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फ़िल्म रिव्यू: सत्याग्रह

 शुक्रवार, 30 अगस्त, 2013 को 16:52 IST तक के समाचार
सत्याग्रह

रेटिंग: **1/2

यूटीवी मोशन पिक्चर्स और प्रकाश झा प्रोडक्शंस की 'सत्याग्रह' एक आदर्शवादी इंसान द्वारका आनंद (अमिताभ बच्चन) की कहानी है जो लोगों की भलाई और उनके अधिकारों के लिए सीधे सरकार से भिड़ जाता है.

द्वारका आनंद, एक रिटायर्ड स्कूल प्रिसिंपल हैं जो सिद्धांतवादी हैं. वो अंबिकापुर में अपने बेटे अखिलेश (इंद्रनील सेनगुप्ता) के साथ रहता है.

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इंद्रनील की शादी सुमित्रा (अमृता राव) से होती है. अखिलेश का दोस्त मानव राघवेंद्र क्लिक करें (अजय देवगन) एक पूंजीपति है जिसके विचारों से द्वारका आनंद सहमत नहीं होता.

असल में द्वारका मूलत: पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ग़रीबों के हक़ का पैसा मारकर ये लोग अमीर बनते हैं.

अखिलेश एक इंजीनियर जो सरकारी नौकरी करता है लेकिन शादी के फौरन बाद एक रोड दुर्घटना में उसकी मौत हो जाती है.

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गृहमंत्री बलराम सिंहक्लिक करें ( मनोज बाजपेई) 25 लाख रुपए के मुआवज़े की घोषणा करता है लेकिन सुमित्रा को सरकार से ये पैसे हासिल करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है.

सरकारी अफ़सर उसे पैसे देने के एवज़ में रिश्वत मांगते हैं. सुमित्रा उन पैसों से बच्चों के लिए स्कूल बनाना चाहती है.

एक दिन द्वारका आनंद अनुदान लेने के लिए कलेक्टर के ऑफ़िस जाते हैं. वहां उनकी कलेक्टर से बहस हो जाती है और वो कलेक्टर को थप्पड़ लगा देते हैं. इस बात पर द्वारका आनंद को जेल में डाल दिया जाता है.

मानव को जब ये बात पता लगती है तो वो वहां पहुंचता है और एक स्थानीय नागरिक अर्जुन सिंह (अर्जुन रामपाल) के सहयोग से जनता का समर्थन हासिल करता है और द्वारका आनंद को जेल से छुड़ाने की मुहिम छेड़ देता है.

आखिर सरकार को झुकना पड़ता है और द्वारका आनंद को रिहा कर दिया जाता है. जेल से छूटने के बाद द्वारका मुआवज़े का चेक लेने से इनकार कर देते हैं और सरकार से कहते हैं कि जनता की जो भी मांगे हैं वो एक महीने के भीतर पूरी करे.

इस आंदोलन में उनके साथ मानव, अर्जुन, सुमित्रा और एक टीवी पत्रकार यासमीन (करीना कपूर) भी जुट जाती हैं.

आगे क्या होता है? क्या सरकार झुक जाती है? क्या द्वारका आनंद को अपने मिशन में कामयाबी मिलती है? यही फ़िल्म की कहानी है ?

कहानी

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क्लिक करें प्रकाश झा और अंजुम राजाबाली की कहानी अन्ना हज़ारे के आंदोलन से काफ़ी प्रभावित लगती है. इस वजह से लोगों को कहानी से तारतम्य बिठाने में दिक्कत पेश नहीं आएगी.

फ़िल्म के कई दृश्यों से दर्शक अपने को जोड़ पाएंगे. कई दृश्य दर्शकों की आंखों में आंसू भी लाएंगे. लेकिन कहानी की प्रकृति ही ऐसी है कि ये ख़ासी नीरस है. इसमे हल्के-फुल्के दृश्यों की सख्त कमी है.

यही वजह है कि युवा वर्ग फिल्म से नहीं जुड़ पाएगा. हालांकि इसके बाद भी काम बन सकता था लेकिन स्क्रीनप्ले में सहूलियत के हिसाब से कुछ छूट ले ली गई है जिससे कहानी की ईमानदारी पर शक होता है.

जैसे द्वारका आनंद पहले अर्जुन सिंह को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं लेकिन बाद में उसका समर्थन लेने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती.

मानव को लेकर भी पहले द्वारका आनंद को परेशानी होती है लेकिन बाद में वो उसे भी स्वीकार कर लेते हैं.

द्वारका आनंद और उनके समर्थकों की मांगे इतनी आदर्शवादी और सैद्धांतिक होती है कि दर्शकों को वो कई दफ़ा अव्यवहारिक लगेंगी.

फ़िल्म की गति

इंटरवल से पहले फिल्म की गति काफी तेज़ है और ये दर्शकों को बांधे रखती है. लेकिन इंटरवल के बाद फ़िल्म अपनी पकड़ खो देती है.

क्लाईमेक्स में भी निर्देशक की हड़बड़ाहट साफ़ देखी जा सकती है.

प्रकाश झा और अंजुम राजाबाली के लिखे संवाद अच्छे हैं लेकिन उन्हें और दमदार होना चाहिए थे.

अभिनय

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अमिताभ बच्चन ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से निभाया है. वो इस रोल में ज़बरदस्त रहे हैं. एक सीन है जिसमें द्वारका आनंद भूख हड़ताल पर हैं. उसमें वो ख़ासे कमज़ोर लग रहे हैं और जिस तरीके से वो चल रहे हैं और बातें कर रहे हैं उनमें उनकी अभिनय क्षमता की रेंज देखी जा सकती है.

अजय देवगन ने भी पूरी ईमानदारी से अपना रोल निभाया है. करीना कपूर भी टीवी पत्रकार के रोल में प्रभावी रही हैं. अर्जुन रामपाल भी ठीक रहे हैं.

गृहमंत्री बलराम सिंह के रोल में मनोज बाजपेई ने शानदार काम किया है. उनके अभिनय के साथ-साथ संवाद अदायगी भी जानदार रही है.

अमृता राव अपने छोटे से रोल में अच्छी लगी हैं. बाकी कलाकारों ने भी अच्छा काम किया है.

निर्देशन

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प्रकाश झा का निर्देशन अच्छा है लेकिन उऩका कहानी कहने का ढंग स्क्रिप्ट की कमियां ढंक नहीं पाया है.

सलीम-सुलेमान. आदेश श्रीवास्तव, मीत ब्रदर्स, अनजान और इंडियन ओशन का संगीत अच्छा है.

क्लिक करें 'रघुपति राघव राजा राम' को प्रसून जोशी ने बेहतरीन अंदाज़ में अपने शब्दों में पिरोया है. जयेश प्रधान और उमा गैती की कोरियोग्राफी भी अच्छी है.

सचिन कृष्ण का कैमरावर्क अच्छा है. संतोष मंडल की एडिटिंग और बेहतर हो सकती थी.

कुल मिलाकर सत्याग्रह एक औसत फ़िल्म है. फिल्म के बॉक्स ऑफ़िस पर अच्छा प्रदर्शन करने के अवसर कम हैं क्योंकि युवा वर्ग को शायद ये अपील न कर पाए. मल्टीप्लेक्सेस में इसका व्यापार सिंगल स्क्रीन से बेहतर होगा.

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