BBC navigation

महिलाओं की 'सेक्शुएलिटी' पर बहस

 गुरुवार, 8 नवंबर, 2012 को 18:42 IST तक के समाचार
विद्या बालन

परिणीता और मुन्ना भाई जैसी फ़िल्मों में पारंपरिक किरदार निभाने वाली विद्या बालन आई हैं नए किरदार में

अगर आप सिनेमा का शौक़ रखते हैं तो फ़िल्म द डर्टी पिक्चर का नाम इन दिनों ज़रूर सुना होगा. फ़िल्म में विद्या बालन 80 के दशक में मशहूर हुई कई डांसिंग सितारों से मिलता-जुलता किरदार निभा रही हैं. ये फ़िल्म दक्षिण भारतीय सिनेमा की डांसिंग स्टार सिल्क स्मिता की याद दिलाती है.

क्लिक करें

सिल्क स्मिता 80 के ज़माने की सबसे लोकप्रिय, हॉट डांसिंग स्टार थी जो सेक्स सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं.

परिणीता और मुन्ना भाई जैसी फ़िल्मों में पारंपरिक किरदार निभाने वाली विद्या बालन भी द डर्टी पिक्चर में सिल्क स्मिता जैसे ही भड़कीले लिबास, नमकीन अंदाज़ और उत्तेजक दृश्यों में दिखाई दे रही हैं.

लेकिन फ़िल्म द डर्टी पिक्चर में अपने किरदार में सेक्शुएलिटी के चित्रण को विद्या बालन न ग़लत मानती हैं, न अशलील.

"फ़िल्म में मैने सिल्क नाम का जो किरदार निभाया है वो बहुत ही बेबाक, बिंदास और निडर है. वो रंगीन लड़की है. उसे लगता है कि अगर लोगों को मेरा जिस्मा अच्छा लगता है तो मैं दिखाउँगी. मुझे नहीं लगता कि ये बेशर्म है. इस लड़की में कोई झिझक नहीं और जब बेझिझकता होती है तो अश्लीलता नहीं होती."

विद्या बालन

विद्या कहती हैं, "फ़िल्म का नाम 'द डर्टी पिक्चर’ ज़रूर है पर इसमें कोई गंदगी नहीं है. गंदगी दिमाग़ में होती है. फ़िल्म में मैने सिल्क नाम का जो किरदार निभाया है वो बहुत ही बेबाक, बिंदास और निडर है. वो रंगीन लड़की है. उसे लगता है कि अगर लोगों को मेरा जिस्म अच्छा लगता है तो मैं दिखाउँगी. कुछ लोगों का मानना होगा कि ये बर्शमी है पर मुझे नहीं लगता कि ये बेशर्मी है. इस लड़की में कोई झिझक नहीं और जब बेझिझकता होती है तो अश्लीलता नहीं होती."

क्या है अश्लीलता ?

भारतीय फ़िल्मों में सेक्शुएलिटी के प्रदर्शन और महिलाओं के चित्रण को लेकर हमेशा से ग़लत-सही की बहस होती रही है. लोग फ़िल्मों में महिलाओं के चित्रण को नैतिकता के पैमाने पर तोल कर देखते हैं.

70 के दशक में आई फ़िल्म चेतना में रेहाना सुल्तान ने शराब और सिग्रेट पीने वाली एक वेश्या का बेबाक रोल किया था.कहते हैं कि रेहाना सुल्तान के आगे के फ़िल्मी करियर पर इस छवि का बहुत बुरा असर पड़ा था क्योंकि फ़िल्म में उनका किरदार, कुछ दृश्य और इसमें उठाए सवाल बहुत बोल्ड थे.

"अगर आप छोटे कपड़े पहनते हो या सेक्स के बारे में बात करते हो तो इसके ये मायने नहीं है कि आप बुरी लड़की हो. वैसे ये तो है कि अगर आपमें सेक्स अपील नहीं है तो आप टॉप हीरोइन नहीं गिने जाओगे. टॉप हीरोइनें हमेशा से थोड़ी नमकीन रहीं हैं."

भावना सोमाया

वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक और लेखिका भावना सोमाया मानती हैं कि अगर कोई अभिनेत्री सेक्स सिंबल के तौर पर भी जानी जाती है तो इसे नैतिकता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.

