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'औरतों से कहते थे, उधर मत जाना रंजीत आ गया'

 मंगलवार, 25 दिसंबर, 2012 को 08:12 IST तक के समाचार
रंजीत

रंजीत, भारतीय फिल्मों में खलनायक के सिमटते दायरे से चिंतित हैं.

भारत में खलनायकी के एक जाने-पहचाने नाम रंजीत कहते हैं कि अब हिंदी सिनेमा में विलेन के लिए दायरा छोटा हो गया है.

रंजीत ने 70 और 80 के दशक की कई फिल्मों में खलनायक की भूमिका अदा की. उन्होंने अमिताभ बच्चन अभिनीत अमर अकबर एंथनी, मुक़द्दर का सिकंदर, लावारिस और शराबी जैसी फिल्मों में चर्चित किरदार निभाए.

वो ये भी कहते हैं कि आजकल जैसी फिल्में बन रही हैं, उनमें खलनायक की भूमिका की अहमियत ही कम होती जा रही है. रंजीत हिंदी फिल्मों के मौजूदा स्वरूप को लेकर चिंतित हैं.

कला और किरदार

"मैं कहीं भी जाता, लोग कहते अरे रंजीत आ गया. लोग महिलाओं से कहते उधर मत जाना, रंजीत आ गया."

रंजीत, अभिनेता

रंजीत कहते हैं, "अब कला और किरदार की बात कोई नहीं करता. एक फिल्म की कामयाबी को अब महज कमाई के पैमाने से नापा जाता है. जैसे फिल्म, फिल्म ना हो कोई बैलेंस शीट हो."

लेकिन अपने दौर में नकारात्मक भूमिकाएं निभाने वाला ये कलाकार उस दौर की फिल्मों के बारे में सकारात्मक सोच रखता है.

कुछ समय पहले जयपुर आए रंजीत गुजरे दौर को याद करते हुए कहते हैं, "उस दौर में फिल्म के हीरो और कलाकार पैसे की बात नहीं करते थे. अगर आप उस दौर में नायक से पैसे की बात करते तो वो नाराज हो जाते और कहते क्या मैं कोई व्यापारी हूँ. लेकिन अब किसी फिल्म में किरदार, उसके प्रदर्शन, कला और संवाद के बारे में बात नहीं होती. लोग 100 करोड़, 200 करोड़ के कलेक्शन की बातें करते रहते हैं."

सचमुच विलेन समझने लगे

रंजीत अपने बारे में कई दिलचस्प बातें बताते हैं. वो कहते हैं कि पर्दे पर उनके निभाए किरदार उनके असल जीवन पर इतने हावी हो गए थे कि वो जहां जाते, लोग उन्हें हिकारत से देखते.

"अब कला और किरदार की बात कोई नहीं करता. एक फिल्म की कामयाबी को अब महज कमाई के पैमाने से नापा जाता है. जैसे फिल्म, फिल्म ना हो कोई बैलेंस शीट हो."

रंजीत, अभिनेता

वे कहते हैं, "मैं कहीं भी जाता लोग कहते अरे रंजीत आ गया. लोग महिलाओं से कहते उधर मत जाना, रंजीत आ गया."

लेकिन वो ये भी बताते हैं कि जब लोग उनसे मिलते, बातें होती हैं तो उन्हें भरपूर आदर मिलता है.

हिंदी फिल्मो में बतौर खलनायक लम्बे अर्से तक छाए रहे रंजीत कहते हैं, "पहले की फिल्मों में मनोरंजन करना एक मकसद होता था, लेकिन फिल्में एक पैगाम भी देती थीं. मैंने खलनायक के रोल किए हैं. मेरे किरदार की फिल्मों में पिटाई होती थी जिससे ये संदेश दिया जाता था कि बुरे काम करोगे तो नतीजा बुरा होगा. अब तो लोग सोचते हैं कि एक आइटम सॉन्ग डाल दो, इधर-उधर से जोड़कर कुछ फिल्में बना दो. बस."

रंजीत मौजूदा दौर की फिल्मों के गीत-संगीत और संवादों से भी निराश ही दिखते हैं.

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