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ट्रांज़िस्टर को हुए पचास साल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सोमवार 18 अक्तूबर, 2004 को एक क्रांति के पचास साल पूरे हो गए. इस क्रांति को हम और आप ट्रांज़िस्टर के नाम से जानते हैं और यह कहना ग़लत न होगा कि ट्रांज़िस्टर आने के बाद से प्रसारण और मनोरंजन की पूरी दुनिया ही बदल गई. पचाल साल पहले यह कल्पना ही कठिन थी कि आप हर वक़्त दुनिया से जुड़े रह सकते हैं चाहें आप पहाड़ पर हों, घने जंगल के भीतर या रेल यात्रा कर रहे हों या फिर अपनी कार चला रहे हों. लेकिन अब ट्रांज़िस्टर इतना सहज है कि उस पुराने रेडियो का ख़याल ही नहीं आता जो आज के टेलीविज़न जितना बड़ा होता था, बिजली से ही चलता था और जिसके वॉल्व को गरम होने में दो मिनट लगते थे. ट्रांज़िस्टर ने उन दिनों की याद भुला दी है जब बिना बिजली आप रेडियो सुन नहीं सकते थे और अख़बार पहुँचते कभी दो दिन बाद तो कभी एक-एक हफ़्ते बाद पहुँचते थे. सफ़र ठीक पचास साल पहले यानी 18 अक्तूबर 1954 को अमरीका में ट्रांज़िस्टर आया. तब इसका नाम था टीआई-वन. और उस वक़्त उसकी क़ीमत थी 50 डॉलर. ट्रांज़िस्टर ने अमरीका में तहलका मचा दिया, ख़ासकर युवाओं के बीच वह एक क्रांतिकारी चीज़ थी. यह वो ज़माना था जब रेडियो घर का अटूट हिस्सा हुआ करता था और उसे सिर्फ़ माँ-बाप छू सकते थे. उसी समय 'रॉक एन रोल' भी लोकप्रिय हो रहा था.
इसके बाद से ट्रांज़िस्टर ने एक लंबा सफ़र तय किया है. अमरीकी ट्रांज़िस्टरों की जगह बाज़ार में जापानी ट्रांज़िस्टरों ने ले ली और फिर कभी नहीं छोड़ी.धीरे-धीरे क़ीमत कम होती गई और आज एक ट्रांज़िस्टर एक डॉलर यानी लगभग पचास रुपए में भी उपलब्ध है. जो लोग कभी ट्रांज़िस्टर सुना करते थे, वो आज टेलीविज़न देखते हैं, कंप्यूटर चलाते हैं और मोबाइल का उपयोग करते हैं, लेकिन ट्रांज़िस्टर आज भी एक विश्वसनीय साथी बना हुआ है. दिलचस्प दुनिया ट्रांज़िस्टर की दुनिया बहुत दिलचस्प है. बांग्लादेश में एक बाज़ार का नाम है बीबीसी बाज़ार. इस बाज़ार का नामकरण हुआ 1971 के बाद. जब युद्ध चल रहा था तब लोग ढाका से दूर एक जगह जाया करते थे जहाँ एक मात्र ट्रांज़िस्टर उपलब्ध था. ये लोग वहाँ इकट्ठा होकर उस समय का सबसे लोकप्रिय समाचार सुना करते थे बीबीसी स्टेशन से. बाद में यही जगह बीबीसी बाज़ार बन गई. भारत में आज लगभग साढ़े दस करोड़ घरों में ट्रांज़िस्टर हैं यानी टेलीविज़न की तुलना में दोगुना और ट्रांज़िस्टर देश के 98.5 प्रतिशत हिस्सों में सुना जा सकता है. ट्रांज़िस्टर की लोकप्रियता को देखते हुए ही शायद भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दस साल पहले (1995 में) एक निर्णय में कहा था कि प्रसारण पर एकाधिकार ख़त्म करना चाहिए. इसके बाद टेलीविज़न को तो संसद ने अनुमति दे दी लेकिन रेडियो पर अब भी कोई फ़ैसला नहीं हुआ है. नेपाल और श्रीलंका ने कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों को क़ानूनी जामा पहना दिया है. आश्चर्य इस बात का है कि आकार में छोटे मगर पहुँच में बहुत बड़े इस जादुई उपकरण की पचासवीं वर्षगाँठ कोई नहीं मना रहा है. |
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