क्या ऑस्कर के लायक है बर्फी?

 गुरुवार, 27 सितंबर, 2012 को 14:18 IST तक के समाचार
बर्फी

ऑस्कर की विदेशी फिल्मों की श्रेणी में भारत की ओर से बर्फी के नामांकित होने के बाद जहाँ फिल्म से जुड़े लोग खुश हैं तो वहीँ बहुत लोग इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि क्या वाकई 'बर्फी' ऑस्कर लायक है या नहीं.

अगर एक वर्ग ये कह रहा है कि 'बर्फी' का ऑस्कर के लिए नामांकित होना सही है तो दूसरा वर्ग ये सवाल उठा रहा है कि क्या जूरी के पास 'बर्फी' से बेहतर कोई फिल्म नहीं थी जिसे भारत की ओर से भेजा जा सकता था.

बर्फी के चुने जाने के बाद कुछ फिल्म समीक्षकों ने इस बात को भी उजागर किया है कि बर्फी के कुछ दृश्य सीधे ही चार्ली चैपलिन की फिल्म से लिए गए हैं. हालाँकि फिल्म के निर्देशक अनुराग बासु कहते हैं कि अपनी फिल्म में इन दृश्यों के ज़रिए वो चार्ली चैपलिन को श्रद्धांजलि दे रहे थे. अब बासु की ये दलील कितनों के गले उतरती है इस बात में मुझे शंका है.

अब यहाँ गौर फरमाने वाली बात एक और भी है. मीडिया का एक तबका और कुछ प्रशंसक दिलो-जान से चाहते हैं कि उनकी पसंदीदा फिल्म 'बर्फी' ऑस्कर जैसा बड़ा पुरस्कार जीत जाए. और ये वही लोग हैं जो भारतीय फिल्मों की ये कह कर निंदा करते हैं कि इन फिल्मों में नाच गाना ही प्रमुख होता है और क्रिएटिविटी पर कोई तवज्जो नहीं दी जाती.

जाने माने फिल्मकार श्याम बेनेगल ये नहीं समझ पा रहे हैं कि ऑस्कर पुरस्कारों के लिए बर्फी के चुने जाने पर इतना हंगामा क्यों मचा है.

हालाँकि खुद बेनेगल ने अभी तक ये फिल्म नहीं देखी है पर फिर भी वो कहते हैं, ''फिल्म फेडरेशन का काम है किसी एक फिल्म को ऑस्कर के लिए चुनना. नामांकन के लिए आई अनेक फिल्मों में से किसी भी एक को चुन लेना एक औपचारिकता मात्र है. इसिलए ज़रूरी नहीं है कि जो फिल्म चुनी गई है वो सबसे अच्छी है.''

इंडिया एट ऑस्कर्स

"फिल्म फैडरेशन का काम है किसी एक फिल्म को ऑस्कर के लिए चुनना. नामांकन के लिए आई अनेक फिल्मों में से किसी भी एक को चुन लेना एक औपचारिकता मात्र है. इसिलए ज़रूरी नहीं है कि जो फिल्म चुनी गई है वो सबसे अच्छी है."

श्याम बेनेगल

भारत की ओर से आजतक 40 से ऊपर फिल्में ऑस्कर के लिए भेजी गई हैं. इनमें से ज़्यादातर फिल्में हिंदी में थी. प्रादेशिक सिनेमा कभी भी फिल्म फेडरेशन की पसंदीदा नहीं रही हैं. आठ बार तमिल फिल्मों को भेजा गया तो दो बार बंगाली भाषा में बनी फिल्में ऑस्कर जाने में कामयाब हुई. वहीँ मराठी, मलयालम और तेलगु फिल्म अब तक बस एक एक ही बार चुनी गई.

1957 में महबूब खान की 'मदर इंडिया', 1988 में मीरा नायर की 'सलाम बॉम्बे' और 2001 में आशुतोष गोवारिकर की 'लगान' को ऑस्कर पुरस्कार की आखिरी सूची में नामांकन प्राप्त करने का गौरव तो मिला लेकिन ये फिल्में भी इस पुरस्कार को जीत नहीं पाई.

