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मोरक्को में भी 'वन टू का फोर' और 'खतरनाक' की धूम

 बुधवार, 28 मार्च, 2012 को 05:23 IST तक के समाचार

कासाब्लांका में पश्चिमी और पूर्वी संस्कृति का संगम नज़र आता है

कासाब्लांका मोरक्को का आर्थिक केंद्र है और कई मायनों में यह भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई से मिलता जुलता शहर है.

मोरक्को उत्तरी अफ्रीका का सबसे आखिरी देश है और यूरोप से इतना निकट है जितना अमृतसर से लाहौर. दोनों देशों को केवल भूमध्यसागर जुदा करता है.

लंदन से कासाब्लांका की उड़ान तीन घंटे में पूरी होती है. रास्ते में हमारी जान-पहचान मोरक्को की एक जोड़ी से हुई. दोस्ती इतनी बढ़ी कि उन्होंने हमें अपने घर रहने का न्यौता दे दिया.

एक अजनबी परिवार के साथ दिन गुजारना कुछ अजीब-सा लगा. लेकिन जब वो बार-बार इसरार करने लगे तो मैं उनका मेहमान बनने को तैयार हो गया. मोरक्को के लोगों की मेहमाननवाजी की जो चर्चा सुनी थी, वो सच निकली.

कासाब्लांका में हमारे मेज़बान ने हमारी खूब खातिर की. वो हमारे निजी गाइड की तरह साबित हुए. उन्होंने गर्व के साथ हमें अपने शहर और देश के पहले शॉपिंग-मॉल जाने की सलाह दी.

मिनी स्कर्ट और बुर्का

मैं वहां गया और इसे काफी सुन्दर पाया. लेकिन मुंबई और दिल्ली में इससे बड़े शॉपिंग-मॉल हैं. मोरक्को इस समय बदलाव की कगार पर है. कई इलाकों में पिछली सदी का माहौल नज़र आता है और कई दूसरे इलाके यूरोप की तरह दिखते हैं.

यहां पश्चिमी और पूर्वी संस्कृति का संगम भी नज़र आता है. ये पूरी तरह से मुस्लिम देश है लेकिन यहां लड़कियां मिनी-स्कर्ट और बुर्के दोनों में नज़र आती हैं.

मोरक्को इस समय बदलाव की कगार पर है

कासाब्लांका के कुछ इलाके मुंबई जैसे हैं और कुछ मुंबई से कहीं अच्छे और साफ़-सुथरे.

मुंबई से यहां भीड़ कम है और ट्रैफिक कानून के हिसाब से. यहां के समुद्री इलाके अधिक साफ़ हैं.

मुंबई जैसी झोपड़पट्टियां यहां कहीं देखने को नहीं मिलीं. लेकिन इसके बावजूद आर्थिक रूप से मुंबई कहीं आगे और मज़बूत नज़र आता है.

मुंबई की ऊंची इमारतें, कांच की इमारतें, बांद्रा-कुर्ला काम्प्लेक्स की तरह सुन्दर दफ्तरों से भरी जगहें यहां नहीं हैं.

बॉलीवुड के दीवाने

पूरे एक दिन तक शहर में घूमने और लोगों से बातें करने के बाद ये समझ में आया कि यहाँ के लोग भारतीयों से कितना प्यार करते हैं.

जब भी किसी को पता चलता कि मैं भारत से आया हूं, तो वो या तो हिंदी गाने की कुछ पंक्तियां गाने लगते या फिर शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन, ऋतिक रोशन और रानी मुखर्जी जैसे बॉलीवुड सितारों के नाम गिनाने लगते.

यहां अफ्रीका की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक मस्जिद है जो बेहद सुन्दर है. वहां के एक गार्ड को जब पता चला कि मैं मुंबई से आया हूं तो उसने मुझे मुफ्त में पूरी मस्जिद दिखाई.

शॉपिंग मॉल देखने के बाद मैं यहां के कुछ सिनेमाघर गया ये जानने कि बॉलीवुड की फ़िल्में यहां कितनी लोकप्रिय हैं.

तीन सिनेमाघरों में से दो में बॉलीवुड फ़िल्में दिखाई जा रही थीं.

एक सिनेमाघर के मैनेजर ने बताया कि नई बॉलीवुड फ़िल्में जल्दी नहीं मिलतीं, इसलिए उन्होंने बॉलीवुड की फ़िल्में दिखाना बंद कर दिया.

मोरक्को के लोग हिंदी फिल्मों के दीवाने हैं, लेकिन यहां बॉलीवुड की नई फिल्में सिनेमाघरों में जल्दी नहीं लगती हैं

जो दो सिनेमाघर फ़िल्में दिखा रहे थे, उनमें ये देखकर आश्चर्य हुआ कि फिल्में या तो पुरानी हैं या फिर वो जो फ्लॉप रही हैं.

एक सिनेमाघर में शाहरुख खान की फिल्म 'वन टू का फोर' दिखाई जा रही थी. सिनेमाघरों की शिकायत ये थी कि उन्हें नई फ़िल्में जल्दी नहीं मिलती हैं और मांग इतनी ज्यादा है कि उन्हें मजबूरी में पुरानी या फ्लॉप फिल्में दिखानी पड़ती हैं.

दूसरा जो कारण उन्होंने बताया वो ज्यादा चिंताजनक था यानी पाइरेसी की बढती समस्या.

नई फिल्मों की नकली डीवीडी आसानी से मिल जाती हैं और लोग इन्हें खरीदकर घर पर देखना पसंद करते हैं. एक युवक ने मुझे बताया कि वो नकली डीवीडी पर नई फ़िल्में खरीदता है और इन फिल्मों को कई बार देखता है.

घरों में परिवार के साथ बॉलीवुड की फ़िल्में देखने का यहां काफी चलन है. मैं अगले दिन कासाब्लांका से घंटे भर की दूरी पर बसे एक शहर पहुंचा जहां तीन पीढियां टीवी पर एक फिल्म देख रही थीं.

फिल्म का नाम था 'खतरनाक' और संजय दत्त इसके हीरो थे. फिल्म देखते-देखते परिवार की एक महिला के आँखों में आंसू आ गए. कारण ये था कि संजय दत्त उनके मरे भाई की याद दिलाता है.

मेरा अगला पड़ाव है मराकश जहां अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख खान तक फिल्म फेस्टिवल में भाग लेने आ चुके हैं.

दोनों दिसंबर में फिर से आने वाले हैं. मिस्र में बनी फ़िल्में यहां खूब चलती हैं. लेकिन बॉलीवुड की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है और अगर उन्हें समय पर नई फ़िल्में मिल जाएं तो बॉलीवुड यहां मिस्र के सिनेमा से अधिक लोकप्रिय बन सकता है.

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