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क्या डरा पाएगी बिपाशा की 'आत्मा'?

 शुक्रवार, 22 मार्च, 2013 को 16:43 IST तक के समाचार
बिपाशा बासु

आत्मा एक सायकोलॉजिकल सुपरनैचुरल थ्रिलर है. माया (बिपाशा बासु) और अभय (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) पति पत्नी हैं और इनकी एक बेटी भी है. हालाँकि माया और अभय की शादी-शुदा ज़िन्दगी तनावपूर्ण है पर दोनों ही अपनी बेटी निया (डोयेल धवन) से बेहद प्यार करते हैं.

अभय, माया पर इतने अत्त्याचार करता है कि माया उससे तलाक लेने की ठान लेती है. तलाक के बाद जब बात आती है कि निया किसके पास रहेगी तो कोर्ट माया के हक में फैसला देता है.

ये बात अभय के गले से नहीं उतरती और वो सरे आम माया को धमकी दे देता है. उसी रात अभय की एक एक्सीडेंट में मौत हो जाती है.

आत्मा

मज़बूत पक्ष:

  • अच्छा अभिनय

कमज़ोर पक्ष:

  • न के बराबर डरावनी
  • साधारण संगीत

रेटिंग:*1/2

अब अभय की आत्मा निया के इर्द-गिर्द के लोगों को डराने लगती है. इस आत्मा से छुटकारा पाने के लिए माया की मां यानी की निया की नानी एक पूजा भी रखवाती है. लेकिन अभय की आत्मा, पंडित और निया की नानी दोनों को ही मार डालती है.

इतना ही नहीं अभय की आत्मा माया की बहन को भी मार डालती है और इस क़त्ल का इलज़ाम आता है माया पर.

माया को जेल हो जाती है. पुलिस के सामने अपनी बात को हज़ार बार रखने पर भी कोई माया की इस बात पर यकीन करने को तैयार नहीं होता कि ये सब अभय की आत्मा कर रही है.

जब माया जेल में होती है तो उसे पंडित की एक बात याद आती है. यही की जीते जी वो निया को अभय से नहीं बचा सकती. तो क्या अपनी बच्ची को बचाने के लिए माया अपनी जान गंवा देती है?

क्या अभय की आत्मा निया को अपने साथ ले जाने में कामयाब हो जाती है? या फिर फिल्म का अतं कुछ और ही होता है?

सतही फिल्म

आत्मा के निर्देशक हैं सुपर्ण वर्मा. फिल्म की कहानी और पटकथा बहुत ही कमज़ोर है. फिल्म में एकाध ही ऐसा दृश्य है जिसे देख कर आपको वाकई डर लगता है.

बिपाशा बासु

बिपाशा इससे पहले राज़ 3 में नज़र आई थी.

फिल्म में जो डरावने दृश्य हैं भी वो भी दर्शकों को उतना नहीं डराते जितना की डराना चाहिए. हां कुछ दृश्य में जान है लेकिन पूरी फिल्म बड़ी ठंडी है.

एक थ्रिलर फिल्म सेक्स, डर और ड्रामा से मिलकर बनती है लेकिन इस फिल्म में ये तीनों ही चीज़ें बहुत कम बल्कि न के बराबर ही हैं.

फिल्म का संगीत, जो कि सिद्धार्थ और संगीत हल्दीपुर ने दिया है, फिल्म के विषय के हिसाब से कमज़ोर है.

फिल्म के डायलॉग, जिन्हें सुदर्शन द्विवेदी और खुद सुपर्ण वर्मा ने लिखा है, बहुत ही साधारण हैं.

अभिनय

बिपाशा बासु की अगर बात करें तो वो अपने किरदार को बखूबी निभाती हैं.

नवाज़ का काम भी काबिले तारीफ है लेकिन फिल्म में अपनी कला को दिखाने का पूरा मौका मिल नहीं पाया है उन्हें. बाल कलाकार डोयल धवन ने भी अच्छा काम किया है.

नवाज़

कोमल के मुताबिक नवाज़ को फिल्म में अपनी कला को दिखाने का पूरा मौका नहीं मिला है.

फिल्म में जयदीप अहलावत एक पुलिस वाले की भूमिका में है और उनका काम भी बढ़िया है.

निर्देशन

सुपर्ण वर्मा का निर्देशन ठीक-ठाक ही है. सोफी विनक्वीस्ट का 'कैमरा वर्क' अच्छा है.

जय सिंह के एक्शन दृश्य बढ़िया हैं. सुकांत पानीग्रेह के सेट साधारण हैं और हेमंत कोठारी की एडिटिंग भी ठीक-ठाक ही है.

सटीक शब्दों में कहूं तो आत्मा बेहद ही सतही फिल्म है. मुझे नहीं लगता कि आत्मा बॉक्स ऑफिस पर कुछ कमाल कर पाएगी. हालांकि इस फिल्म में ज्यादा पैसा नहीं लगा है तो ये फिल्म के निर्माताओं के लिए एक अच्छी बात है.

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