भारत की ओर से अकादमी पुरस्कार या ऑस्कर पुरस्कारों में भेजी जाने वाली फिल्मों के इर्द-गिर्द विवादों का होना कोई नई बात नहीं है. भारत में सालाना 900 फिल्में बनाई जाती हैं इन फिल्मों का ऑस्कर जीतना तो दूर ये तो ऑस्कर के लिए नामांकित होने लायक भी नहीं होती.

मेरा मानना तो ये है कि आज तक कभी भारत की ओर से ज्यादा संख्या में फिल्में इस पुरस्कार के लिए भेजी ही नहीं गई और एक वजह ये भी है कि लोगों को लगता है कि भारतीय फिल्में ऐसे पुरस्कारों की होड़ में शामिल होने के लायक ही नहीं है. जबकि मुझे लगता है कि भारत में कई ऐसी फिल्में बनती हैं जो चाहे कहानी के स्तर पर हों या कला के स्तर पर उनमें किसी भी पुरस्कार को जीतने का दम होता है.

सत्यजीत रे, मृणाल सेन, अडूर गोपालकृष्णन और राज कपूर जैसे भारतीय फिल्मकारों की फिल्में दुनिया भर में मशहूर हैं. इनकी फिल्मों ने कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में पुरस्कार जीते हैं. मुझे फिल्म फेडरेशन ऑफ़ इंडिया की जूरी की यही बात सबसे ज्यादा अखरती है कि वो हमेशा ही अच्छी फिल्मों को छोड़ कर औसत फिल्मों को ऑस्कर के लिए चुनते हैं.

पान सिंह तोमर

पान सिंह तोमर भी बर्फी के साथ ऑस्कर के लिए भेजे जाने वाली फिल्मों की सूची में शामिल थी.

उदहारण के तौर पर बिमल रॉय की 'मधुमती', सत्यजीत रे की 'महानगर', 'अपुर संसार' और 'शतरंज के खिलाड़ी', गुरु दत्त की 'साहिब बीवी और ग़ुलाम', एमएस सत्यु की 'गरम हवा', श्याम बेनेगल की 'मंथन', राकेश ओम प्रकाश मेहरा की 'रंग दे बसंती' और आमिर खान की 'तारे ज़मीन पर' जैसी बेहतरीन फिल्में भी जब इस जूरी को प्रभावित नहीं कर पाई तो इसमें दोष किसका समझा जाए, जूरी का या फिर फिल्मों का?

अब मैं आपको ये भी बता दूं कि जूरी ने पिछले सालों में किस तरह की फिल्मों को चुना है. रमेश सिप्पी की 'सागर', विधु विनोद चोपड़ा की 'परिंदा' और 'एकलव्य', मणी रतनम की 'अंजली' और 'गुरु' और दीपा मेहता की 'अर्थ' जैसी औसत फिल्मों को ऑस्कर जैसे मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने भेजा गया. सबसे ज्यादा हैरानी तो मुझे तब हुई जब विक्रमादित्य मोटवाने की फिल्म 'उड़ान' को न चुनकर जूरी ने 'पीपली लाइव' को ऑस्कर की दौड़ में भेजने के लिए चुना.

'मदर इंडिया', 'सलाम बॉम्बे' और 'लगान' जैसी फिल्मों का ऑस्कर की आखिरी सूची में अपनी जगह बनाना इस बात को साबित करता है कि दुनिया भारत से किस तरह की फिल्मों की उम्मीद करती है. ऐसी फिल्मों की जिनमे भारतीय संस्कृति और सभ्यता देखने को मिले. क्या बर्फी देख कर आपको कभी भी ये लगा कि इस फिल्म में भारत की संस्कृति या कला को किसी तरह से प्रदर्शित किया गया है?

क्या वाकई बर्फी इस साल की बेहतरीन फिल्म है?

'बर्फी' पर छिड़ी बहस यूँ ही ख़तम होने वाली नहीं है. कम से कम तब तक तो नहीं जब तक हम उस ताने-बाने को न समझ ले जो हमें ये सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या वाकई बर्फी इस साल की बेहतरीन फिल्म है. अगर बर्फी इस साल ऑस्कर में कुछ कर दिखाने से चूक जाती है तो बहुत से चाहनेवाले बात को ये कह कर आया गया कर देंगे कि उन्हें ऑस्कर के मिलने या न मिलने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

लेकिन भारतीय सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष रह चुकी शर्मीला टैगोर ऐसा नहीं सोचती.

