फ़िल्म रिव्यू : 'ओ तेरी'

  • 29 मार्च 2014
 'ओ तेरी'

रेटिंग: */2

रील लाइफ़ प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड की 'ओ तेरी' कहानी है दो संघर्षरत युवा टीवी पत्रकारों की जिनकी बॉस उनसे हमेशा सनसनीखेज़ न्यूज़ लाने को कहती है.

दोनों हर बार कोई ना कोई गड़बड़ कर देते हैं लेकिन एक दिन वो कुछ ऐसा कर गुज़रते हैं जो उन्हें पूरे देश का हीरो बना देता है.

(रिव्यू: 'रागिनी एमएमएस-2')

पीपी (पुल्कित सम्राट) और आनंद ईश्वरम देवदत्त सुब्रमण्यम यानी एड्स (बिलाल अमरोही) एक टीवी चैनल के लिए काम करते हैं और उनकी बॉस मॉनसून (सारा जेन डियास) हमेशा उन्हें डांटती फ़टकारती रहती है और कोई धमाकेदार न्यूज़ लाने को कहती है.

एक दिन सीबीआई अफ़सर अविनाश त्रिपाठी (कुलदीप सरीन) की हत्या हो जाती है. इस क़त्ल के पीछे सत्ता पक्ष के सदस्य बिला ख़्वाजा (अनुपम खेर) और विपक्षी नेता भंवर सिंह किलोल (विजय राज़) का हाथ है.

दोनों ही एक दूसरे को फंसाने के चक्कर में कुछ ऐसा खेल रचते हैं कि त्रिपाठी की लाश पीपी और एड्स की गाड़ी में उनके गुर्गे रख देते हैं. और पुलिस उन दोनों के पीछे पड़ जाती है.

दोनों ही बेहद डर जाते हैं लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि लाश एक सीबीआई अफ़सर की है तो उन्हें लगता है कि ये सुनहरा मौक़ा है अपनी बॉस को प्रभावित करने का सो वो लाश के साथ अपनी बॉस के पास पहुंच जाते हैं.

(रिव्यू: 'आंखों देखी')

लेकिन इससे पहले कि उनकी बॉस गाड़ी तक पहुंचकर लाश देख सके, लाश रहस्यमय तरीक़े से ग़ायब हो जाती है. दोनों को लगता है कि अब उनकी नौकरी नहीं बचेगी.

लेकिन अचानक एक ऐसी घटना होती है जिससे दोनों को पूरे देश में वाहवाही मिलती है और वो हीरो बन जाते हैं. वो क्या घटना थी. और क्या दोनों त्रिपाठी की हत्या के रहस्य को सबके सामने लाने में कामयाब हो पाते हैं यही फ़िल्म की कहानी है.

बचकानी कहानी

 'ओ तेरी'

उमेश बिष्ट और नीति पालटा की कहानी बचकानी है. फ़िल्म का स्क्रीनप्ले भी उतना ही बचकाना और मूर्खतापूर्ण है.

दोनों ही मुख्य पात्रों की पर्दे पर की गीं बेवक़ूफ़ियां दर्शकों को ज़रा भी नहीं हंसा पातीं. फ़िल्म के बाक़ी किरदारों का भी यही हाल है. बड़े अनमे ढंग से किरदार रचे गए हैं जो पर्दे पर अजीबोग़रीब हरकते करते रहते हैं और दर्शकों को बोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

(रिव्यू: 'बेवकूफ़ियां')

कहानी में इतने ज़्यादा मोड़ और घुमाव हैं कि दर्शकों को पता ही नहीं चल पाता कि आख़िर पर्दे पर चल क्या रहा है.

पीपी और एड्स के किरदारों के साथ दर्शक जुड़ ही नहीं पाते और उनसे उन्हें सहानुभूति भी नहीं हो पाती.

फ़िल्म के क्लाईमेक्स में भी बिलकुल नवीनता नहीं है और दर्शक इस तरह का क्लाईमेक्स कई दफ़ा देख चुके हैं.

फ़िल्म के संवाद भी बेहद साधारण हैं.

अभिनय

 'ओ तेरी'

पुल्कित सम्राट देखने में स्मार्ट हैं लेकिन उनका अभिनय बहुत औसत दर्जे का है. नवोदित कलाकार बिलाल अमरोही दिखने में भले ही सामान्य हों लेकिन उन्होंने ठीक-ठाक अभिनय किया है. दोनों ही कलाकारों ने डांस अच्छा किया है.

(रिव्यू: 'क्वीन')

उमेश बिष्ट का निर्देशन बड़ा फीका है. फ़िल्म के प्लॉट में जिस हास्य की ज़रूरत थी वो उसे बिलकुल भी पूरा नहीं कर पाए. फ़िल्म का संगीत भी बड़ा साधारण है.

कुल मिलाकर 'ओ तेरी' बड़ी बोझिल फ़िल्म है. बॉक्स ऑफ़िस पर ये फ़िल्म के निर्माता के लिए बुरा सपना साबित होगी.

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