भावना सोमाया के मुताबिक, "अगर आप छोटे कपड़े पहनते हो या आप सेक्स के बारे में कहीं बात करते हों तो इसके ये मायने नहीं कि आप बुरी लड़की हो या वैंप हो जैसा कि पहले होता था. पहले या तो आप मीना कुमारी की तरह सती सावित्री वाले किरदारों में होते थे या फिर बिंदु की तरह वैंप. आजकल ऐसा है कि अगर आपमें सेक्स अपील नहीं है तो आप टॉप हीरोइन नहीं गिने जाओगे. आप कोई भी टॉप हीरोइन ले लो वो हमेशा से थोड़ी नमकीन रही है."

बिंदास

बात चली थी फ़िल्म द डर्टी पिक्चर से जो कथित तौर पर डांसिंग स्टार सिल्क स्मिता के जीवन से प्रेरित बताई जाती है. कहते हैं कि 80 के दशक में बड़े से बड़े दक्षिण भारतीय सितारों की माँग होती थी कि फ़िल्म में सिल्क का एक गाना होना ही चाहिए क्योंकि उनकी मदमस्त अदाँए हिट फ़िल्म की गारंटी होती थीं.

सिल्क लाखों दिलों की फ़ैंटसी थी लेकिन जीवन, प्यार और करियर से निराश स्मिता एक दिन अपने कमरे में मृत पाई गई थी. विद्या बालन और उनके जैसे कई लोग मानते हैं कि सिल्क स्मिता का दोहन हुआ.

स्तंभकार जयप्रकाश चौकसे के मुताबिक इस पूरी समस्या की जड़ सेक्शुएलिटी के चित्रण को लेकर सेंसर बोर्ड के बेवजह सख़्त नियम भी हैं.

वे कहते हैं, "आज़ादी के पहले सेंसर बोर्ड के नियम काफ़ी लचीले थे-प्रेम दृश्य कैसे भी फ़िल्माओ, चुंबन के दृश्य भी होते थे. ब्रितानी केवल इस बात पर बंदिश लगाते थे कि अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ कुछ न हो. लेकिन आज़ादी के बाद सेंसर बोर्ड के नियम इतने सख़्त कर दिए गए कि उनसे बचने के लिए इधर उधर के रास्ते अपनाए जाने लगे- जैसे प्रेम दृश्य के नाम पर दो फूलों का मिलना, तोता मैना का मिलन आदि. नतीजा ये हुआ कि औरतों की सेक्शुएलिटी का विकृत रूप सामने आने लगा."

जयप्रकाश चौकसे कहते हैं कि भारत ने तो अब तक अश्लीलता की अपनी परिभाषा भी निर्धारित नहीं की है. उनके मुताबिक भारतीय दंड संहिता में पोर्नोग्राफ़ी का जब ज़िक्र होता है तो कहा गया है कि वेबस्टर डिक्शनरी तीन को देखा जाए.

सही-ग़लत

"आज़ादी के पहले सेंसर बोर्ड के नियम काफ़ी लचीले थे. पर आज़ादी के बाद सेंसर बोर्ड के नियम इतने सख़्त कर दिए गए कि उनसे बचने के लिए इधर उधर के रास्ते अपनाए जाने लगे- जैसे प्रेम दृश्य के नाम पर दो फूलों का मिलना, तोता मैना का मिलन आदि. नतीजा ये हुआ कि औरतों की सेक्शुएलिटी का विकृत रूप सामने आने लगा.""

जयप्रकाश चौकसे

वैसे ग़लत, सही, नैतिक, अनैतिक, शालीन, अश्लील...ये सारे सवाल फ़िल्मों में अकसर महिलाओं के चरित्रों को लेकर ही ज़्यादा उठते हैं.

पुरुष किरदार अकसर इन सवालों के घेरे में नहीं आते. 90 के दशक में जब दो समलैंगिक महिलाओं को दर्शाती फ़िल्म फ़ायर आई थी तो इसे अनैतिक बताते हुए सिनेमाघरों में ज़बरदस्त तोड़ फ़ोड की गई थी.

लेकिन संमलैंगिक पुरुष किरदारों के इर्द गिर्द घूमती अभिषेक बच्चन और जॉन अब्राहम की फ़िल्म दोस्ताना आई थी तो इसे हल्के फ़ुल्के अंदाज़ में लिया गया.

शायद ये समाज या कम से कम समाज के एक वर्ग का दोगलेपन दर्शाता है जो सिनेमा में भी महिलाओं को एक बंधे बंधाएँ खांचे में ही देखना और सोचना पसंद करता है...औरत का बेबाक और बिंदास रूप सिनेमा में भी नैतिकता के चश्मे से ही देखा जाता है...

इसे भी पढ़ें

BBC © 2014 बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.