फिल्में, जहां असल नहीं डिजिटल एक्टर काम करते हैं...

  • 20 अप्रैल 2013

हॉलीवुड की एक्शन फिल्में अपने हैरतअंगेज़ स्टंट के लिए जानी जाती है. इनमें से कुछ स्टंट काफी खतरनाक भी होते हैं.

आप पर्दे जब अपने पसंदीदा अभिनेताओं को देखते हैं तो शायद आपको लगता होगा कि ये सभी सीन इन्होंने खुद किए हैं.

दरअसल इनमें से कई किरदार दरअसल उस कलाकार के डिजिटल चेहरे होते हैं. ये थ्री डाइमेंशनल एनिमेशन कहलाता है.

इसे एक ऐसी तकनीक से तैयार किया गया है जो फिल्में बनाने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है.

पॉल डबेविक यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के ग्राफिक्स रिसर्च में काम करते हैं.

(ये रिपोर्ट ग्लोबल इंडिया कार्यक्रम का हिस्सा है)

वे कहते हैं, "हॉलीवुड में आजकल ये चलन बढ़ रहा है जहाँ असल कलाकारों की जगह उनका डिजिटल रूप इस्तेमाल किया जाता है, खासकर स्टंट दृश्यों में जहाँ असल कलाकारों के साथ शूट करना बेहद महंगा या खतरनाक हो सकता है."

डिजिटल चेहरा

दर्शकों ने द एवेंजर्स जैसी फिल्मों में डिजिटल मॉडल देखे हैं जो असल लगते हैं. लेकिन डिजिटल चेहरे दिखाना पेचीदा काम है.

चेहरे की एक-एक चीज़ सही तरीके से दिखाने के लिए एनिमेटर्स को कलाकार की कई तस्वीरें चाहिए होती हैं. ये सारी तस्वीरें एक समय खींची होनी चाहिए.

यहाँ से लाइट स्टेज तकनीक का काम शुरु होता है. दरअसल एक रिसर्च प्रयोगशाला में नौ फुट का स्फीयर रखा गया है जिसमें 6900 एलईडी लगी हैं.

ये किसी भी दिशा से किसी भी रंग की रोशनी पैदा कर सकता है. इस प्रयोगशाला में आप किसी भी हॉलीवुड स्टार को खड़ा कर दीजिए.

सात कैमरे कई तरह की रोशनी में तस्वीरें लेनी शुरु कर देते हैं. एक्टर के करीब 30 तरह के हाव-भाव रिकॉर्ड किए जाते हैं.

एनिमेट्रर इन छवियों को कम्यूपयर में फीड करते हैं. इन सबको मिलकार एक डिजिटल मैप तैयार किया जाता है.

ये मैप थ्री डी मॉडल का आधार बनता है. यही बारिकीयाँ डिजिटल मॉडल को असल कलाकार जैसा बनाती है.

गेमिंग में भी इस्तेमाल

वीडियो गेम
तकनीक के इस्तेमाल के बिना आज के सिनेमा की कल्पना करना मुश्किल है.

पॉल डबेविक बताते हैं, "एनिमेटर को चेहरे की शेप सही सही बनानी होती है, त्वचा का टेक्चर भी सही होना चाहिए. हर बार जब आपके चेहरे पर नया भाव आता है ये चीज़ें बदल जाती हैं. इसलिए डिजिटल मॉडल तैयार करने के लिए असल व्यक्ति का इस्तेमाल करना पड़ता है."

हॉलीवुड फिल्म द एवेंजर्स में इस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल किया गया है.

इस तकनीक का इस्तेमाल घरों में गेमिंग कन्सोल में भी किया जा रहा है. पर कैसे?

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के पॉल डबेविक समझाते हैं, "अपने फोन से कुछ फोटो हमारे सिस्टम में अपलोड करें. हम आपका डिजिकल वर्जन तैयार कर देंगे जो हूबहू आपकी तरह होगा. फिर उसे आपके गेम कंसोल में डाउनलोड कर दिया जाता है."

तो ये विशेष तकनीक फिल्मों और गेमिंग की दुनिया में नए प्रयोग करने में मदद कर रही है.

यहाँ असल और नकली में फर्क बताना मुश्किल हो जाता है.

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