कैसी रही रणबीर की 'बेशर्मी' ?

  • 2 अक्तूबर 2013
रणबीर कपूर

रेटिंगः 1.5 बिजनेस रेटिंग: 2

'बेशर्म' एक कार चोर की कहानी है. बबली ( रणबीर कपूर) अनाथालय, जहां वह पला-बढ़ा है, का खर्चा चलाने के लिए कारें चुराता है.

उसे खूबसूरत तारा (पल्लवी शारदा) से प्यार हो जाता है. तारा एक महंगी विदेशी कार खरीदती है.

बबली अनजाने में तारा की ही कार चुरा लेता है और अपने मालिक भीम सिंह चंदेल (जावेद जाफरी) को सौंप देता है.

लेकिन जल्द ही उसे अपनी ग़लती का अहसास होता है और तब वो कार वापस लाने का फ़ैसला कर लेता है.

तारा उससे नफरत करने के बावजूद उसके साथ अपनी कार वापस लाने के लिए चंडीगढ़ जाती है.

बेशर्म

कुछ मुश्किलों के बाद बबली, भीम सिंह से कार चुराकर वापस लाने में सफल हो जाता है.

बाद में पता चलता है कि उस कार में भीम सिंह चंदेल के पैसे रखे हैं. पुलिस ऑफिसर चुलबुल चौटाला (ऋषि कपूर) और उनकी पत्नी बुलबुल चौटाला ( नीतू सिंह) पहले से ही बबली को पकड़ने की फ़िराक़ में हैं. और आखिर बबली उनके हाथ लग ही जाता है.

इधर कुछ ऐसा होता है कि तारा, बबली के जेल जाने से परेशान हो उठती है क्योंकि वह उसकी कमियों के बावजूद मन ही मन उससे प्यार करने लगी है.

वह बबली को जेल से छुड़ाने के लिए कार में मिले करोड़ों रुपए बुलबुल चौटाला को रिश्वत में दे देती है.

जब भीम सिंह को पता चलता है कि बबली और तारा ने उसके पैसे चुराए हैं तो वह बबली के जिगरी यार, टीटू (अमितोष नागपाल) को अगवा कर लेता है.

फिर बबली का पता जानने के लिए भीमसिंह, टीटू की खूब पिटाई करता है.

अब बबली और तारा के पास एक ही रास्ता बचा है कि वे चुलबुल और बुलबुल से पैसे लाकर भीमसिंह को वापस कर दें.

क्या बबली और तारा पुलिस अफसर के घर से पैसे वापस लाने में सफल होते हैं?

क्या पुलिस अफसर उनसे होशियार साबित होते हैं? क्या बबली अपने दोस्त को बचा पाता है?

भीम सिंह का क्या होता है? और वे पैसे कहां जाते हैं? तारा को उसकी कार वापस मिलती है, या नहीं? और आखिरी में, बबली और तारा की प्रेम कहानी का क्या अंजाम होता है?

नीरस कहानी

रणबीर कपूर

अभिनव सिंह कश्यप और राजीव बर्णवाल ने दर्शकों को हंसाने के लिए खूब हास-परिहास भरी स्क्रिप्ट लिखी. इसमें कोई बुराई तो नहीं है मगर दिक्कत तब पैदा हो रही है कि कई हल्के-फुल्के दृश्य और घटनाएं हास्य पैदा करने में नाकाम रहते हैं.

बेशक फिल्म में कुछ ऐसे दृश्य हैं जो वास्तव में मजेदार हैं, और दर्शकों को हंसकर लोट-पोट होने को मजबूर कर देते हैं. मगर ये पर्याप्त नहीं हैं.

फिल्म में इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है, स्क्रिप्ट में कोई नयापन ना होना. फिल्म का बड़ा कैनवास और सुपरस्टार रणबीर कपूर की 'लार्जर दैन लाइफ' इमेज के आगे फिल्म की नीरस कहानी और पटकथा पानी भरती नजर आई.

नायिका जमी नहीं

इसके अलावा फिल्म में कुछ बेतुके दृश्य भी हैं. जैसे कि बबली क्यों इस बात की जिद करता है कि कार वापस लाने के लिए तारा भी उसके साथ चंडीगढ़ जाए? मानो तारा जब तक वहां जाकर कागजों पर दस्तखत नहीं करेगी, कार को वापस नहीं छुड़ाया जा सकता है. आखिर बबली अकेले जाकर भी चंडीगढ़ से कार वापस ला सकता था.

फिर, बबली कार चुराने के काम को जायज ठहराने के लिए तारा को जिस तरह की दलीलें देता है, वे काफी बचकानी मालूम पड़ती हैं.

अंत में खुद दर्शकों को भी महसूस होता है कि उनके हीरो, बबली, ने ऐसा कोई बहादुरी का काम नहीं किया जिसके लिए ताली बजाई जाए.

फिल्म में शौचालय से जुड़े ढेर सारे हास्य दृश्य हैं. जहां एक तरफ कुछ लोग इसका मजा लेगें तो दूसरी ओर कुछ खास वर्ग और मल्टीप्लेक्स जाना पसंद करने वाले दर्शकों को इस तरह के सीन फालतू लग सकते हैं.

रणबीर कपूर

बबली और तारा की जोड़ी भी उतनी रोमांटिक और मजेदार नहीं बनी है, जितनी होनी चाहिए थी. एक तेज तर्रार युवती के रूप में पल्लवी शारदा की जोड़ी रणबीर कपूर के साथ कुछ खास नहीं जंची है.

युवा प्रेम कहानी के रूप में 'बेशर्म' में लोकप्रिय संगीत की खासी जरूरत थी, मगर फिल्म के गाने नीरस और मामूली हैं.

हां, अभिनव सिंह कश्यप का निर्देशन शानदार है. वे इस कला की बारीकियों से खूब वाकिफ हैं. उन्होंने कहानी को यूं पिरोया है कि स्क्रिप्ट की खामियां काफी हद तक छिप गई हैं. अगर उनकी स्क्रिप्ट, उनके निर्देशन की तरह लाजवाब होती तो, ये फिल्म कमाल दिखा सकती थी.

कमजोर पक्ष

ललित पंडित का संगीत इस फिल्म की कमजोर कड़ी है. टाइटिल सॉन्ग को यदि छोड़ दिया जाए तो फिल्म का संगीत किसी भी तरह से लोगों को अपनी ओर खींचने में नाकामयाब साबित हो रहा है.

फिल्म राजीव बर्णवाल, निखत खान, कुमार और हिमांश किशन मेहरा के लिखे गीतों के बोल ठीक-ठाक हैं.

रणबीर कपूर

मधु वानियर की सिनेमाटोग्राफी अच्छी है. शाम कौशल के एक्शन सीन साधारण हैं. सेट (वासिक खान और तारिक उमर खान) भी ठीक हैं.

कुल मिला कर 'बेशर्म' को एक साधारण फिल्म की श्रेणी में रखा जा सकता है.

फिल्म के तीन कमजोर पक्ष हैं- मामूली स्क्रिप्ट, सुस्त संगीत और कमजोर नायिका.

रणबीर कपूर के सुपरस्टारडम और कमाल की शुरूआत को फिल्म का सराहनीय पहलू कहा जा सकता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार