दुनिया में शंघाई को बाढ़ से सबसे ज़्यादा ख़तरा

 मंगलवार, 21 अगस्त, 2012 को 17:40 IST तक के समाचार
बैंगकॉक में बाढ़

तटीय शहरों में अनियंत्रित विकास से अक्सर लोगों की जानों को है और रों में बाढ़ का भी ख़तरा रहता है.

एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक चीन के शंघाई शहर में बाढ़ आने का ख़तरा सबसे ज़्यादा है.

आर्थिक रूप से ज़्यादा समृद्ध होने के बावजूद शंघाई में, ढाका जैसे आर्थिक तौर पर कम समृद्ध शहरों की तुलना में बाढ़ आने का ख़तरा कहीं अधिक पाया गया.

कोई शहर बाढ़ के लिहाज़ से कितना संवेदनशील है इसे जानने के लिए अध्ययन में शामिल शहरों की भौगोलिक विशेषताओं के अलावा उसके सामाजिक और आर्थिक तत्वों का भी ध्यान रखा गया.

इस अध्ययन के परिणाम नैचुरल हैज़र्ड्स नाम की पत्रिका में छपे हैं.

सामाजिक और आर्थिक आंकड़े

ब्रिटेन और नीदरलैंड्स के वैज्ञानिकों की एक टीम ने कोस्टल सिटी फ़्लड वलनरेबिलिटी इंडेक्स, सीसीएफ़वीआई, नाम का एक सूचकांक बनाया है.

किसी भी शहर में बाढ़ आने का कितना ख़तरा है और उससे निपटने के लिए उसमें कितना लचीलापन है, ये सूचकांक इन बातों के आधार पर बनाया गया है.

लीड्स युनिवर्सिटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के नाइजेल राइट इस अध्ययन के सह-लेखक हैं.

वे कहते हैं कि बाढ़ का ख़तरा मापने वाले मौजूदा तरीके ज़्यादातर द्विआयामी हैं.

नाइजेल कहते हैं, "कई बार हम ये देखते हैं कि भौगोलिक रूप से किसी शहर को बाढ़ का कितना ख़तरा है. तो अगर आप नदी के पास रहते हैं तो आपके लिए ये ख़तरा ज़्यादा है."

प्रोफ़ेसर राइट कहते हैं कि सीसीएफ़वीआई कई तरह के आंकड़े इस्तेमाल करता है जिनमें 19 घटक हैं.

"अगर आपकी उम्र 65 से ज़्यादा या 18 से कम है तो आपको एक व्यस्क की तुलना में बाढ़ से ज़्यादा ख़तरा है क्योंकि आप ख़ुद को बचाने के लिए ज़रूरी कदम नहीं ले सकते."

नाइजेल राइट, अध्ययन के सह-लेखक

उन्होंने बीबीसी को बताया, "इस सूचकांक में हम भौगोलिक आंकड़ों के साथ ही आर्थिक और सामाजिक आंकड़े भी देखेंगे. जैसे कि बाढ़ की स्थिति से निपटने के तरीकों में निवेश कर स्थानीय या राष्ट्रीय सरकारें अपने नागरिकों और उनकी संपत्ति की सुरक्षा पर कितना ध्यान देती हैं."

किसी शहर की आबादी का कितना प्रतिशत समुद्र तट के क़रीब रहता है, शहर को बाढ़ के बाद सामान्य होने में कितना समय लगेगा, तट के किनारे कितना अनियंत्रित विकास हुआ है और शहर में पानी घुसने से रोकने के कितने भौगोलिक उपाय किए गए हैं, ये सूचकांक इन सब बातों को मिलाकर नतीजों पर पहुंचता है.

प्रोफ़ेसर नाइजेल राइट ये भी कहते हैं कि ये सूचकांक सामाजिक संकेतों का भी अध्ययन करता है.

वे कहते हैं, "ऐसा भी हो सकता है कि कई लोग एक ही इलाके में रहते हैं लेकिन बाढ़ के प्रति उनकी संवेदनशीलता अलग-अलग हो."

इस बात को विस्तार से समझाते हुए राइट बताते हैं, "इसमें उम्र एक घटक है. अगर आपकी उम्र 65 से ज़्यादा या 18 से कम है तो आपको एक व्यस्क की तुलना में बाढ़ से ज़्यादा ख़तरा है क्योंकि आप ख़ुद को बचाने के लिए ज़रूरी कदम नहीं ले सकते."

वैश्विक प्रभाव

सीसीएफ़वीआई सूचकांक बाढ़ का ख़तरा मापने के लिए शहर की भौगोलिक स्थिति के साथ ही वहां की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर भी ध्यान देता है.

उन्होंने ये भी बताया कि बाढ़ के ख़तरे के प्रति किसी इलाके के रवैये में उसके पुराने अनुभवों की भी भूमिका होती है.

तेज़ी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्थाओं को बाढ़ के ख़तरे से निपटने के तरीकों को लागू करने की ज़रूरत नहीं पड़ी है क्योंकि इससे पहले उनके पास संरक्षित करने के लिए कुछ था ही नहीं.

नाइजेल राइट आगे कहते हैं, "दूसरी तरफ़ नीदरलैंड्स जैसे देश हैं जहां पहले भी बाढ़ आई हुई है जिनका असर उनकी अर्थव्यवस्था पर पड़ा है इसलिए उन्हें पता है कि उन्हें बाढ़ से बचना ही है."

हालांकि भौगोलिक तौर पर बाढ़ का असर स्थानीय होता है, लेकिन उसके आर्थिक परिणाम दुनिया भर में महसूस किए जाते हैं.

प्रोफ़ेसर राइट के मुताबिक, "जापान में सुनामी के बाद कंप्यूटर हार्ड डिस्क बनाने वाली कई कंपनियां बैंगकॉक चली गईं. फिर बैंगकॉक में बाढ़ आई और हार्ड डिस्क के दाम नाटकीय तौर पर बढ़ गए क्योंकि इन्हें बनाने वाले कारख़ाने बंद करने पड़े और हार्ड डिस्क की भारी कमी हो गई."

इस अध्ययन में नदियों के डेल्टा पर स्थित नौ तटवर्तीय शहरों को शामिल किया गया था. ये शहर थे शंघाई, ढाका (बांग्लादेश), कासाब्लैंका (मोरक्को), ब्यूएस आयर्स (आर्जंटीना), कोलकाता (भारत), और रॉटरडैम (नीदरलैंड).

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