'आपके पैर बहुत ख़ूबसूरत हैं'

  • 4 मई 2013
मेरा नाम जोकर

हिंदी सिनेमा के 100 यादगार डायलॉग्स की पहली कड़ी में आपने 25 डायलॉग पढ़े. पेश है इसका दूसरा हिस्सा जिसमें आप 25 और ऐसे ही दमदार डायलॉग पढ़ेंगे. बीबीसी के पाठकों के लिए इन डायलॉग्स का संकलन वरिष्ठ फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे ने किया.

26. वक्त (1965): निर्माता- बीआर चोपड़ा, निर्देशक- यश चोपड़ा

संदर्भ- जब राजकुमार को उनका बॉस चिनॉय सेठ (मदन पुरी) धमकी देता है तो राजकुमार उससे कहते हैं.

राजकुमार:चिनॉय सेठ. जिनके घर शीशे के बने होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते.

27. मेरा नाम जोकर (1970): निर्देशक- राज कपूर

राजू (राज कपूर) ने पद्मिनी की कला को मांजा है लेकिन जब पद्मिनी को फिल्मों में काम मिलने लगा है तो वो राजू को अनदेखा करती है. ट्रेन में राजू खिड़की के सामने खड़ा है.

पद्मिनी: अंधेरे में क्या देख रहे होराजू (राज कपूर): स्टेज की चकाचौंध से बाहर आने पर अंधेरे में साफ दिखाई देता है.

28. मेरा नाम जोकर (1970): निर्देशक- राज कपूर

संदर्भ- राजेंद्र कुमार निर्माता हैं और वो राज कपूर से बात कर रहे हैं.

राजेंद्र कुमार: क्या तुम मीनू (पद्मिनी) से प्यार करते हो. राज कपूर- सवाल ये नहीं, सवाल ये होना चाहिए कि क्या मैं प्रेम करता हूँ...जवाब है कि मैं नदी, पहाड़, फूल, पत्थरों सबसे प्यार करता हूँ. राजेंद्र कुमार- क्या इन सब में मीना नाम की लड़की भी है. राज कपूर- आप बेफिक्र रहें, मैं रास्ते में नहीं आऊँगा.

29. आनंद (1971): निर्देशक- राज कपूर

संदर्भ- आनंद यानी राजेश खन्ना को कैंसर है जबकि बाबूमोशाय यानी अमिताभ बच्चन डॉक्टर हैं

राजेश खन्ना: बाबू मोशाय.. ज़िंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ में है जहाँपनाह. उसे न आप बदल सकते हैं न मैं. हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ हैं जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है. कब कौन कैसे उठेगा ये कोई नहीं बता सकता है.

30. आनंद (1971): निर्देशक- राज कपूर

अमिताभ बच्चन: मौत तू एक कविता है. मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको. डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे, ज़र्द सा चेहरा लिए चाँद उफ़क तक पहुँचे. दिन अभी पानी में हो रात किनारे पर, न अंधेरा ना उजाला हो. न अभी रात न दिन. जिस्म जब खत्म हो और रूह को जब साँस आए...मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको.

31. आनंद (1971): निर्देशक- ऋषिकेश मुखर्जी

राजेश खन्ना: बाबू मोशाय ज़िंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए

32. पाकीज़ा (1972): निर्देशक- कमाल अमरोही

संदर्भ- राजकुमार, रेलगाड़ी में सोई हुई मीना कुमारी के पैर देखते हैं और एक खत उनके नाम छोड़ जाते है. जिसमें लिखा होता है.

राजकुमार: आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं. इन्हें ज़मीन पर मत रखिए. ये मैले हो जाएंगे.

33. बॉबी(1973): निर्देशक- राज कपूर

प्रेम चोपड़ा: प्रेम नाम है मेरा. प्रेम चोपड़ा.

34. बदला (1974)

ये एक एक्शन फिल्म है, जिसमें शत्रुघ्न सिन्हा भीड़ को कहते हैं, खामोश.

आज भी सिन्हा साहब वही डायलॉग दोहराते रहते हैं.

