सिनेमा के 100 साल: फ़िल्मों पर आपत्तियों की कैंची

  • 30 अप्रैल 2013
शूट आउट एट वडाला

जब कोई नई फ़िल्म रिलीज़ होती है तो सेंसर की कैंची कई फ़िल्मकारों की नींद उड़ा देती है.

भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने के मौके पर कई पहलुओं पर बात हो रही है जिसमें सेंसरशिप एक अहम मुद्दा है.

वैसे भी पिछले दिनों कमल हासन की 100 करोड़ की लागत से बनी फ़िल्म विश्वरुप के रिलीज़ में जो अड़चनें आई, उसने इंडस्ट्री को सेंसरशिप पर बात करने के लिए मजबूर कर दिया.

दरअसल सेंसरबोर्ड के साथ साथ अलग-अलग धार्मिक गुटों, राज्य सरकारों और अन्य संस्थाओं द्वारा फ़िल्म पर लगाई जाने वाली आपत्तियों ने फ़िल्मकारों के लिए राह मुश्किल कर दी है.

कहां है लोकतंत्र ?

निर्माता-निर्देशक करण जौहर कहते हैं, "हालांकि मेरी छवि पारिवारिक फ़िल्में बनाने की है लेकिन अपनी पहली फ़िल्म से मैं कोर्ट केस लड़ता आया हूँ.मैंने सब कुछ किया है, राजनीतिक पार्टियों से निपटा हूँ, सेंसरशिप के मुद्दों से जूझा हूं, यहाँ तक कि मेरा पुतला भी जलाया गया है."

करण का कहना है, "अब मुझे डर लगता है अपने विचार व्यक्त करने में चाहे वो सेंसरशिप के बारे में हो या राजनीति के बारे में. एक फ़िल्मकार होने के नाते मुझसे लोकतंत्र का वादा किया गया था, लेकिन कहाँ है लोकतंत्र ?"

गौरतलब है कि करण बहुत जल्द लेखक अमिश त्रिपाठी की बेस्टसेलर किताब 'इममॉरटल्स ऑफ मलूहा' पर फ़िल्म बनाने जा रहे हैं लेकिन वो कहते हैं कि उन्हें चिंता है कि इस फ़िल्म के बाद कहीं उनका खून ना हो जाए या उन्हें देश छोड़कर भागना ना पड़े.

सेंसरबॉर्ड हो शक्तिशाली

सेंसरबोर्ड द्वारा पास हो जाने के बावजूद फ़िल्में कई कसौटियों पर फेल भी हो जाती है और अगर कोई भी एक वर्ग नाराज़ हो जाए तो सिनेमा हॉल तक फ़िल्म का पहुंचना मुश्किल हो जाता है.

तो क्या फ़िल्मों के मामले में सबसे ताकतवर समझी जाने वाली संस्था वास्तव में कोई दमख़म नहीं रखती ? क्यों सेंसरबॉर्ड का आदेश वाकई में आखिरी आदेश क्यों नहीं है ?

विश्वरुपम
कमल हासन की फिल्म विश्वरुपम को एक धार्मिक संगठन द्वारा कड़ी आपत्तियां झेलनी पड़ी थी

एक अख़बार से की गई बातचीत में सीबीएफसी की मुख्य कार्यकारी निदेशक पंकजा ठाकुर कहती हैं "सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है की बोर्ड का फैसला आखरी फैसला होना चाहिए. ख़ास कर इस डर के अंदेशे से किसी फ़िल्म के लगने से कुछ अनहोनी हो सकती है, उसको सिनेमा हॉल में लगने से रोका नहीं जा सकता. हां कुछ घटना हो जाए तो फ़िल्म को उतारा जा सकता है."

पंकजा के मुताबिक, "हम कोशिश कर रहे हैं कि विश्वरुपम या आरक्षण जैसे केस दोबारा ना हो जब फ़िल्मों को पास करने के बावजूद रिलीज़ से रोका गया था. सूचना एंव प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी भी इस कोशिश में है कि किस तरह बोर्ड को और मज़बूत बनाया जा सके."

सेंसरशिप पर गहरा विचार

अपनी फ़िल्म लव सेक्स और धोखा का ज़िक्र करते हुए निर्देशक दिबाकर बनर्जी कहते हैं, "इस फ़िल्म में एक कट सुझाया गया था जिससे मुझे आपत्ति थी. फ़िल्म में एक किरदार कहता है की मुझे इस कॉलेज में एडमिशन अपनी जाति के आधार पर मिली है लेकिन इसके बावजूद भी मुझे दाखिला मिलता क्योंकि मैं स्मार्ट हूं"

दिबाकर ने बताया कि उनसे कहा गया कि इससे आप लोगों का ध्यान जातिवाद की तरफ खीचेंगे जिसपर उनका जवाब था कि ये लाइन तो दरअसल उनके हित में है.

अपनी बात को पूरा करते हुए दिबाकर कहते हैं, "फ़िल्म में किरदार का खून उसकी जाति की वजह से ही होता है और अगर फ़िल्म में ये बात नहीं दिखाई गई तो कहानी का मूल क्या रह जाएगा? इस तरह की सेंसरशिप पर और गहरा विचार किया जाना चाहिए."

वहीं पंकजा के मुताबिक सेंसरबॉर्ड के पैनल में विभिन्न क्षेत्र के लोग होते हैं और सबकी सोच अलग होती है, इस वजह से फ़िल्म को कई आंखों से होकर गुज़रना पड़ता है.

फ़िल्मकारों की अपनी शिकायत है और सेंसरबॉर्ड के अपने जवाब. इस बीच कुछ ऐसी कैंचियां भी है जो फ़िल्मों को थिएटर हॉल तक पहुंचने ही नहीं देती.

ऐसी कैंचियां ज्यादा धारदार है और फ़िल्म इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी चुनौती.

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