यश चोपड़ा की 10 यादगार फिल्में

  • 23 अक्तूबर 2012
यश चोपड़ा
यश चोपड़ा को भले ही 'किंग ऑफ रोमांस' कहा जाता हो, लेकिन उन्होंने हर किस्म की फिल्में बनाईं.

सिनेमा जगत का एक अमूल्य रत्न यश चोपड़ा, जिनके नाम के साथ 'किंग ऑफ रोमांस' यानी 'रोमांस का बादशाह' जुड़ा हुआ है, उनकी अकस्मात मौत से बॉलीवुड ही नहीं सभी फिल्मी प्रेमियों में एक उदासी सी छाई है.

भला जो इंसान ज़िंदगी को इतनी ख़ूबसूरत निगाहों से देखता हो, वो अचानक ज़िंदगी से इतनी दूर कैसे जा सकता है. ऐसे में हम बात करेंगे उनकी ऐसी फिल्मों की जिन्होंने दर्शकों के मन में अमिट छाप छोड़ी

वक्त (1965)

60 का दशक, जब फिल्मों में अमूमन एक हीरो और एक हीरोइन होती थी. ऐसे में वो एक ऐसी फिल्म लेकर आए जिसमें एक, दो नहीं बल्कि कई सितारे थे.

'वक्त', हिंदी सिनेमा की पहली मल्टी स्टारर फिल्म थी, जो लॉस्ट एंड फाउंड फॉर्मूले पर आधारित थी. ये फॉर्मूला कुछ ऐसा हिट हुआ कि अगले तीस सालों तक बॉलीवुड में ऐसी फिल्मों की भरमार हो गई.

'वक़्त' के साथ ही मशहूर अभिनेता राजकुमार की संवाद अदायगी बेहद मशहूर हो गई.

इत्तेफाक़ (1969)

'वक्त' की कामयाबी के बाद ऐसा नहीं हुआ कि यश चोपड़ा ने इसी तर्ज पर फिल्में बनानी शुरू कर दीं. 'इत्तेफाक़' बिलकुल अलग तरह की फिल्म थी, जिसे बनाकर यश चोपड़ा ने दर्शकों को चौंका दिया.

फिल्म सिर्फ एक रात की कहानी थी, जिसमें एक भी गाना नहीं था. ऐसा दौर, जब गाने, फिल्मों को अहम हिस्सा हुआ करते थे और कई-कई फिल्मों में तो 8-10 गाने तक होते थे. ऐसे वक्त में बिना गानों की फिल्म बनाना एक बेहद बहादुरी भरा फैसला था.

राजेश खन्ना-नंदा की ये मर्डर थ्रिलर ने साबित कर दिया कि कंटेट वज़नदार हो तो परिपाटी से अलग हटकर भी काम करने से कामयाबी मिलती है.

दाग (1972)

ये फिल्म यशराज बैनर के तले बनने वाली पहली फिल्म थी. इससे पहले यश चोपड़ा अपने बड़े भाई बी आर चोपड़ा के बैनर तले फिल्में निर्देशित करते थे.

दाग़
1972 में आई 'दाग़' ने मौजूदा सामाजिक नियमों को चुनौती दी.

दाग, हालांकि अंग्रेज़ी फिल्म 'सनफ्लॉवर' से प्रेरित थी लेकिन उसे समकालीन बनाने के लिए उन्होंने इसकी कहानी को गुलशन नंदा से लिखवाया.

समय से आगे की ये फिल्म थी, जिसमें एक शख्स की पत्नी गायब हो जाती है, तो वो बिना शादी किए एक दूसरी महिला के साथ रहने लगता है.

किस्मत एक बार फिर उसका सामना उसकी बीवी से करवाती है और आखिर में दोनों महिलाएं उस शख्स के साथ रहने लगती है.

काफी बहादुर किस्म की फिल्म थी, जिसने उस समय के समाज के मौजूदा नियमों को चुनौती दी. तारीफ की बात तो ये रही कि फिल्म ज़बरदस्त कामयाब भी रही.

दीवार (1975)

'दीवार' ने अमिताभ के करियर को बुलंदियों पर पहुंचा दिया.

ये फिल्म अमिताभ बच्चन के करियर को एक नए मुकाम पर ले गई. दो भाइयों की कहानी, एक कानून का रखवाला और दूसरा कानून का मुज़रिम, इस कहानी को यश चोपड़ा ने बेहतरीन तरीके से परदे पर पेश किया.

सलीम जावेद की स्क्रिप्ट और संवाद, जैसे- मेरे पास मां है, तो भारतीय सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं.

1976 में आई फिल्म कभी-कभी, इसके बिलकुल विपरीत फिल्म थी. ये यश चोपड़ा की एक और मल्टीस्टारर फिल्म थी, जिसमें साहिर के लिखे गाने और खय्याम के संगीत ने ऐसी धूम मचाई कि इतने सालों बाद भी ये गीत बड़े चाव से सुने जाते हैं.

इसमें भी अमिताभ बच्चन मुख्य भूमिका में थे. इन दोनों ही फिल्मों में यश चोपड़ा ने उन्हें बिलकुल जुदा अंदाज़ में पेश किया.

