लंदन के हज़ारों यात्रियों के लिए लतीफ़ नानगरहारे भले ही भूमिगत ट्रेन सेवा में काम करने वाले कर्मचारी हों लेकिन अफ़गानिस्तान के हज़ारों लोगों के लिए लतीफ़ के गीत प्रेरणा का स्त्रोत हैं.

लतीफ़ नानगरहारे लंदन की भूमिगत ट्रेन सेवा में नौकरी कर अपना गुज़ारा चलाते हैं
लतीफ़ रोज़ आठ घंटे की नौकरी करते हैं जिसमें उनका काम होता है ये देखना कि ट्रेन समय पर चले और स्टेशन साफ़ सुथरा रहे.
इस ड्यूटी के बाद लतीफ़ की दूसरी ज़िंदगी भी है जहां वो अपने देश अफ़ग़ानिस्तान के एक उभरते हुए गायक हैं और उनके काफ़ी प्रशंसक हैं. उनके प्रशंसकों का कहना है कि पिछले 30 वर्षों से युद्ध झेल रहे अफ़ग़ानिस्तान के लिए उनके गीत उम्मीद की किरण है. उनके गाने से लोगों को प्रेरणा मिलती है.
लतीफ़ के गानों में उनके व्यक्तिगत जीवन का दुख भी शामिल है. 10 वर्ष पहले वे तालेबान के डर से अफ़गानिस्तान छोड़ कर लंदन जा बसे थे. 28 वर्षीय लतीफ़ कहते हैं कि वे खुद युद्ध झेल चुके हैं और अच्छी तरह अपने देशवासियों की पीड़ा समझते हैं.
वे कहते हैं कि अपने देश के इतिहास से उन्हें गाने की प्रेरणा मिलती है.
लतीफ़ कहते हैं, "और लोगों की ही तरह मैंने अपना देश छोड़ दिया और अपने घर वालों से दूर हो गया...इसलिए मैं गाना गाता हूँ. जो लोग भी अफ़गानी लोगों की हत्या करते हैं, उन्हें तबाह करते हैं मैं उनसे नफरत करता हूँ. जो लोग राह से भटक कर आत्मघाती हमले करते हैं, स्कूल के बच्चों की हत्या करते हैं उनसे मैं आग्रह करता हूँ कि यह समय बंदूक चलाने का नहीं है."
मेरा संदेश लोगों से यह है कि बच्चों की, अपने देशवासियों की हत्या वे नहीं करें. हमारे शहर, बाज़ार में बम धमाके नहीं करें. ये युवा गुमराह हो गए हैं
लतीफ़ नानगरहारे
'युवा गुमराह हैं'
लतीफ़ के गानों में अफ़ग़ानिस्तान के हिंसक कल और आज का चित्रण है.
उनके हालिया गाने 'अफ़ग़ानिस्तान' अफ़ग़ानी टेलीविज़न और रेडियो पर इन दिनों खूब सुनाई पड़ते हैं.
काबुल में रहने वाले मोहम्मद गुल कहते हैं, "इस गाने से मुझे यह प्रेरणा मिलती है कि मैं उनसे घृणा करूँ जो लोगों की हत्या करते हैं. लोग युद्ध से थक चुके हैं."
लतीफ़ कहते हैं कि उनके नए गाने अफ़ग़ानी लोगों को हिंसा का रास्ता छोड़ कर शांति और समृद्धि की तरफ़ बढ़ने के लिए प्रेरित करता है.
उनका कहना हैं, "मेरा संदेश लोगों से यह है कि बच्चों की, अपने देशवासियों की हत्या वे नहीं करें. हमारे शहर, बाज़ार में बम धमाके नहीं करें. ये युवा गुमराह हो गए हैं."
अफ़गानिस्तान में मनोरंजन के नाम पर बॉलीवुड के फ़िल्म और संगीत ही ज्यादार देखे और सुने जाते हैं.
वर्ष 1990 में अफ़ग़ानिस्तान पर तालेबान के क़ब्ज़े के बाद से वहाँ सभी तरह के संगीत पर रोक लगा दिया गया था. इससे पहले अफ़गानियों के सांस्कृतिक पहचान में संगीत की एक प्रमुख भूमिका थी. अफ़ग़ानिस्तान के विभिन्न समुदायों को संगीत एक साथ जोड़ने का काम करता था.
पूरी दुनिया में फैले अफ़ग़ानिस्तान के लाखों लोगों के बीच लतीफ़ के गानों की खूब चर्चा होती है और उनके गाने खूब देखे और सुने जाते हैं.
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में हुए एक संगीत समारोह में क़रीब तीन हज़ार लोग लतीफ़ को सुनने आए थे. अफ़ग़ानिस्तान के बाहर यह उनकी प्रसिद्धि को दर्शाता है.














