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वर्ल्ड म्यूज़िक डे: प्यारेलाल, पंचम दा कैसे रचते थे गाने

 शुक्रवार, 21 जून, 2013 को 12:39 IST तक के समाचार
प्यारेलाल

एक दौर था जब संगीत की तालीम लिए बगैर आप संगीतकार नहीं बन सकते थे और एक ये दौर है जब संगीत बनाने के लिए कम्प्यूटर की तालीम भी बेहद ज़रुरी हो गई है.

जिस तरह फिल्मी डायलॉग और कहानी लिखी जाती है, उसी तरह संगीत भी लिखा जाता है. इस तस्वीर में फिल्मी संगीत की मशहूर जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के प्यारेलाल हैं जो एक गाने के नोट लिख रहे हैं. इन नोट्स को ऑरकेस्ट्रा में बांट दिया जाता था और एक बड़े स्टूडियो में बैठकर इन्हें रिकॉर्ड किया जाता था.

प्यारेलाल जी बताते हैं "उन दिनों बिना नोट के संगीत बनाना मुश्किल था लेकिन अब इनको जानने वाले काफी कम रह गए हैं. ये काम अब एक संगीतकार के कान और उसका कम्प्यूटर करता है.”

अपरेश लाहिड़ी

1940-45 का दौर जब संगीतकार की पूरी टीम मिलकर संगीत तैयार करती थी और गाना रिकॉर्ड करती थी. इस तस्वीर में माइक पर बैठे हैं संगीतकार बप्पी लाहिड़ी के पिता अपरेश लाहिड़ी जिन्होंने क्लिक करें लता मंगेशकर द्वारा गाए कई हिट बंगाली गाने बनाए हैं.

बप्पी के बेटे बप्पा लाहिड़ी कहते हैं "मुझे गर्व है कि मैं इस परिवार का हिस्सा हूं, हमारा इकलौता ऐसा परिवार है जो तीन पीढ़ियों से संगीत बना रहा है."

जैसा कि तस्वीर में दिख रहा है गायक के साथ सभी वाद्य यंत्र बजाने वाले एक ही कमरे में बैठकर गाना बना रहे हैं. एक दूसरे के साथ ताल-मेल बैठाकर एक अच्छा गाना बनाना वाकई में एक चुनौतीपूर्ण काम रहता होगा.

नेरश

धुन अगर रात के तीन बजे दिल में आए तो क्या किया जाए, सुबह तक भूल गए तो ?

इस समस्या का निवारण करने के लिए टेप-रिकॉर्डर की मदद से धुनें रिकॉर्ड होना शुरु हुई. तस्वीर में प्यारेलाल जी के छठें भाई नरेश हारमोनियम पर धुन बनाकर पास रखे टेप रिकॉर्डर पर उसे रिकॉर्ड कर रहे हैं. 1930 के आसपास हुए इस आविष्कार ने संगीतकारों के काम को थोड़ा आसान कर दिया.

प्यारेलाल

संगीतकार को केवल फिल्म के गाने ही नहीं उसका बैंकग्राउंड स्कोर भी तैयार करना होता है. संगीतकार प्यारेलाल बताते हैं कि पहले के दौर में एक बड़े पर्दे पर फिल्म की रील चलती थी और फिल्म देखते हुए पियानो पर मन में आई धुनों को बजाया जाता था.

साथ बैठा सहायक इन धुनों के नोट लिख लेता था जिसे बाद में रिकॉर्ड किया जाता था.

रिकॉर्डिंग सेशन

ये तस्वीर है एक साउंड रिकॉर्डिंग सेशन की जिसमें दाएं और क्लिक करें आर डी बर्मन है, उनके बाद साउंड रिकॉर्डिस्ट कौशिक, फिर सेक्साफॉन बजाने वाले मनोहारी सिंह और सबसे बाएं पर खड़े हैं बर्मन के ख़ास परकशनिस्ट मारुति राव कीर.

1970 में पेन ड्राइव या हार्ड डिस्क जैसा कुछ तो होता नहीं था इसलिए 35 एमएम की स्पूल टेप पर रिकॉर्डिंग होती थी जिसे चौथाई इंच टेप यानि ऑडियो कैसेट में डाल कर संगीतकार अपने सुनने के लिए घर ले जाता था.

