मल्टीब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश को हरी झंडी

  • 15 सितंबर 2012

भारत सरकार ने मल्टीब्रांड खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत विदेशी पूँजी निवेश को मंजूरी दे दी है. भारत सरकार की आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने शुक्रवार को हुई एक बैठक में ये फैसला लिया.

इसी के साथ सार्वजनिक क्षेत्र की चार कंपनियों में भी विनिवेश को मंजूरी दे दी गई है.

सरकार के फैसले की जानकारी देते हुए वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने ये भी बताया कि इसी के साथ नागरिक उड्डयन क्षेत्र में 49 प्रतिशत के विदेशी पूँजी निवेश को स्वीकृति मिली है.

विरोध के सुर

गौरतलब है कि सत्ताधारी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के सहयोगी ममता बनर्जी की तृणमूल और मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी पहले भी सरकार के इस कदम के खिलाफ रहे हैं.

राजनीतिक तौर पर ये एक अहम फैसला है. प्रमुख विपक्षी दल भाजपा और वामपंथी दलों ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के डी राजा ने भारतीय चैनल एनडीटीवी से कहा," अंतरराष्ट्रीय सुपरमार्केट चेन गरीब किसानों और छोटे दुकानदारों के हितों पर प्रहार है. इससे लाखों लोगों की नौकरी चली जाएगी."

उधर मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ये बहुत ही जल्दबाजी में उठाया गया कदम है.

यही नही, सरकार की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने तीखा विरोध किया है. पार्टी नेता कुणाल घोष ने कहा कि यदि एफडीआई को वापस नहीं लिया गया तो तृणमूल किसी भी तरह का फैसला लेने के लिए तैयार हैं. तृणमूल की मंगलवार को बैठक होनी है जिसमें इस मुद्दे पर फैसला लिया जाएगा.

रिटेल में एफडीआई को मंजूरी दिए जाने के फैसले का बचाव करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना था , 'बड़े सुधारों का वक्त आ गया है, अगर हमें जाना भी पड़ा तो हम लड़ते हुए जाएंगे.' मनमोहन सिंह का ये भी कहना था कि एफडीआई से किसानों का फायदा होगा और नौकरियां भी बढ़ेंगी.

अब जैसे ही इस बारे में अधिसूचना जारी होगी , वैसे ही ये नीति लागू हो जाएगी. आर्थिक विश्लेषकों का आंकलन है कि सालाना बिक्री के हिसाब से भारत का खुदरा व्यापार लगभग 470 अरब डॉलर का है.

टेस्को-वॉलमार्ट जैसे सुपरमार्केट को अनुमति

आर्थिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि सरकार का ये कदम विदेशी पूँजी निवेश को दोबारा भारतीय बाजार की ओर लाने का अहम प्रयास है.

इस कदम से खुदरा व्यापार में सक्रिय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जैसे - टेस्को, वॉलमार्ट जैसी कंपनियों को भारत में अपने स्टोर खोलने की इजाज़त मिल जाएगी.

आनंद शर्मा ने इस बात को मानते हुए कहा, "इस कदम का मकसद अंतरराष्ट्रीय ब्रांड से विदेशी पूँजी निवेश पाना है. लेकिन राज्यों को इस कदम को लागू करने का फैसला खुद करना होगा."

पर्यवेक्षकों का कहना है कि इसका मतलब ये हुआ कि यदि कुछ राज्य इसका विरोध करते हैं तो वे इस फैसले के दायरे से बाहर रह सकते हैं.

भारत सरकार ने एक ब्रांड के खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूँजी निवेश को पहले ही हरी झंडी दिखा रखी है.

उस फैसले से जूतों की कंपनी रीबॉक, फ़र्नीचर की आइकिया, लाइफ़स्टाइल साज़ो-सामान की गुच्ची जैसे बड़े विदेशी ब्रांड्स भारत में पूरे मालिकाना हक़ के साथ दुकानें खोल पाने में सक्षम हो गए थे.

जब उस समय सरकार मल्टीब्रांड रिटेल का मंजूरी नहीं दे पाई थी तो उसकी उद्योग संगठनों ने कड़ी आलोचना की थी.

'रेटिंग एजेंसियों का दबाव'

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने एचडीएफसी बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ के हवाले से लिखा है, "यदि आप इसके कारणों की खोज कर रहे हैं कि ये सभी सुधार एक साथ किस तरह से पारित हो गए,तो ये रेटिंग एजेंसियों का दबाव है. यदि ये कायम रहता है और इसमें 'रोलबैक' नहीं होता, यानि फैसला वापस नहीं होता, तो खेल (रेटिंग एजेंसियों का दबाव हटाने का ) सही है."

एचडीएफसी बैंक के क्षेत्रीय अर्थशास्त्री समिरन चक्रबर्ती ने कहा, "इसका तत्काल असर कंपनियों और उपभोक्ताओं की भावनाओं को बेहतर करना होगा. सरकार की मंशा रेटिंग एजेंसियों को ढाढस बंधाने की है...कि वह सही कदम उठा रही है. इससे सरकार को समय मिल जाएगा और भारत की रेटिंग पर निर्णय लेने से पहले एजेंसियाँ वित्तीय घाटे के अंतिम आंकड़े का इंतजार करेंगी."

अर्नस्ट एंड यंग के रिटेल पार्टनर पिनाकी रंजन मिश्र ने रॉयटर्स को बताया, "अब उन राज्यों पर कोई दबाव नहीं है जो इस लागू नहीं करना चाहते हैं. इससे विपक्षी दलों और सरकार के उन सहयोगियों को शांत हो जाना चाहिए जो इस पर सरकार का विरोध कर रहे थे."

एक्सिस म्यूच्वल फंड के राजीव आनंद का कहना था, "ये सभी राज्यों में सर्वसम्मति बनने का इंतजार करने की जगह एक व्यावहारिक फैसला है. हो सकता है कि कुछ राज्यों इसे अभी लागू करें और कुछ इंतजार करना पसंद करें. जहाँ तक विनिवेश की बात है - कुल 15000 करोड़ रुपए का आंकड़ा सामने आता है, शायद ये पैसा सरकार काफी आसानी से विदेशी, घरेलू रिटेल और संस्थागत निवेश के जरिए अर्जित कर पाएगी."

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