'उर्दू और हिंदी एक दूसरे की ताक़त'

गोपीचंद नारंग उर्दू भाषा और साहित्य की एक बड़ी हस्ती हैं. उन्होंने उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में 60 से अधिक किताबें लिखी हैं. वो साहित्य अकादमी के

गोपी चंद नारंग

अध्यक्ष रह चुके हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर अमेरिटस हैं.

पिछले दिनों लंदन पुस्तक मेले का आयोजन हुआ था जिसमें भारत से बहुत से जाने-माने लेखक और प्रकाशक हिस्सा लेने आए. प्रोफ़ेसर गोपीचंद नारंग भी उनमें शामिल थे. मैंने उन्हे बुश हाउस आमन्त्रित किया और लंबी बातचीत की.

भारत के विभाजन के बाद से उर्दू की भारत में उपेक्षा होती रही है. आप इसकी क्या वजह मानते हैं.

विभाजन से भारतीय उपमहाद्वीप ने जो मोड़ लिया वो प्राकृतिक नहीं था. मुझे नहीं मालूम कि तारीख़ इसके बारे में क्या फ़ैसला करेगी लेकिन इससे सीमा के दोनों ओर की संस्कृति को बहुत नुकसान पहुंचा. देश का विभाजन साम्प्रदायिक राजनीति की वजह से हुआ था लेकिन इसी साम्प्रदायिक राजनीति के मुंह पर तब चपत पड़ी जब बांगलादेश बना. ये साबित हो गया कि भाषा की ताक़त धर्म और जाति से अधिक होती है. कभी किसी ने पूछा कि मराठी हिंदू की ज़बान है या मुसलमान की, गुजराती का धर्म क्या है, मलयालम का क्या मज़हब है. उर्दू और हिंदी पर ही यह लेबल क्यों लगा. इसकी वजह ये है कि इन्हें साम्प्रदायिक राजनीति का हथियार बनाया गया.

ममता गुप्ता ने उनसे विशेष बात की:

बहरहाल चाहे-अनचाहे उर्दू मुसलमानों की ज़बान बन गई है. क्या इसकी कोई काट है.

भारत में सदियों से कई धर्म फले फूले हैं. हमारी परंपरा के अनुसार कण कण में ब्रह्म है. हमारी परंपरा घृणा करने ही नहीं देती. ये घृणा फैलाई गई है. ये प्राकृतिक नहीं है. हमारी परंपरा कबीर की है, नानक की है, तुकाराम की है, हब्बा ख़ातून और लल्लेश्वरी की है, बाबा फ़रीद और बुल्लेशाह की है. किसी ने घृणा या छोटेपन की बात नहीं की. मैं तो ये मानता हूं कि तारीख़ के पन्नों में 60 साल कुछ भी नहीं होते. वो एक पल के बराबर होते हैं. वो दिन आएगा जब घृणा की राजनीति करने वाले बेअसर हो जाएंगे.

भारत का आम आदमी ये भाषा बोलता रहा है तो फिर अब उसे अलग करके क्यों देखने लगा. क्या इसका कारण उसकी विदेशी लिपि है.

मैं उर्दू वालों को समझाता हूं कि डेढ़ ईंट की मस्जिद अलग मत बनाओ. तुम हिंदी से अलग नहीं हो. तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त हिंदी है. तुम इस धरती की पैदावार हो

गोपी चंद नारंग


ये सच है कि उर्दू की लिपि अरबी और फ़ारसी से ली गई है लेकिन क्योंकि यह भारत की ज़बान है इसलिए इसमें बहुत से बदलाव किए गए. जितनी भी हकार की आवाज़ें हैं जैसे फ भ थ ड़ ये सब अरबी-फारसी में नहीं हैं लेकिन उर्दू में हैं. इसी तरह छ टकार की आवाज़ें भी उर्दू में दाख़िल की गईं. उर्दू की रीढ़ वही है जो हिंदी की है. यानि दोनों भाषाओं की क्रियाएं एक हैं, व्याकरण एक है.

अगर स्कूलों के पाठ्यक्रम में उर्दू शामिल की जाए तो क्या भारत में उर्दू की स्थिति बदल सकती है.

स्कूलों में अगर ये इंतज़ाम हों तो उर्दू को ज़रूर फ़ायदा होगा. लेकिन सच पूछा जाए तो आज भी भारत में उर्दू पाकिस्तान से ज़्यादा बोली जाती है. भारत में उर्दू की ज़्यादा किताबें छपती हैं, ज़्यादा मुशायरे होते हैं, उर्दू की 12 -13 अकादमियाँ हैं, ग़ालिब अकादमी है, ग़ालिब इंस्टिट्यूट है, साहित्य अकादमी उर्दू के लिए काम करती है, पब्लिकेशन डिविज़न उर्दू के लिए काम करता है, मानव संसाधन मंत्रालय का नेशनल काउंसिल ऑफ़ प्रमोशन ऑफ़ उर्दू है जिसका करोड़ों का बजट है. हर साल उर्दू की एक हज़ार से बारह सौ तक किताबें छपती हैं.

तो आपकी नज़र में भारत में उर्दू का भविष्य अच्छा है.

बिल्कुल. आप उसे हिंदी कहिए, हिन्दुस्तानी कहिए या उर्दू कहिए. जब आप ग़म, शादी, ख़ुशी, अदालत, इंसाफ़, वकील, हवा जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो क्या ये पूछते हैं कि ये शब्द अरबी का है या हिंदी का. भाषाएं ये नहीं कहतीं कि इस मील पत्थर पर मैं हिंदी हो गई या इस मील पत्थर पर मैं उर्दू हो गई. मैं उर्दू वालों को समझाता हूं कि डेढ़ ईंट की मस्जिद अलग मत बनाओ. तुम हिंदी से अलग नहीं हो. तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त हिंदी है. तुम इस धरती की पैदावार हो. उर्दू की 70 प्रतिशत शब्दावली देसी है जबकि केवल 30 प्रतिशत अरबी फ़ारसी की है. इसी तरह मैं हिन्दी वालों से भी कहता हूं कि उर्दू तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त है. उर्दू और हिंदी में नाख़ून और गोश्त का रिश्ता है जो अलग हो ही नहीं सकता.

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