बार सिंगर से 'आशिक़ी' तक का सफर

  • 9 मई 2013
शगुफ़्ता रफ़ीक़
शगुफ़्ता 'आशिक़ी 2', 'जन्नत 2' और 'मर्डर 2' जैसी फिल्में लिख चुकी हैं.

हालिया रिलीज़ महेश भट्ट निर्मित फिल्म 'आशिक़ी 2' बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब हो गई. फिल्म की कहानी लिखी है शगुफ़्ता रफ़ीक ने, जो दावा करती हैं कि ये फिल्म उनकी असल ज़िंदगी की कहानी से प्रेरित हैं.

शगुफ़्ता इससे पहले भट्ट कैंप की कई और फिल्में जैसे जन्नत 2, मर्डर 2, जिस्म 2 और वो लम्हे भी लिख चुकी हैं. लेकिन उनके बारे में एक बात बहुत कम लोगों को पता है और वो ये कि लेखक बनने से पहले वो दुबई के एक बार में सिंगर थी.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में शगुफ़्ता ने अपने बारे में विस्तार से बातें कीं. पेश है उनकी कहानी ख़ुद उनकी ज़ुबानी.

शगुफ़्ता की कहानी

सबसे पहले तो मैं इस बात से बहुत ख़ुश भी हूं और हैरान भी कि 'आशिक़ी 2' सुपरहिट हो गई. मैंने नहीं सोचा था कि फिल्म को इतनी ज़बरदस्त कामयाबी मिलेगी.

श्रद्धा कपूर से ख़ास बातचीत

दरअसल फिल्म की कहानी मेरी असल ज़िंदगी पर आधारित है. आज से कई साल साल पहले मैं दुबई के एक बार में सिंगर थी. वो मेरे लिए बड़ा डरावना अनुभव था.

मुझे वहां की भयावह दुनिया से एक शख़्स ने बाहर निकाला. और आज मैं जो हूं उसी की वजह से हूं. हालांकि हम दोनों अब साथ नहीं है. वो अब शादीशुदा हैं. तो 'आशिक़ी 2' मेरी अपनी कहानी है.

मजबूरी

दुबई के बार में गाना दरअसल मेरी मजबूरी थी. मेरी बहन सईदा ख़ान 60 के दशक की अभिनेत्री थीं. उनके पति ब्रज सदाना थे, जिन्होंने विक्टोरिया नंबर 203 और चोरी मेरा काम जैसी फिल्में बनाईं.

लेकिन फिर वो शराब की लत के शिकार हो गए और उन्होंने 90 के दशक में मेरी बहन सहित पूरे परिवार की गोली मारकर हत्या कर दी. तब परिवार को चलाने की ज़िम्मेदारी मुझ पर आ गई.

बुरा अनुभव

बार में गाने के दौरान मुझे बहुत बुरे अनुभव हुए. वहां लड़कियों के साथ बुरा सलूक किया जाता था. कई बार होटल मैनेजमेंट हमें खाना भी नहीं देता था.

वहां पर अंडरवर्ल्ड के लोग भी आ धमकते थे. मैं वहां से निकलना चाहती थी. तब वो ख़ास शख्स मेरी ज़िंदगी में आए और उन्होंने मुझे बाहर निकाला.

फिल्मों में शुरुआत

मैं हमेशा से फिल्मों के लिए लिखना चाहती थी. मैंने महेश भट्ट के साथ बतौर असिस्टेंट सर, गुमराह, जानम और नाजायज़ जैसी फिल्मों में काम किया.

फिर एक दिन मैंने उनसे कहा कि मैं आपकी फिल्में लिखना चाहती हूं. उन्होंने कहा, "मुझे कोई लेखक नहीं चाहिए. मैं अपनी फिल्में ख़ुद लिखता हूं."

ख़ैर. फिर जब मोहित सूरी भट्ट कैंप की फिल्म 'कलयुग' बना रहे थे तब मैंने उसके दो सीन लिखे. वो सबको बहुत पसंद आए.

उसके बाद भट्ट कैंप की अगली फिल्म 'वो लम्हे' एनाउंस हुई तो मोहित ने भट्ट साहब से कहा कि शगुफ्ता से कहानी लिखाकर देखते हैं.

भट्ट साहब पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हुए और उन्होंने अनमने ढंग से कहा ठीक है. ट्राय कर लो. लेकिन जब मैंने कहानी लिखकर उन्हें सुनाई तो उन्हें बड़ी पसंद आई. फिर तो मैंने उनके लिए कई फिल्में लिखीं.

जटिल किरदार पसंद

मेरी फिल्मों के किरदार थोड़े जटिल किस्म के होते हैं. ग्रे शेड्स के होते हैं, क्योंकि सामान्य लोग दिलचस्प नहीं होते.

खलनायकों का प्रभुत्व

आशिक़ी 2
शगुफ़्ता का दावा है कि ' आशिक़ी 2' उनकी असल ज़िंदगी की कहानी है.

लोग पर्दे पर थोड़े अनप्रिडिक्बल लोगों को देखना पसंद करते हैं. मैं ख़ुद भी वैसी हूं. मैं कोई बड़ी अच्छी लड़की नहीं हूं. इसलिए मेरे किरदार भी वैसे होते हैं.

आशिक़ी 2 लंबे समय बाद आई ऐसी फिल्म है जिसकी कहानी बड़ी पाक किस्म की है. इसमें कहीं कोई मिलावट या बुरहाई नहीं है. बलिदान की कहानी है.

क्रेडिट नहीं

भारत में लेखकों को बिलकुल क्रेडिट नहीं दिया जाता. ये बुरी बात है.

मुझे भी कई दिनों तक पहचान ही नहीं मिली. लोगों को लगता था कि महेश भट्ट की फिल्में हैं तो कहानी भी वही लिखते होंगे.

मैं उन लोगों को चैलेंज करती हूं कि मेरे घर आकर मुझे लिखते हुए देखें.

लेखकों पर ज़ोया अख़्तर

फिल्म सफल हो गई तो कलाकार, निर्माता और निर्देशक क्रेडिट ले लेते हैं. और नाकामयाब हो गई तो उसका ठीकरा लेखक के सर फोड़ दिया जाता है. मैं इसे बदलना चाहती हूं.

(रेखा ख़ान से बातचीत पर आधारित)

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