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बड़ी फिल्मों की 'दादागिरी'!

 शनिवार, 10 नवंबर, 2012 को 08:09 IST तक के समाचार
जब तक है जान, हिंदी फिल्म

फिल्में छोटी या बड़ी नहीं होतीं, वो तो बस अच्छी या बुरी होती हैं.

लिखने में ये बात अच्छी लगती है लेकिन असल में बड़ी और छोटी फिल्मों के लिए सिनेमा हॉल तक का सफ़र एक जैसा नहीं होता.

बीते कुछ दिनों से अजय देवगन की 'सन ऑफ सरदार' और यशराज फिल्म्स की 'जब तक है जान' के बीच ऐसी ही एक लड़ाई चल रही है.

ये दोनों ही फिल्में दिवाली के दिन यानि 13 नवंबर को रिलीज होनी है.

पर सन ऑफ सरदार के निर्माता इरोज़ एंटरटेनमेंट और सह निर्माता अजय देवगन ने यश राज फिल्म्स पर सिनेमा हॉल पर एकाधिकार जमाने का आरोप लगाया है.

अजय के मुताबिक उनके पास अपनी फिल्म को रिलीज़ करने के लिए सिनेमा घर ही नहीं हैं क्योंकि ज़्यादातर सिनेमा घरों पर यशराज ने पहले से ही बुकिंग कर रखी है.

"मुंबई के दादर में सात सिनेमाघर हैं. जिनमें से छ: पर यशराज की फिल्म लगने वाली है. हमारे लिए बचा एक सिनेमाघर. अब आप ही बताएं कि क्या ये बात गलत नहीं है"

अजय देवगन, अभिनेता और निर्माता, सन ऑफ सरदार

अजय कहते हैं, ''मुंबई के दादर में सात सिनेमा घर हैं. जिनमें से छह पर यशराज की फिल्म लगने वाली है. हमारे लिए बचा एक सिनेमाघर. अब आप ही बताएं कि क्या ये बात गलत नहीं है.''

सिनेमा पर एकाधिकार कितना सही

सिनेमा पर एकाधिकार के इस मामले के लिए सन ऑफ सरदार ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन आयोग द्वारा इस शिकायत को खारिज कर दिया गया.

तो क्या निर्माताओं द्वारा सिनेमा घरों को महीनों पहले बुक करवाने की इस प्रथा पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती?

"अगर आप 6 थियेटर में जब तक है जान लगाएंगे और एक थियेटर में सन ऑफ़ सरदार तो जाहिर है कि दर्शक जब तक है जान को ही प्राथमिकता देगा. "

अभिजीत घोलप, निर्माता, देऊल

फिल्म ट्रेड विश्लेषक कोमल नाहटा कहते हैं, "कार्रवाई कैसे हो सकती है. ये तो वही बात हुई कि मैं एक रेस्तरां खोलूं और सरकार कहे कि यहां केवल 100 लोग ही खाना खा सकते हैं. अरे भई 100 खाएं या 200 ये तो मेरी क्षमताओं पर निर्भर करता है ना.''

वहीं राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म देऊल के निर्माता अभिजीत घोलप का अनुभव कुछ और ही कहता है.

अभिजीत की फिल्म 'भारतीय' अगस्त महीने में यशराज की 'एक था टाइगर' की रिलीज़ के पहले प्रदर्शित हुई थी.

पर 15 अगस्त को जब 'एक था टाइगर' रिलीज हुई तब अभिजीत से उनकी फिल्म भारतीय को उतारने के लिए कहा गया.

अभिजीत के मुताबिक ''एक तरफ आप कहते हैं कि कंज़्यूमर राजा है, अरे पर उसे चुनाव का मौका तो दो. अगर आप छह थियेटर में 'जब तक है जान' लगाएंगे और एक थियेटर में सन ऑफ़ सरदार तो जाहिर है कि दर्शक जब तक है जान को ही प्राथमिकता देगा. ये कहाँ का इन्साफ है? आप दर्शकों को चुनने का मौका तो दें!''

सिनेमा बुक कराने की ज़रुरत

सवाल ये भी है कि सिनेमा घरों को पहले से बुक कराने की ज़रुरत क्यों है?

फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी के मुताबिक, "हमारा जो 100 करोड़ की फिल्मों को लेकर पागलपन है ये सिनेमा घर बुक कराना उसी का नतीजा है."

"हमारा जो 100 करोड़ फिल्मों को लेकर पागलपन है ये सिनेमाघर बुक कराना उसी का नतीजा है. 3 दिन में 100 करोड़ का बिज़नेस तभी मुमकिन है जब ज़्यादा से ज़्यादा स्क्रीन पर सिर्फ आपकी फिल्म दिखाई जाए,"

नम्रता जोशी, फिल्म समीक्षक

तीन दिन में 100 करोड़ का बिज़नेस तभी मुमकिन है जब ज़्यादा से ज़्यादा स्क्रीन पर सिर्फ आपकी फिल्म दिखाई जाए, ज़ाहिर है इससे दूसरी फिल्म को कम स्क्रीन ही मिलेगी."

वहीं ट्रेड विश्लेषक कोमल नाहटा का कहना है, "क्यों नहीं सन ऑफ सरदार के निर्माता ने दिवाली के लिए पहले से सिनेमा हॉल बुक करा लिए. उन्हें भी तो पता था ना कि दिवाली पर ये दोनों फिल्में आ रही हैं."

छोटी फिल्मों की मुसीबत

मराठी फिल्म निर्माता अभिजीत घोलप कहते हैं, ''महाराष्ट्र सरकार ने मल्टीप्लेक्स के लिए क़ानून बनाया है की उन्हें एक मराठी फिल्म अपने मल्टीप्लेक्स में चलानी ही पड़ेगी. मगर उस क़ानून पर अमल कहाँ होता है? वे देते भी हैं तो सुबह 10 बजे का शो देते हैं जिसे दर्शक कितना देखने जा पायेगा?''

फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी के मुताबिक, ''मॉनोपॉली के इस वातावरण में छोटे और इंडिपेंडेंट निर्माताओं को बहुत समस्या हुई है और ये सही नहीं है कि एक आदमी अपना इस तरह वर्चस्व बना ले कि दूसरों को पनपने ही ना दे.''

शायद फिल्म की असली परीक्षा आपके नज़दीकी थिएटर में रिलीज होने के बाद नहीं, थिएटर तक पहुंचने से पहले होती है.

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