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सिनेमा में "असली चेहरे"

 गुरुवार, 5 जुलाई, 2012 को 05:29 IST तक के समाचार
गैंग्स ऑफ वासेपुर

सिनेमा में कभी दर्शक 70 एमएम पर आंखे फाड़े हीरो को देखता था और सोचता था काश! मैं भी ऐसा होता और एक आज का वक्त है जब फिल्म देखते हुए दर्शक सोचता है अरे! ये हीरो तो मेरे जैसा ही है.

हिंदी सिनेमा में अब चेहरों की परिभाषा बदल रही है. यहां हीरो शंघाई का जोगी परमार जैसा दिखता है जिसके दांत हर वक्त पान से सने रहते हैं और हीरोइन,गैंग्स ऑफ वासेपुर की नगमा जैसी जो अपने कर्व से नहीं बल्कि अपनी नर्व तड़काने वाली बातों और अदाओं के लिए पहचानी जा रही है.
अहम बात ये है कि ग्लैमरस चेहरों के साथ साथ ये साधारण चेहरे फिट है और हिट भी है.

कमर्शियल हिंदी सिनेमा में ग्लैमरस लुक्स का हमेशा ही बोलबाला रहा है. पर समानांतर सिनेमा ने ऐसे चेहरे दिखाए जो भीड़ से अलग नहीं, भीड़ का हिस्सा लगें. फिर वो अर्ध सत्य के ईमानदार पुलिस अफसर अनंत वालेणकर के रोल में ओमपुरी हो या फिर मिर्च मसाला की सोनबाई के रोल में स्मिता पाटिल. समांतर सिनेमा ने कला भी दी औऱ कलाकार भी पर पैसा कमाने में कामयाबी हाथ नहीं लगी.

पान सिंह तोमर के निर्देशक और बैंडिट क्वीन में कास्टिंग डायरेक्टर रहे तिग्मांशु धूलिया कहते हैं "बात कास्टिंग की नहीं है, बात ये है कि कौन लोग है जो साधारण चेहरों को लेकर ऐसी लीक से हटकर फिल्में बना रहे हैं और साथ में पैसा भी कमा रहे हैं".

"लोग मेरी तस्वीर देखकर मुझे बुला लेते थे पर जब मैं ऑफिस पहुंचता था तो लोग कहते थे, अरे ये तो काला है और हाइट भी कम है इसकी. कभी कभी ऐसा लगता था कि हाई हिल्स के जूते पहनने लगूँ या इस स्किन को चीर के थोड़ा सा गोरा कर लूँ."

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, अभिनेता

पीपली लाइव और कहानी जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का दम दिखाने वाले नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, गैंग्स ऑफ वासेपुर के पहले भाग में फैज़ल के रोल में नज़र आए थे. अपने शुरुआती अनुभव बांटते हुए नवाज़ कहते हैं "लोग मेरी तस्वीर देखकर मुझे बुला लेते थे क्योंकि तस्वीर को तो फोटोशॉप से गोरा किया जा सकता है ना पर जब मैं ऑफिस पहुंचता था तो लोग कहते थे, अरे ये तो काला है और हाइट भी कम है इसकी. और इस तरह वो मुझे रिजेक्ट कर देते थे. कभी कभी ऐसा लगता था कि हाई हिल्स के जूते पहनने लगूँ या इस स्किन को चीर के थोड़ा सा गोरा कर लूँ".

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने पीपली लाइव और कहानी में काफी प्रशंसा बटोरी

"हमारे देश में बहुत टैलेंटेड कलाकार हैं जिनको गोरे रंग, सिक्स पैक्स वाले के सामने नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. एक स्टार अपने आपको ही फिल्म में दिखाता है लेकिन एक्टर, किरदार में घुस जाता है""

दिबाकर बनर्जी, निर्देशक,शांघाई

हाल ही में आई फिल्म शंघाई के निर्देशक दिबाकर बनर्जी कहते हैं "हमारे देश में बहुत टैलेंटेड कलाकार हैं गावं में,छोटे शहरों में, नाटकों में, जिनको पाउडर, गोरे रंग, गोरी चमड़ी, सिक्स पैक्स वाले के सामने नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. पर कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जिनको कहने के लिए एकदम मिट्टी से जुड़े किरदार चाहिए होते हैं जिन्होंने दुनिया देखी हो और जो साथ ही अच्छे एक्टर भी हो. एक स्टार और एक एक्टर में फर्क होता है, स्टार अपने आपको ही फिल्म में दिखाता है लेकिन एक्टर, किरदार में घुस जाता है".

पर सवाल ये भी है कि इस बिना मैकअप और बिना चकाचौंध वाले कलाकार को दर्शक की हरी झंडी मिल रही है या नहीं. गैंग्स ऑफ वासेपुर में नगमा का रोल निभाने वाली ऋचा चड्डा कहती हैं "अब लोग हर तरह के कलाकारों को स्वीकार कर रहे हैं. मैं कोई स्टार किड तो नहीं हूँ पर फिर भी मुझे गैंग्स में इतना जरुरी रोल मिला और लोगों को मैं पसंद भी आ रही हूँ. मैं अपने स्पॉट बॉय के लिए टिकट लेने गई तो लोगों ने कहा टिकट बाद में लेना,पहले ऑटोग्राफ दो"

नवाज़ कहते हैं "दर्शक को मुझ जैसे आदमी को स्वीकार करने में वक्त लगता है. वो सोचता है ये तो मेरे जैसा ही है ये हीरो कैसे बन सकता है. पर एक बार जब वो स्वीकार कर लेता है तो यही चेहरा उसके लिए एक प्रेरणा बन जाता है. वो सोचता है जब ये सफल हो सकता है तो मैं भी अपने क्षेत्र में सफल हो सकता हूँ"

"शांघाई के लिए हमने कई ऐसे लोगों को फिल्म में लिया जो एक्टर थे ही नही, यहां तक की एक चेहरा जो हमने चुना था वो असल में भी एक राजनितिक पार्टी का लीडर है ""

अतुल मोंगिया, कास्टिंग डायरेक्टर, शांघाई

अच्छी बात ये है कि सिर्फ मुख्य भूमिका में ही नहीं, फिल्म के छोटे छोटे किरदारों के चयन में भी कास्टिंग का ख़्याल रखा जा रहा है. फिल्म शंघाई के कास्टिंग डायरेक्टर अतुल मोंगिया कहते हैं " पहले फिल्मकार जाना पहचाना चेहरा लेना पसंद करते थे,पर कास्टिंग डायरेक्टर के आने से ये चीज़ बदली है. हम तो छोटे से छोटे किरदार के लिए भी ऑडिशन करते हैं ताकि सीन और बेहतर बनें". शंघाई का उदाहरण देते हुए अतुल बताते हैं "हमने कई ऑडिशन लिए, कई ऐसे लोगों को फिल्म में लिया जो एक्टर थे ही नही, यहां तक की एक चेहरा जो हमने चुना था वो असल में भी एक राजनितिक पार्टी का लीडर है "

तो क्या ये चेहरे,सिनेमा का चेहरा भी बदल रहे है? तिग्मांशु की माने तो जब थ्री इडियट्स या मुन्नाभाई जैसी फिल्में आम चेहरों के साथ बनाई जाएं, तब लगेगा कि वाकई में कमर्शियल सिनेमा बदल रहा है. तब तक, कहीं जाइएगा नहीं, तमाशा अभी खत्म नहीं हुआ.

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