'फ़ैज़ की शायरी रौशन अलाव की तरह है'

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को उनकी जन्म शताब्दी पर याद करने का सिलसिला पूरे भरतीय उपमहाद्वीप में जारी है.

हाल ही साहित्य अकादमी ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर एक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जिसमें दुनिया भर से लोग जमा हुए और फ़ैज़ की शायरी और उनके व्यक्तित्व पर रौशनी डाली.

इस मौक़े पर उर्दू के जाने-माने आलोचक प्रोफ़ेसर गोपीचंद नारंग ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि फ़ैज़ से जितनी मुहब्बत उर्दू वाले करते हैं, उतनी ही मुहब्बत हिंदी वाले भी करते हैं.

फ़ैज़ की शायरी में पूरी इंसानियत दिखाई देती है, उनकी शायरी सामाजिक मूल्यों की अभिव्यक्ति थीं.

मुनीज़ा हाश्मी, फ़ैज़ की सुपुत्री

उन्होंने कहा, "कोई भी नया देश अपनी जड़ों की तलाश में होता है और पाकिस्तान की सांस्कृतिक जड़े पांच हज़ार साल से चली आ रही भारतीय संस्कृति और 14 सदियों की मुस्लिम तहज़ीब में बसी हुई है."

उन्होंने फ़ैज़ की शायरी पर बात करते हुए कहा, "उनकी शायरी एक रौशन अलाव की तरह है जो वक़्त से साथ दहक रहा है. उर्दू में इक़बाल के बाद जो ख्याति फ़ैज़ को मिली वह किसी और के हिस्से में नहीं आई."

सेमिनार का उदघाटन करते हुए जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति नजीब जंग ने कहा कि फ़ैज़ की शख़्सियत को एक सांचे में रख कर नहीं देखा जा सकता. उनका व्यक्तित्व विविध प्रकार के आयामों को अपने भीतर समोए हुए थे.

उन्होंने ये भी कहा, "फ़ैज़ सूफ़ियों से भी प्रभावित थे और उनकी शायरी दुनिया में एशिया के प्रभाव की गवाही देती है."

ज़्यादा लोकप्रिय

गोपीचंद नारंग

गोपीचंद नारंग ने फ़ैज़ की शायरी की रौशन अलाव से तुलना की

उर्दू के प्रसिद्ध पाकिस्तानी कथाकार इंतिज़ार हुसैन ने कहा कि फ़ैज़ की शायरी में क्रांति से ज़्यादा गहरा रंग सहनशीलता और उदारता का है.

उन्होंने कहा, "फ़ैज़ की शायरी आधुनिक प्रबोधन की उदारता की उपमा है. आज पाकिस्तान में वह पहले से ज़्यादा लोकप्रिय हैं और अब उनके आलोचक भी उनके फ़न का लोहा मान चुके हैं."

जर्मनी से आई क्रिस्टीना ओस्टर हेल्ड ने कहा, "फ़ैज़ की शायरी समाज को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाती है."

प्रोफ़ेसर हरीश त्रिवेदी ने कहा कि फ़ैज जैसा लोकप्रिय शायर हमें किसी दूसरी भाषा में नहीं मिलता है.

फ़ैज़ की शायरी में क्रांति से ज़्यादा गहरा रंग सहनशीलता और उदारता का है

इंतिज़ार हुसैन, उर्दू के कहानीकार

उन्होंने फ़ैज़ और हिंदी के कवि अज्ञेय की समानताओं को दर्शाते हुए अपना आलेख पढ़ा.

पाकिस्तान की लोकप्रिय शायरा ज़हरा निगाह ने कहा, "फ़ैज़ की शायरी उनके व्यक्तित्व को दर्शाती है और वह मुहब्बत के रूपक अलंकार के शायर हैं. फ़ैज़ जैसे शायर सदियों में एक पैदा होते हैं."

सामाजिक मूल्यों की शायरी

इस मौक़े पर फ़ैज़ की छोटी बेटी मुनीज़ा हाश्मी भी मौजूद थीं. उन्होंने अपने पापा को याद करते हुए कहा, "उनकी शायरी सामाजिक मूल्यों की अभिव्यक्ति थीं. फ़ैज़ की शायरी में पूरी इंसानियत दिखाई देती है."

उन्होंने बीबीसी से ख़ास मुलाक़ात में बात करते हुए कहा कि फ़ैज़ की शायरी में इतने शेड्स हैं कि उन्हें समझना काफ़ी मुश्किल है.

उन्होंने कहा कि उनकी शायरी हर दौर और हर उम्र के लोगों के लिए है, सब उसे अपनी अपनी तरह से समझते हैं क्योंकि उनमें परत-दर-परत बातें हैं.

मुनीज़ा हाश्मी

मुनीज़ा हाश्मी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की छोटी बेटी हैं

उन्होंने कहा, जब मैं कॉलेज में पहुंच गई तो अपने वालिद के ज़्यादा क़रीब आ गई जैसा कि बाप-बेटी के रिश्ते में अकसर होता है.

मुनीज़ा हाश्मी ने बताया कि उन्होंने फ़ैज़ की याद में लाहौर में एक ट्रस्ट की स्थापना की है, वहां उनकी शायरी पर क्लास होती है और अन्य साहित्यिक और कल्चरल प्रोग्राम भी आयोजित होते हैं.

इस मौक़े से हर शाम फ़ैज़ की याद में मुशायरे का आयोजन हुआ, इस मौक़े पर फ़ैज़ साहब पर बनाई गई मुनीजा हाशमी की एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई.

साहित्य अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय ने कहा कि फ़ैज़ एक अंतरराष्ट्रीय शायर थे और उनका पैग़ाम ग्लोबल है.

फ़ैज़ की शायरी के विभिन्न रंगों पर इस तीन-दिवसीय सेमिनार में दुनिया भर से आए लोगों ने बात की, ऐसा लगा जैसे फ़ैज़ की ये पंक्तियां चरितार्थ हो गईं--

फ़ैज़ थी राह सर-ब-सर मंज़िल
हम जहां पहुंचे कामयाब आए

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