35. दीवार (1975): निर्देशक- यश चोपड़ा, लेखक- सलीम जावेद

संदर्भ- विजय (अमिताभ बच्चन) एक अंडरवर्ल्ड डॉन है. उसका छोटा भाई रवि (शशि कपूर) पुलिस इंस्पेक्टर है जो विजय से आत्मसमर्पण के काग़ज़ पर साइन करने को कहता है.

इस पर विजय (अमिताभ बच्चन)- जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरी मां को गाली देकर नौकरी से निकाल दिया. जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे हाथ पर लिख दिया था कि मेरा बाप चोर है. उसके बाद तुम जिस काग़ज़ पर कहोगे मैं साइन कर दूंगा.

36. दीवार (1975): निर्देशक- यश चोपड़ा, लेखक- सलीम जावेद

संदर्भ- डाबर सेठ (इफ्तिखार) अपना काम करवाने के लिए विजय (अमिताभ बच्चन) को पैसे टेबल पर फेंक कर देता है.

इसके जवाब में विजय (अमिताभ बच्चन): डाबर साहब बहुत बरस पहले आप रेस खेलने जाया करते थे और रास्ते में एक जगह रुककर जूते पॉलिश कराते थे. मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता.

37. दीवार (1975): निर्देशक- यश चोपड़ा, लेखक- सलीम जावेद

संदर्भ- मां (निरूपा रॉय) बीमार है. विजय (अमिताभ बच्चन) उसकी सेहत की दुआ मांगने मंदिर जाता है. और भगवान से मुखातिब हुए कहता है.

विजय (अमिताभ बच्चन): आज खुश तो बहुत होगे तुम. जिसने आज तक तुम्हारे मंदिर की सीढ़ियां नहीं चढ़ी, जिसने कभी तुम्हारे सामने सर नहीं झुकाया. जिसने कभी तुम्हारे आगे हाथ नहीं जोड़े, वो आज तुम्हारे सामने हाथ फैलाए खड़ा है. बहुत खुश होगे तुम.

38. दीवार (1975): निर्देशक- यश चोपड़ा, लेखक- सलीम जावेद

1975 में रिलीज़ हुई फिल्म शोले के कई डायलॉग्स ने तहलका मचा दिया. अरे ओ सांभा, कितने आदमी थे, इतना सन्नाटा क्यों है भाई जैसे संवाद आज भी लोगों की ज़ुबां पर हैं.

संदर्भ- विजय (अमिताभ बच्चन) ने तस्करी के ज़रिए काफी पैसा कमा लिया है. वो अपने छोटे भाई रवि (शशि कपूर) जो कि एक पुलिस इंस्पेक्टर है, से अपनी अमीरी का बखान करते हुए और रवि की सरकारी नौकरी पर कटाक्ष करते हुए कहता है.

विजय (अमिताभ बच्चन): आज मेरे पास बंगला है. गाड़ी है. बिल्डिंग है. बैंक बैलेंस है. तुम्हारे पास क्या है.रवि (शशि कपूर): मेरे पास मां है.

39. शोले (1975): निर्देशक- रमेश सिप्पी, लेखक- सलीम जावेद

संदर्भ- जब डाकू गब्बर सिंह (अमजद खान) के आदमी जय और वीरू से मात खाकर वापस लौट आते हैं तो

गब्बर सिंह (अमजद खान): यहां से पचास-पचास कोस दूर जब बच्चा रात में रोता है तो मां कहती है, बेटा सो जा. सो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा. और ये तीन हरामज़ादे गब्बर सिंह का नाम पूरा मिट्टी में मिलाय दिए.

40. शोले (1975): निर्देशक- रमेश सिप्पी, लेखक- सलीम जावेद

संदर्भ- बसंती (हेमा मालिनी) डाकुओं से बचकर तांगे में भाग रही है. और अपनी घोड़ी से बोलती है.

बसंती (हेमा मालिनी): चल धन्नो भाग. आज तेरी बसंती की इज़्ज़त का सवाल है.

