे फ्रायड के समकक्ष देखना शुरु कर दिया.

दूसरा, वह केवल मानव के उस पक्ष को ही उजागर करता था, जिसे आम भाषा में अश्लील कहा जाता है. लेकिन मेरी दूसरी मान्यता बहुत जल्दी ही धराशायी हो गई, क्योंकि अब मेरे सामने मंटो की कहानी “टोबा टेक सिंह” मौजूद थी. “टोबा टेक सिंह” ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह बंदा है कौन? और न जाने कितने दिनों तक मैं उसकी लाइनें “औपड़ दि गड़-गड़ दि अनैक्स दि बेध्यानाँ दि मुंग दि दाल ऑफ दी पाकिस्तान एंड हिंदुस्तान ऑफ दी दुर फ़िटे मुँह..” खुद भी बड़बड़ाता रहा और अपने दोस्तों को भी याद कराता रहा.

लोग पूछते- यह है क्या ? मैं बोलता न जाने “टोबा टेक सिंह” है या “सआदत हसन मंटो” हैं. जानने के लिए दोनों को ही पढ़ना होगा.

मुझे बाक़ी सारा साहित्य या तो फिजूल लग रहा था या मंटो की तेज़ कलम के आगे फ़ीका.

तभी कहीं से एक संग्रह “मंटो की बदनाम कहानियाँ” मिल गया. इस किताब के माध्यम से मंटो के जीवन की मुख्तसर-सी झलक मिली.

मैं जीवन के विभिन्न पहलुओं पर मंटो की बारिकियों को महसूस कर रहा था.

अब बारी थी, बँटवारे के दौरान हुए दंगों की. मंटो की “खोल दो” कहानी में दंगों का जो वर्णन है, वह शरीर में झुरझुरी पैदा कर देता है.

कुल मिलाकर यह कि सारिका में कुछ अंकों ने मेरे अंदर जो जिज्ञासा का बीज बोया था, इस छोटे से संग्रह ने उसे एक पौधे का रूप दे दिया था. मैंने इसे सींचना शुरू किया और अंततः मेरे हाथ “दस्तावेज़” नाम से प्रकाशित एक समग्र संग्रह लग गया.

इस संग्रह के पन्ने-दर-पन्ने मैं पलटता रहा और परत-दर-परत मंटो एक दस्तावेज़ के रूप में मेरे जेहन में उतरता चला गया.

मानवीय सरोकार

क्या कहानियाँ, क्या कविताएं, क्या निबंध, क्या उपन्यास. सभी का एक विशेष अंदाज़ था और इस तरह लेखन की एक चमत्कारिक विधा से मैं भली भॉति परिचित हुआ.

मुझे लगा, मंटो तो साहित्य की धूरी है जिसके चारों ओर तमाम तरह का लेखन फैला हुआ है.

मंटो की भाषा-शैली एवं साहित्यिक विशेषता पर मुझ जैसे आम पाठक का लिखना ठीक नहीं होगा, लेकिन इतना तो मैं कह ही सकता हूँ कि अपने यथार्थवादी मानवीय सरोकार और नैतिक बोध के कारण मंटो अद्वितीय हैं.

मंटो के लेखन में आदमी के पतन की पराकाष्ठा है, पीढ़ियों का टकराव है, समाज का बिखराव है और इन सबसे इतर सहजता है जो चोर को चोर, दलाल को दलाल और वेश्या को वेश्या कहता है.

और यह कहते हुए न तो उसकी जुबान लड़खड़ाती है और ना ही उनकी पेशानी पर बल पड़ते हैं.

मानवीय विभत्सता, उल-जलूल हरकतों, आपसी घृणा-नफ़रत को अपनी कहानियों में प्रकट करते समय मंटो पाखंड से दूर रहते हैं, बल्कि कहीं-कहीं तो वह थोड़े दुख और मसखरेपन के साथ इन सबका तमाशा देखता है और मज़ा भी लेता है.

और यहीं से मैं गंभीर अध्ययन की शुरुआत करता हूँ.

 
 
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