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मंगलवार, 10 मई, 2005 को 11:12 GMT तक के समाचार
 
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'औरत को इंसान के रुप में पेश किया'
 

 
 
मंटो
मंटो की कई कहानियों पर अश्लीलता के मुक़दमे चले
सुपरिचित लेखिका नासिरा शर्मा मानती हैं कि मंटो ने स्त्रियों को एक मनुष्य के रुप में देखा और उसी रुप में उनके साथ व्यवहार किया.

वे मानती हैं कि मंटो का लेखक अश्लील नहीं था और उन्होंने जीवन की तल्ख़ी को बेहद संतुलित भाषा में लोगों तक पहुँचाया.

बीबीसी के लिए की गई एक बातचीत में उन्होंने कहा कि मंटो की कहानियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी उनके समय में थीं.

प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के अंश -

मंटो ने अपनी रचनाओं में महिलाओं का जो चरित्र पेश किया हैं उनको पढ़कर आपको क्या लगता हैं, महिलाओ के बारे में मंटो का क्या दृष्टिकोण था?

मेरा ख़याल है कि मंटो ने औरतों पर कहानी लिखी, मगर यह सोच कर नहीं लिखी कि वे औरतों पर लिख रहे हैं.

उन्होनें उसके दर्द और त्रासदी पर क़लम उठाई, मगर उसे आन्दोलन बना कर नही, बल्कि उन्होंने औरत को इन्सान की तरह पेश किया हैं और समाज से पूछा कि आख़िर उनके साथ, ख़ासकर उसके एक विशेष वर्ग और विशेष स्थितियों में ज़्यादती क्यों?

नासिरा शर्मा

मेरा मानना है कि मंटो की कहानियों के इन्सान, वे इन्सान हैं जो हाशिये पर पड़े हुए हैं और जिनसे आप बड़ी आसानी से नफ़रत कर सकते हैं.

उन्होंने हमें उनसे न सिर्फ़ हमदर्दी बल्कि मुहब्बत करना भी सिखाया. मंटो की कहनियों की स्त्री-पात्र अपनी खूबियों, अपनी कमज़ोरियों, अपने हालात और अपनी आदतों के साथ हमारे सामने आती हैं.

कहानी ''खोल दो'' लिख कर मंटो ने करोड़ों लड़कियों और औरतों पर हो रहे ज़ुल्म और बदकारी पर अपनी गहरी नज़र डाली. हालांकि आज स्त्री सुरक्षा पर काम हो रहा है, अदब में भी और समाज में भी, मगर जब इस सदी के आरम्भ में गुजरात में दंगा भड़कता है तो गुज़री सदी की सारी त्रासदियों को पार कर जाता है और 'खोल दो' कहानी कल की जगह आज की कहानी लगने लगती है.

उन पर एक बड़ा आरोप था कि उनकी भाषा अश्लील और फूहड़ है?

मैं नहीं कहूँगी कि वह अश्लील है क्योंकि वो जीवन की हक़ीकत को बयान करने वाली कहानियाँ हैं. जैसे ऊपर नीचे और दरमियान उनकी एक कहानी है और मुझे वो कहानी बहुत दिलचस्प लगती है.

उसकी तुलना में आज के लेखक ज़्यादा अश्लील भाषा में लिख रहे हैं और ज़्यादा खुला विवरण दे रहे हैं और इसके बावजूद उनका लेखन कहीं नहीं पहुँच पा रहा है. इस तरह से देखें तो मंटों ने ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीकतों को बहुत ही संतुलित शब्दों में हमें दिया है.

आपकी नज़र में मंटो कितने प्रासंगिक हैं आज?

जहां तक मैं समझती हूं मंटो ने जिन विषयों पर कहानियां लिखीं,वह मुद्दे आज भी हमारे समाज के नासूर बने हुए हैं. मंटो हमारा अतीत बन चुके हैं मगर उन का साहित्य हमारा वर्तमान है. वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने वह बँटवारे से पहले और बंटवारे के बाद रहे. आज भी उनके गढ़े हुए पात्र लगातार हमारे साथ भेष बदलकर यात्रा कर रहे हैं. काली शलवार का वह मर्द आज पुरूष वेश्या में बदलकर, सभ्य समाज का एक अंग बनकर एक ख़ास तबक़े की ज़रूरत बन चुका हैं और आज भी सुगंधी रेड लाइट एरिया में सांसें ले रही हैं.

यही कारण और प्रमाण हैं कि मंटो की कहनियाँ हमें आज भी नई और तरो-ताज़ा लगती हैं जबकि उनके विषय पुराने हैं। वह कमज़ोरियां पुरानी हैं जो इन्सान को जानवर बनाती हैं. मंटो के बनाए हुए इन्सान हमें अलग-अलग रंग में मिलते रहते हैं, वह इतने पारदर्शी होते हैं कि हम उनके अन्दर के तहख़ाने में बाखूबी उतर जाते हैं. मंटो की कहानियां सच के बहुत क़रीब हैं और यही वह ख़ूबी है जो मंटो को आज भी प्रासांगिक बनाती है.

 
 
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