कैसी है जलपरी

 गुरुवार, 30 अगस्त, 2012 को 12:26 IST तक के समाचार
जलपरी

जलपरी की कहानी दिल को छू जाती है.

हिंदी फिल्मों में ऐसा कम ही होता है जब बच्चों के लिए बनी किसी फिल्म को बच्चों के साथ साथ व्यस्क दर्शकों का प्यार भी मिले. इसकी एक वजह ये भी है कि बच्चों के लिए बनी फिल्मों को ज़रूरत से ज़्यादा नाटकीय रूप से प्रस्तुत किया जाता है.

'स्टैन्ले का डब्बा', 'ज़ोकोमौन', 'गट्टू' और 'आई एम कलाम' हाल ही में बनी ऐसी कुछ फिल्में हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा में बच्चों की फिल्मों के स्वरुप को बदला है. इसी कड़ी में एक और कड़ी जोड़ती है 'जलपरी'.

'आई एम कलाम' के निर्देशक नीला माधब पांडा की ही पेशकश है 'जलपरी'. कहानी है श्रेया की जो किशोरावस्था में है और खुद को किसी लड़के से कम नहीं समझती. श्रेया के परिवार में चार लोग हैं, उसकी नानी, उसके पिता और उसका छोटा भाई सैम. श्रेया का भाई कई शरारतों में उसका भागीदारी है. श्रेया के कहने पर उसका पूरा परिवार दिल्ली से हरियाणा के लक्ष्मीगढ़ जाते हैं.

श्रेया के दादा का घर लक्ष्मीगढ़ में है. श्रेया और उसके भाई सैम ने अपने पैत्रिक घर के बारे में कई कहानियां सुनी हैं और इसलिए वो इस घर में जाने के लिए बेताब हैं. श्रेया और उसके भाई ने इस घर से जुडी अपने दिमाग में एक अलग ही दुनिया बना रखी है. एक ऐसी दुनिया जहाँ नदियाँ हैं, झरने हैं, पहाड़ हैं, घास के खुले मैदान हैं. लेकिन जब वो यहाँ पहुँचते हैं तो उनके सपनों को चकनाचूर होते देर नहीं लगती.

लक्ष्मीगढ़ पहुँचने पर उन्हें मिलती हैं धूल से भरी सड़कें, सूखे हुए तालाब और अजीब से लोग.

लक्ष्मीगढ़ में आज भी लोग रुढ़ीवादी रीति रिवाज़ों में मान्यता रखते हैं. इन रिवाज़ों के कारण वहां रहने वाले लोगों को पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरसना पड़ता है. सबसे बड़ी बात जो श्रेया को हिला कर रख देती है वो है कि इस गाँव में लड़कियां हैं ही नहीं.

जलपरी

  • कलाकार: कृशांग त्रिवेदी, लहर खान, प्रवीण दबास, तनिष्ठा चैटर्जी, पियूष मिश्रा, सुहासिनी मुले
  • निर्देशक: नीला माधब पांडा
  • रेटिंग: ***

निर्देशक नीला माधब पांडा ने एक गाँव की पृष्ठभूमि में अपने किरदारों को बखूबी रचा है. उनके किरदार या उनका गाँव नाटकीय नहीं बल्कि असलियत के काफी करीब है.

इस गाँव के लोगों के दिलों में एक ऐसा डर छुपा है जिसके बारे में वो किसी से भी खुल कर बात नहीं करते हैं. गाँव के लोगों के दिलों में एक 'डायन' का डर है और श्रेया इसी डर को दूर करना चाहती है. जिस गाँव में लड़कियों को जन्म देने तक की इजाज़त न हो उस गाँव में श्रेया जैसी हंसमुख लड़की की अठखेलियाँ लोग कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं.

फिल्म कन्या भ्रूण हत्या पर आधारित है जो आज भी भारत के कई राज्यों में की जाती है. ऊपर से 'जलपरी' भले ही एक साधारण सी फिल्म लगे लेकिन फिल्म में कई परते हैं. नीला माधब ने अपनी फिल्म में कन्या भ्रूण हत्या जैसी गंभीर समस्या को जिस मानवीय ढंग से पेश किया है वो काबिले तारीफ है. फिल्म में श्रेया और सैम का किरदार आपका दिल ज़रूर जीतेगा.

पूरी फिल्म में नीला ने अपनी पकड़ बनाए रखी है और फिल्म अपनी राह से नहीं भटकती. बाल फिल्म होते हुए भी इस फिल्म ने मुझ पर एक अमिट छाप छोड़ी है. ये फिल्म बच्चों के लिए ज़रूर बनाई गई है लेकिन इसका मज़ा बड़े भी भरपूर ले सकते हैं.

फिल्म की कहानी लिखी है दीपक वेंकटेशन ने. फिल्म में श्रेया के किरदार में लहर खान और सैम के किरदार में कृशांग त्रिवेदी खासे प्रभावित करते हैं. फिल्म में 'बरगद' नाम से पियूष मिश्रा का एक गाना भी है जो फिल्म के मूड के साथ बहुत अच्छे से जाता है.

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