सोमवार, 13 दिसंबर, 2004 को 11:40 GMT तक के समाचार
जावेद अख़्तर
लेखक और कवि
मेरा स्कूल यूनिवर्सिटी एरिया में ही है. मेरी दोस्ती स्कूल के दो-चार लड़कों के अलावा ज़्यादातर यूनिवर्सिटी के लड़कों से है.
मुझे बड़े लड़कों की तरह होटलों में बैठना अच्छा लगता है. अक्सर स्कूल से भाग जाता हूँ. स्कूल से शिकायतें आती हैं.
कई बार घर वालों से काफ़ी पिटा भी, लेकिन कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. कोर्स की किताबों में दिल नहीं लगा तो नहीं लगा. लेकिन नॉवेल बहुत पढ़ता हूँ. डाँट पड़ती है लेकिन फिर भी पढ़ता हूँ.
मुझे शेर बहुत याद हैं. यूनिवर्सिटी में जब भी उर्दू शेरों की अंताक्षरी होती है, मैं अपने स्कूल की तरफ़ से जाता हूँ और हर बार मुझे बहुत से ईनाम मिलते हैं.
यूनिवर्सिटी के सारे लड़के-लड़कियाँ मुझे पहचानते हैं. लड़के मुझे पहचानते हैं मुझे इसकी खुशी है, लड़कियाँ मुझे पहचानती हैं इसकी थोड़ी ज़्यादा खुशी है.
पहला प्रेमपत्र
...अब मैं कुछ बड़ा हो चला हूँ... मैं पंद्रह साल का हूँ और ज़िंदगी में पहली बार एक लड़की को ख़त लिख रहा हूँ, मेरा दोस्त बीलू मेरी मदद करता है.
हम दोनों मिलकर यह ख़त तैयार करते हैं. दूसरे दिन एक ख़ाली बैडमिंटन कोर्ट में वो लड़की मुझे मिलती है और हिम्मत करके मैं यह ख़त उसे दे देता हूँ.
यह मेरी ज़िंदगी का पहला और आखिरी प्रेम-प्रत्र है. (उस ख़त में क्या लिखा था, यह भूल गया लेकिन वो लड़की आज तक याद है).
मैट्रिक के बाद अलीगढ़ छोड़ रहा हूँ.
मेरी ख़ाला बहुत रो रही हैं और मेरे मौसा उन्हें चुप कराने के लिए कह रहे हैं कि तुम तो इस तरह रो रही हो, जैसे यह भोपाल नहीं 'वार फ़्रंट' यानी युद्ध के मैदान में जा रहा हो (उस वक़्त न वो जानते थे, न मैं जानता था कि मैं सचमुच 'वार फ़्रंट' पर ही जा रहा था)
शहर भोपाल... किरदार- अनगिनत मेहरबान, बहुत से दोस्त और मैं... अलीगढ़ से बम्बई जाते हुए मेरे बाप ने मुझे भोपाल या यूँ कहिए आधे रास्ते में छोड़ दिया है.
कुछ दिनों अपनी सौतेली माँ के घर में रहा हूँ. फिर वो भी छूट गया.
दोस्त और भोपाल
सोफ़िया कॉलेज में पढ़ता हूँ और दोस्तों के सहारे रहता हूँ. दोस्त, जिनकी लिस्ट बनाने बैठूँ तो टेलीफ़ोन डायरेक्ट्री से मोटी किताब बन जाएगी.
आजकल मैं बीए सैकेंड इयर में हूँ. अपने दोस्त एजाज़ के साथ रहता हूँ. किराया वो देता है. मैं तो बस रहता हूँ.
वो पढ़ता है और ट्यूशन करके गुज़र करता है. सब दोस्त उसे मास्टर कहते हैं... मास्टर से मेरा किसी बात पर झगड़ा हो गया है. बातचीत बंद है इसलिए मैं आजकल उससे पैसे नहीं माँगता, सामने दीवार पर टँगी हुई उसकी पैंट में से निकाल लेता हूँ वो वग़ैर मुझसे बात किए मेरे सिरहाने दो-एक रुपए रखकर चला जाता है.
मैं बीए फ़ाइनल में हूँ, यह इस कॉलेज में मेरा चौथा बरस है. कभी फ़ीस नहीं दी... कॉलेज वालों ने मांगी भी नहीं, यह शायद सिर्फ़ भोपाल में ही हो सकता है.
कॉलेज के कम्पाउंड में एक खाली कमरा, वो भी मुझे मुफ़्त दे दिया गया है, जब क्लास ख़त्म हो जाती है तो मैं किसी क्लास रूम से दो बेंच उठाकर इस कमरे में रख लेता हूँ और उन पर अपना बिस्तर बिछा लेता हूँ. बाक़ी सब आराम है बस बैंचों में खटमल बहुत हैं.
जिस होटल में उधारखाता था वो मेरे जैसे मुफ़्तख़ोरों को उधार खिला-खिलाकर बंद हो गया है. उसकी जगह जूतों की दुकान खुल गई है.
अब क्या खाऊँ. बीमार हूँ, अकेला हूँ, बुख़ार काफ़ी है, भूख उससे भी ज़्यादा है. कॉलेज के दो लड़के, जिनसे मेरी मामूली सी जान पहचान है मेरे लिए टिफ़िन में खाना लेकर आते है... मेरी दोनों से कोई दोस्ती नहीं है, फिर भी... अजीब बेवकूफ़ हैं.
लेकिन मैं बहुत चालाक हूँ, उन्हें पता भी नहीं लगने देता कि इन दोनों के जाने के बाद मैं रोऊँगा.
मैं अच्छा हो जाता हूँ. वो दोनों मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो जाते हैं... मुझे कॉलेज में डिबेट बोलने का शौक़ हो गया है.
पिछले तीन बरस से भोपाल रोटरी क्लब की डिबेट का इनाम जीत रहा हूँ.
इंटर कॉलेज डिबेट की बहुत सी ट्राफ़ियाँ मैंने जीती हैं. विक्रम यूनिवर्सिटी की तरफ़ से दिल्ली यूथ फ़ेस्टिवल में भी हिस्सा लिया है.
कॉलेज में दो पार्टियाँ हैं और चुनाव में दोनों पार्टियाँ मुझे अपनी तरफ़ से बोलने को कहती हैं... मुझे चुनाव से नहीं, सिर्फ़ बोलने से मतलब है इसलिए मैं दोनों की तरफ़ से तक़रीर कर देता हूँ.
शेष अगले अंक में...
(फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर का यह आत्मकथ्य उनके काव्य संग्रह 'तरकश' से लिया गया है)