त्रिशूल (1978)

संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की मुख्य भूमिका वाली ये फिल्म एक 'नाजायज़ बेटे' के अपने पिता से बदला लेने की कहानी है.

एक बार फिर मज़बूत कथानक, बेहतरीन अभिनय और यश चोपड़ा के कसे हुए निर्देशन ने ऐसा जादू चलाया कि फिल्म ब्लॉकबस्टर साबित हुई और यश चोपड़ा का नाम हिंदी सिनेमा के अग्रणी नामों में शुमार हो गया.

कभी-कभी
यश चोपड़ा ने एक ही वक्त में कभी-कभी और दीवार जैसी दो बिलकुल जुदा फिल्में पेश कीं.

इसके बाद आई 'काला पत्थर', जो कोयला खान में काम करने वाले मज़दूरों की दुर्दशा और मालिकों के लालच की दास्तां है.

फिल्म को आश्चर्यजनक तौर पर बॉक्स ऑफिस में ज़्यादा कामयाबी नहीं मिली, लेकिन लीक से हटकर बनी इस फिल्म को काफी सारहना मिली.

इसमें अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा के बीच फिल्माए गए कुछ दृश्य काफी चर्चित रहे.

सिलसिला (1981)

अमिताभ बच्चन, रेखा और जया बच्चन की मुख्य भूमिका वाली ये फिल्म अपनी कास्टिंग की वजह से सबसे ज़यादा चर्चा में रही. रेखा, जया और अमिताभ को एक फिल्म में लाने का मुश्किल काम यश चोपड़ा ने अंजाम दिया.

ये फिल्म व्यवसायिक तौर पर ज़्यादा नहीं चली लेकिन इसके गीत बड़े लोकप्रिय साबित हुए.

चांदनी (1989)

खूबसूरत लोकेशंस और बेहतरीन संगीत से सजी फिल्म चांदनी के साथ एक बार फिर यश चोपड़ा रोमांस की तरफ लौटे.

एक बार फिर यश चोपड़ा रोमांस की तरफ लौटे और नाच-गाने से भरपूर फिल्म बनाई चांदनी.

श्रीदेवी, ऋषि कपूर की मुख्य भूमिका वाली ये फिल्म ज़बरदस्त कामयाब रही. यश चोपड़ा ने खूबसूरत लोकेशंस को बखूबी परदे पर उतारा और फिल्म ने दर्शकों को सुखद अहसास दिया.

लम्हे (1991)

बेहद जोखिम मोल लेकर बनाई गई ये फिल्म. अपने वक्त से आगे की फिल्म. जिसमें एक लड़की को अपनी मां के प्रेमी से प्यार हो जाता है.

इस तरह की कहानी इससे पहले हिंदी सिनेमा के परदे पर कभी नहीं आई. फिल्म में अनिल कपूर और श्रीदेवी का ज़बरदस्त अभिनय था. फिल्म के गीत भी काफी लोकप्रिय रहे, लेकिन शायद दर्शक इतनी बहादुर और लीक से हटकर बनी फिल्म की कहानी को पचा नहीं पाए.

डर (1993)

1997 में 65 साल के यश चोपड़ा ने एक बेहद युवा फिल्म बनाई 'दिल तो पागल है'.

एक तरह से ये फिल्म ट्रेंडसेटर साबित हुई. जैसे दीवार ने अमिताभ बच्चन के करियर में पंख लगा दिए थे, वैसे ही डर ने शाहरुख खान के करियर को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया.

फिल्म की कहानी हीरो नहीं बल्कि एक विलेन के हीरोइन से एकतरफा प्रेम के इर्द गिर्द बुनी गई थी.

शाहरुख खान का निभाया ये खल पात्र काफी लोकप्रिय साबित हुई और फिल्म सुपरहिट रही.

ये यश चोपड़ा का ही कमाल था कि ऐसी कहानी चुनकर उन्होंने उसे कामयाब भी बना दिया.

दिल तो पागल है (1997)

शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित और करिश्मा कपूर जैसे सितारों को लेकर 65 साल के यश चोपड़ा ने ये बेहद युवा फिल्म बनाई और नई पीढ़ी के निर्देशकों के समक्ष एक चुनौती पेश कर दी.

बेहतरीन संगीत और भावनात्मक कहानी से सजी ये फिल्म युवा और उम्रदराज़, हर किस्म के दर्शकों को भाई.

यश चोपड़ा के ना रहने से एकबारगी ऐसा लग रहा है मानो हिंदी सिनेमा से रोमांस ही चला गया हो.

यश चोपड़ा की फिल्मों में हीरोइन को जिस खूबसूरत तरीके से पेश किया जाता था, वैसा उदाहरण कम ही मिलता है.

स्विटज़रलैंड के एल्प्स पर्वत में शिफॉन साड़ी पहनी हुई अपने प्रेम का इज़हार करती एक लड़की, इसमें कहीं भी भोंडापन या ओछापन नहीं होता था.

हिंदी सिनेमा के परदे में वो यश चोपड़ा का मासूम, निश्छल रोमांस क्या वापस आ पाएगा. ये बड़ा सवाल है.