"ऑस्कर बहुत बड़े पुरस्कार हैं. हमें इनमें हिस्सा ज़रूर लेना चाहिए. ऑस्कर में विदेशी फिल्मों की श्रेणी बनाई ही इसलिए गई है ताकि हम अपनी फिल्में इसमें भेज सकें. लेकिन इस प्रतियोगिता के लिए हमें अपनी बेहतरीन फिल्में भेजनी चाहिए. "

शर्मीला टैगोर-सेंसर बोर्ड पूर्व अध्यक्ष

शर्मीला कहती हैं, ''ऑस्कर बहुत बड़े पुरस्कार हैं. तो हमें इनमें हिस्सा ज़रूर लेना चाहिए. ऑस्कर में विदेशी फिल्मों की श्रेणी बनाई ही इसलिए गई है ताकि हम अपनी फिल्में इसमें भेज सकें. लेकिन इस प्रतियोगिता के लिए हमें अपनी बेहतरीन फिल्में भेजनी चाहिए. हम जो फिल्म भेज रहे हैं हमें उस पर पूरा यकीन होना चाहिए फिर चाहे वो पुरस्कार जीते या नहीं वो और बात है.''

अनुराग कश्यप जिनकी फिल्म 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' भी बर्फी के साथ ऑस्कर के लिए भेजे जाने वाली फिल्मों की सूची में थी, मानते हैं कि भारत में ऑस्कर को लेकर लोग कुछ ज्यादा ही भावुक हैं. अनुराग ये भी मानते हैं कि ऑस्कर के लिए फिल्मों के चुनाव की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है.

अनुराग कहते हैं कि वो तो इस बात से भी हैरान थे कि जूरी के सामने अपनी फिल्म को पेश करने के लिए फिल्म के निर्माता को 50,000 रूपए की राशि जमा करवानी पड़ती है.

अनुराग की बात में सुर मिलाते हुए श्याम बेनेगल कहते हैं, ''मान लीजिए की आपकी फिल्म भारत की और से ऑस्कर में भेजी गई है. आपके पास कम से कम दस लाख रूपए होने चाहिए ताकि आप अमरीका जाकर ऑस्कर की जूरी में शामिल हर व्यक्ति को अपनी फिल्म दिखाएं. ऐसा नहीं है कि जूरी को फिल्म दिखा कर आप उनके निर्णय को बदल देंगे लेकिन हर सदस्य को फिल्म दिखाना अपने आप में ही एक बड़ी बात है.''

आखिर ऑस्कर के लिए भेजे जाने वाली फिल्म का चुनाव होता कैसे है?

फिल्म फेडरेशन ऑफ़ इंडिया एक कमेटी का चुनाव करती है जो ये तय करती है कि उस साल रिलीज़ हुई फिल्मों में से कौन सी फिल्म ऑस्कर भेजने लायक है.

गैंग्स ऑफ़ वासेपुर

अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर भी दौड़ में शामिल थी.

इस कमेटी में फिल्मों से जुड़े कई लोग जैसे फिल्म निर्देशक, लेखक और निर्माता शामिल होते हैं. ये कमेटी जो फिल्म चुनती है फिर वो फिल्म सब टाइटल्स के साथ ऑस्कर की जूरी के सामने पेश की जाती है.

हो सकता है कि कमेटी में शामिल लोगों ने खुद जो फिल्में बनाई है उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर कई रिकॉर्ड तोड़े हों लेकिन फिर भी इंडस्ट्री में बहुत लोग मानते हैं कि कमेटी में शामिल लोग इस लायक हैं ही नहीं कि वो ऑस्कर के लिए एक अच्छी फिल्म का चुनाव कर पाएं.

इस कमेटी से जुड़ी और भी कई शंकाएं लोगों के मन में हैं. फिल्मकार अनुराग कश्यप कहते हैं कि इस कमेटी में कौन कौन शामिल है उनके नाम कभी सामने ही नहीं आते.

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