
एमएफ़ हुसैन अपनी एक पेंटिंग से साथ ख़ुद ही रू-ब-रू हैं.
सोचिए क्या हो, गर कूची के रंगों को थिएटर की कदमताल और मल्टीमीडिया की रूपहली तस्वीरों से मिला दिया जाए... और इन सब में जो एक बात शामिल हो उसका नाम हो मकबूल फ़िदा हुसैन.
गुरुवार की शाम दिल्ली के कई कलाकार, रंगकर्मी, सामाजिक, राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी में एमएफ़ हुसैन की ज़िंदगी का क़िस्सा बयां करती एक ई-बुक जारी की गई है.
हुसैन के स्केचों और ज़िंदगी के सफ़र की कहानी काव्यात्मक शैली में बताती यह ई-बुक आत्मकथात्मक शैली में तैयार की गई है. इस ई-बुक को तैयार करने का काम किया है कामना प्रसाद और उनके जिया प्रकाशन ने.
आवाज़, स्केचों और शब्दों के ज़रिए लोगों को हुसैन की ज़िंदगी के सफ़र के उन तमाम चौराहों और रास्तों से गुज़ारने की कोशिश की गई है जिनका हुसैन की ज़िंदगी पर ख़ासा असर है और जो हुसैन को एक महान कलाकार के मुक़ाम तक लेकर जाते हैं.
हुसैन के कथन को आवाज़ दी है बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार और जानेमाने रंगकर्मी परवेज़ आलम ने.
ई-हुसैन
मैं अपनी सरज़मी को झुककर सलाम करता हूँ.... दूर हूँ पर ये कहानी उस शख़्स की है जिसकी सुबहो-शाम हिंदुस्तान से रौशन है. मेरी दुनिया वहीं है जहाँ आप सब हैं.
एमएफ़ हूसैन का सेंदेश
ई-बुक की शुरुआत होती है हुसैन के एक साक्षात्कार से. इसमें कागज़ों पर लिखी कुछ पंक्तियों में अपना संदेश देते हुसैन सीधे देखने वाले से रूबरू हैं.
हुसैन अपने संदेश में कहते हैं, "मैं अपनी सरज़मीं को झुककर सलाम करता हूँ.... दूर हूँ पर ये कहानी उस शख़्स की है जिसकी सुबहो-शाम हिंदुस्तान से रौशन है. मेरी दुनिया वहीं है जहाँ आप सब हैं."
और फिर पर्त दर पर्त एक किताब खुलती जाती है. एक-एक कर हम हुसैन को देखते जाते हैं. भारत के बाहर बैठा एक महान कलाकार हुसैन नहीं, भारत की मिट्टी में पलता, बनता एक मकबूल फ़िदा हुसैन.
थिएटर के कलाकारों के ज़रिए इस कहानी को दिल्ली में ई-बुक के लोकार्पण पर पहुँचे लोगों के सामने पेश भी किया गया.
इस तरह केवल कैनवस या शब्दों में पढ़ी-समझी जा सकने वाली एक दास्तां लोगों के सामने कई माध्यमों के ज़रिए प्रस्तुत की गई.
आओ हुसैन
हुसैन पिछले कुछ अरसे से देश से बाहर हैं. वो भारत लौटना चाहते हैं पर विवादों की परछाई उन्हें हमवतन नहीं होने देती.

केंद्रीय मंत्री शशि थरूर भी इस ई-बुक के लोकार्पण पर पहुँचे थे.
एमएफ़ हुसैन की वापसी के लिए सरकार की ओर से की जा रही कोशिशों के सवाल पर उन्होंने कहा, "मैंने खुद भी उनसे बात की है. उन्हें न्यायालय से भी राहत मिल चुकी है. लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर वो किसी विवाद से या अराजक तत्वों से बचना चाहते हैं. उन्हें इसे लेकर शंका है. हालांकि सुरक्षा का सवाल मेरे विभाग में नहीं आता पर भारत सरकार उनके आने पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेगी."
कुलदीप नैय्यर, गोपीचंद नारंग, अशोक वाजपेयी जैसे कई लोग पहुँचे इस मौके पर. मकबूल की ई-बुक के अनावरण के बाद कुलदीप नैय्यर बोल पड़े, "कुछ मुट्ठीभर लोगों के कारण ऐसा क्यों हो कि पूरा का पूरा हिंदुस्तान हुसैन के सानिध्य से वंचित रहे. हुसैन को भारत आना चाहिए."
इस ई-बुक के साथ-साथ एक और कोशिश भी चल रही है और वो है मकबूल के पक्ष में हस्ताक्षर अभियान की. जीवन के 95 बसंत देख चुके एमएफ़ हुसैन को भारत आने में अभी कितना वक़्त लगेगा, ये वो ही तय करेंगे.
इस दौरान हुसैन के समर्थन में सामाजिक स्तर पर, सांस्कृतिक स्तर पर प्रयासों का सिलसिला जारी है. यह प्रयास इसी दिशा में एक और क़दम है.