अनु मलिक

महबूब स्टूडियो की एक पूरी मंजिल रिकॉर्डिंग स्टूडियो की तरह काम करती थी. 1986 की इस तस्वीर में युवा अनु मलिक के साथ गायक सुखविंदर सिंह है.

फिल्म 'एक चादर मैली सी' के गीत 'माता रानी का दरबार' की रिहर्सल में पीछे कोरस के लिए गायिकाएं खड़ी हैं और बाएं और नरेश शर्मा हैं जिन्होंने इस गीत के लिए 80 पीस ऑरकेस्ट्रा अरैंज किया था.

बप्पी लाहिड़ी

1982 से पहले ना कोई क्लिक करें मिथुन चक्रवर्ती को डिस्को डांसर कहता था और ना ही बप्पी लाहिड़ी को डिस्को किंग. इस तस्वीर में बप्पी लाहिड़ी के साथ हैं उनके सिंथेसाइज़र जिन्हें स्टूडियो तक लाने में थोड़ा संघर्ष करना पड़ा.

बप्पी के बेटे बप्पा बताते हैं "अस्सी के दशक में पापा न्यूयॉर्क से 12 सिंथेसाइज़र लेकर आए और हवाई अड्डे पर कस्टम वालों ने पापा को पकड़ लिया. फिर पापा ने समझाया कि भाई साहब ये संगीत बनाने के लिए हैं."

बप्पी लाहिड़ी

और फिर वो दौर भी आया जब संगीत का कम्प्यूटर से मिलन हुआ.

बप्पी लाहिड़ी के स्टूडियो ‘टेम्पटेशन’ की इस तस्वीर के बारे में बप्पा बताते हैं “देखिए पापा के सामने एक छोटा सा, सफेद रंग का कम्प्यूटर लगा है जो शुरुआती ब्रांड अटारी का है. इस ब्लैक एंड व्हाइट कम्प्यूटर पर प्रोग्राम किया गया था संजय दत्त पर फिल्माया सुपरहिट गाना तम्मा तम्मा लोगे.”

और इसके बाद तो धीरे धीरे कम्प्यूटर ने संगीत के दिल में जगह बना ली.

मिथुन

कम्प्यूटर के साथ जोड़ी बनाई सॉफ्टवेयर ने और इस तरह संगीत का हुआ डिजिटलीकरण.

स्टूडियो छोटे होने लगे और ऑरकेस्ट्रा कम. अब गाना भी उतना कठिन नहीं रह गया है. तस्वीर में क्लिक करें आशिक़ी 2 के सबसे लोकप्रिय गाने ‘तुम ही हो’ के संगीतकार मिथुन का छोटा सा स्टूडियो है जहां कई गाने जन्म लेते हैं.

साथ में है अभिनेत्री सोनल चौहान जिन्होंने अपनी फिल्म 'थ्री जी' के लिए भी गाना गाया था. संगीतकार जोड़ी सचिन जिगर मानते हैं कि गाने के लिए सिर्फ दिल होना चाहिए. दिल से गाना गाइए, बाकी काम के लिए कम्प्यूटर है ना.

प्यारेलाल

इस तस्वीर में प्यारेलाल एक लाइव ऑरकेस्ट्रा को निर्देशित कर रहे हैं. संगीत के इस सफर में बेशक कुछ लोग ऑरकेस्ट्रा भूल डिजिटल हो गए हैं पर कुछ गीतों के लिए अभी भी लाइव संगीत का इस्तेमाल किया जाता है.

'फालतू' फिल्म का संगीत देने वाली संगीतकार जोड़ी सचिन-जिगर कहते हैं कि बजट मिल जाने के बाद वो जितना चाहे लाइव या ऑरकेस्ट्रा इस्तेमाल कर सकते हैं.

हालांकि उन्होंने ये भी माना कि डिजिटल होने से समय और पैसा दोनों की बचत है और साथ ही संगीत के साथ प्रयोग भी मुमकिन है.

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