|
वतन लौट रहे हैं ब्रिटेन में बसे भारतीय | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक नए अध्ययन के मुताबिक भारतीय मूल के क़रीब 32 हज़ार ब्रितानी युवा अब भारत में रह रहे हैं. इसे दोनों देशों के बीच पलायन की उल्टी धारा के रूप में देखा जा रहा है. दलबीर बेन्स के माता-पिता 1960 के दशक में एक बेहतर जीवन की तलाश में भारत छोड़कर इंगलैंड चले गए थे. एक साल पहले ही दलबीर बेन्स लंदन में ब्रिटिश होम स्टोर्स के निदेशक का पद छोड़कर भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई आ गईं. माता-पिता की राय न मानते हुए यहाँ उन्होंने अपना खुद का व्यवसाय शुरु किया. वो कहती हैं, "दरअसल इंग्लैंड में अब उतने बेहतर अवसर नहीं रहे. भले ही रहने के लिहाज़ से यह एक बहुत अच्छी जगह है लेकिन अवसरों की सही जगह तो भारत और चीन ही हैं." वो बताती हैं, "जब मैंने अपने माता-पिता के सामने भारत जाने का प्रस्ताव रखा तो वो आश्चर्यचकित थे. उनकी पीढ़ी के लोगों के लिए इंग्लैंड संभावनाओं की धरती था." दलबीर मानती हैं कि चूँकि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हो रही है इसलिए इससे बेहतर समय नहीं हो सकता था. शायद इसी वजह से ब्रिटेन में बसे दूसरे कई एशियाई परिवारों के युवा भी भारत में अवसर तलाश कर रहे हैं. तेज़ी से पलायन बाहर बसे लोगों के भारत लौटने में मदद करने वाली राइटर रिलोकेशन नाम की कंपनी के मुताबिक इस एक वर्ष में ही भारत आने के लिए जानकारी जुटाने वाले लोगों की तादाद में एक चौथाई बढ़ोत्तरी देखी गई. भारत लौट आए अजीत व्यास और यूसुफ़ हातिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. प्रोपर्टी कंसल्टेंट अजीत व्यास पिछले वर्ष ही लंदन से पुणे आकर बस गए थे. जन संपर्क के व्यवसाय से जुड़े यूसुफ़ ने भी मुंबई में आकर रहने का फ़ैसला किया. मॉडल से अभिनेता बने असद शान की कहानी तो और भी दिलचस्प है. ब्रिटेन में ही जन्मे और पले-बढ़े असद 2006 के शुरु में मुंबई रवाना हुए और उन्होंने तीन साल तक यहाँ इन्वेस्टमेंट बैंकर की तरह काम किया. इसके बाद वे अभिनय का प्रशिक्षण लेने तीन महीने के लिए न्यूयार्क गए और फिर से मुंबई के फ़िल्म उद्योग बॉलीवुड में भाग्य आजमाने मुंबई आ गए. ब्रिटिश एशियाई लोगों में से ज़्यादातर के लिए भारत घर नहीं होते हुए भी घर जैसा है और उन्हें यहाँ अच्छा भी लग रहा है. हालाँकि कुछ की शिकायत है कि उन्हें यहाँ पहचान के संकट से भी जूझना पड़ता है. | इससे जुड़ी ख़बरें ब्रिटेन आकर काम करना अब आसान15 दिसंबरजनवरी, 2001 | पहला पन्ना अवैध आप्रवासियों की समस्या का सच30 अप्रैल, 2005 | पहला पन्ना चुनाव में आप्रवासन है संवेदनशील विषय03 मई, 2005 | पहला पन्ना 'प्रवासन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ'22 जून, 2005 | पहला पन्ना ब्रिटेन की जनसंख्या छह करोड़ हुई24 अगस्त, 2006 | पहला पन्ना दुनिया में 19 करोड़ प्रवासी:संयुक्त राष्ट्र07 जून, 2006 | पहला पन्ना भारतीय युवाओं में विदेश जाने की ललक04 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||