41. शोले (1975): निर्देशक- रमेश सिप्पी, लेखक- सलीम जावेद

संदर्भ- वीरू (धर्मेंद्र) पानी की टंकी पर खड़ा है, नीचे भीड़ खड़ी हुई है.

वीरू (धर्मेंद्र): गांव वालो, मेरा इस बसंती से लगन होने वाला था. लेकिन इस बुढ़िया ने बीच में भांजी मार दी. अब मैं जी नहीं पाऊंगा. मैं यहां से कूद कर सूसाइड कर लूंगा. सूसाइड. फिर पुलिस कमिंग. बुढ़िया गोइंग जेल. इन जेल. बुढ़िया चक्की पीसिंग एंड पीसिंग एंड पीसिंग.

42. डॉन (1978): निर्देशक- चंद्रा बारोट, लेखक- सलीम जावेद

अमिताभ बच्चन: डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.

43. प्रेमरोग (1982): निर्देशक- राज कपूर

संदर्भ- ज़मींदार (शम्मी कपूर), देवधर (ऋषि कपूर) को अपने खानदानी रस्मो रिवाज का वास्ता देकर अपनी विधवा भतीजी से भाग कर शादी करने की सलाह देते हैं. ताकि उन पर कोई आंच ना आ सके. इसी बातचीत के दौरान घर की बिजली चली जाती है और वो मोमबत्ती की रोशनी में वो देवधर से बातें करते हैं. वो देवधर को भागने में सहायता देने की भी बात करते हैं.

इस पर देवधर (ऋषि कपूर) कहता है: नहीं राजा साहब. मैं चोरी छिपे नहीं भागूंगा. ये बात सिर्फ एक देवधर या मनोरमा की नहीं है. ये लड़ाई है पूरी समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ है. ये धर्मयुद्ध है. (संवाद खत्म होते ही बिजली आ जाती है)

44. प्रेमरोग (1982): निर्देशक-राज कपूर

संदर्भ- ज़मींदार (शम्मी कपूर) का भाई (कुलभूषण खरबंदा) अपनी विधवा बेटी के पुनर्विवाह के खिलाफ है. उसकी बेटी का जेठ (रज़ा मुराद) भी इस विवाह के खिलाफ है. खूनी संघर्ष में भाई (कुलभूषण खरबंदा) की मौत हो जाती है. ज़मींदार (शम्मी कपूर) उसके मृत शरीर की आंखे बंद करते हुए कहते हैं

शम्मी कपूर: काश तुम्हारी आंखें पहले खुल जातीं.

45. नमक हलाल (1982): निर्देशक- प्रकाश मेहरा

अमिताभ बच्चन: यू सी सर. आई कैन टाक इंग्लिश..आई कैन वाक इंग्लिश. बिकाज इंग्लिश इज़ अ फनी लैंग्वेज, भैरव बिकम्स बैरन एंड बैरन बिकम्स भैरों बिकाज देअर माइंड्स आर वेरी नैरो.

46. सौतन (1984): निर्देशक- सावन कुमार टाक

प्रेम चोपड़ा: मैं वो बला हूं जो शीशे से पत्थर को तोड़ता हूं.

47. मिस्टर इंडिया (1987) निर्देशक- शेखर कपूर

मोगेंबो (अमरीश पुरी): मोगेंबो खुश हुआ.

48. शहंशाह (1988), निर्देशक- टीनू आनंद

अमिताभ बच्चन: रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप होते हैं नाम है शहंशाह.

49. बाज़ीगर (1993): निर्देशक- अब्बास मस्तान

शाहरुख खान: कभी कभी जीतने के लिए हारना पड़ता है. हारकर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं.

50. कुछ कुछ होता है (1999): निर्देशक- करण जौहर

राहुल (शाहरुख खान): प्यार दोस्ती है. अगर वो मेरी सबसे अच्छी दोस्त नहीं बन सकती तो मैं उससे कभी प्यार कर ही नहीं सकता. क्योंकि दोस्ती बिना तो प्यार होता ही नहीं. सिंपल. प्यार दोस्ती है.

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