क्या सरकार अलोकप्रिय फ़ैसलों के लिए तैयार है?

  • 14 सितंबर 2012
पेट्रोल पंप
सरकार ने लंबे समय़ तक लंबित रखने के बाद डीज़ल की क़ीमतें बढ़ाई हैं

केंद्र सरकार ने लंबे समय तक टालने के बाद आखिर गुरुवार की शाम डीज़ल की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी कर दी है और रसोई गैस के लिए कोटा लागू कर दिया है.

शुक्रवार की शाम को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक होनी है जिसमें विमानन और ब्रॉडकास्टिंग के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफ़डीआई और सात सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में विनिवेश यानी डिसइन्वेस्टमेंट का फ़ैसला होना है.

पिछले कुछ महीनों में सरकार पर आरोप लगे हैं कि वह नीतिगत फ़ैसले लेने से कतरा रही है. लेकिन डीज़ल और एलपीजी को लेकर हुए फ़ैसले के बाद चर्चा चल पड़ी है कि क्या सरकार ने अलोकप्रिय फ़ैसले लेने की शुरुआत कर दी है?

इनमें से कई फ़ैसले इसलिए लंबे समय से लंबित हैं क्योंकि सरकार इस पर अपने गठबंधन में सहमति नहीं बना पा रही है.

अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला का कहना है कि बढ़ते वित्तीय घाटे की वजह से सरकार को डीज़ल और एलपीजी का फ़ैसला तो लेना पड़ा है और इससे पॉलिसी पैरालिसिस थोड़ी टूटा है लेकिन ऐसा लगता नहीं कि इसमें सरकार दूर तक जा पाएगी.

उनका कहना है कि जहाँ तक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का सवाल है, सरकार को इसके लिए और अपनी छवि सुधारने के लिए जो करना होगा वह है तंत्र (यानी अधिकारियों और मंत्रियों) को सुधारना और इसमें सरकार की रुचि बिल्कुल नहीं दिखती.

क्या हैं लंबित फ़ैसले

टाइम के कवर पर मनमोहन
मनमोहन सिंह पर नीतिगत फ़ैसले न ले पाने के आरोप लग रहे हैं

सरकार को शुक्रवार को तीन अहम फ़ैसले करने हैं. एक विमानन के क्षेत्र में एफ़डीआई का. फ़िलहाल दूसरे व्यवसाय में लगी कंपनियों को घरेलू कंपनियों में 49 प्रतिशत निवेश की अनुमति तो है लेकिन विदेशी विमानन कंपनियों को इसकी अनुमति नहीं है.

दूसरा फ़ैसला होगा ब्रॉडकास्टिंग में एफ़डीआई की सीमा 74 प्रतिशत तक बढ़ाने की. अगर ये फ़ैसला होगा तो केबल और डीटीएच व्यवसाय में विदेशी कंपनियाँ सीधे निवेश कर सकेंगीं.

तीसरा फ़ैसला एमएमटीसी, सेल, हिंदुस्तान कॉपर, ऑइल इंडिया और नाल्को सहित सात सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के विनिवेश का है. इससे सरकार को बड़ी धनराशि मिलने की उम्मीद है.

इसके अलावा एक फ़ैसला रिटेल यानी खुदरा व्यापार में मल्टीब्रांड कंपनियों को अनुमति देने का है. हालांकि इस पर शुक्रवार को फ़ैसला नहीं होना है लेकिन ये भी सरकार की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर है.

केंद्र में सत्तारूढ़ यूपीए की प्रमुख घटक तृणमूल कांग्रेस ब्रॉडकास्टिंग और रिटेल में मल्टीब्रांड को अनुमति देने के सख़्त ख़िलाफ़ रही है. सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी इसके ख़िलाफ़ है.

इसी की वजह से सरकार रेल के यात्री भाड़े में बढ़ोत्तरी की तरह इसे टालती रही है.

क्या इससे अर्थव्यवस्था सुधरेगी?

अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला ने बीबीसी से हुई बातचीत में इस सवाल पर कहा कि डीज़ल और एलपीजी पर सरकार ने फ़ैसला किया उसके पीछे बढ़ता वित्तीय घाटा है.

वो कहते हैं, "सरकार को लगा कि अलोकप्रिय फ़ैसला तो है लेकिन अगर वित्तीय घाटा बढ़ेगा तो आगे रेटिंग घटेगी, निवेश घटेगा और इससे ज़्यादा नुक़सान होगा इसलिए सरकार ने राजनीतिक नुक़सान उठाने का फ़ैसला किया और आकलन किया है कि अगर ऐसा न किया गया तो ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ेगा."

उनका कहना है कि आगे आने वाले दिनों में सरकार इसे कितना जारी रख पाएगी इसमें अनिश्चितता दिखती है.

भरत झुनझुनवाला कहते हैं, "सरकार चूंकि अपने विदेशी मुद्रा कोष की स्थिति से चिंतित है इसलिए वह विनिवेश का फ़ैसला तो कर लेगी और इससे जनता का कोई सीधा सरोकार भी नहीं है, इसी तरह विमानन में एफ़डीआई से भी जनता को असर नहीं होने वाला है बस इससे माहौल थोड़ा बदलेगा कि चलो भारत में निवेश के अवसर खुल रहे हैं. इसलिए सरकार इन दोनों के साथ तो आगे बढ़ सकती है."

उन्होंने कहा, "लेकिन मुझे लगता है कि सरकार ब्रॉडकास्टिंग, और रिटेल में एफ़डीआई पर कोई फ़ैसला लेगी. इसके लिए सरकार को पहले ममता बनर्जी जैसे अपने सहयोगियों को साथ लेना होगा."

भरत झुनझुनवाला का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि सरकार इस स्थिति में है कि आने वाले दिनों में सरकार जनता पर और बोझ लाद पाएगी.

सरकार पिछले दिनों मनमोहन सिंह पर विदेशी मीडिया ने बहुत आरोप लगाए हैं, ऐसे में सरकार को अर्थव्यवस्था और अपनी छवि सुधारने के लिए कौन से क़दम उठाने होंगे, इस सवाल पर उन्होंने कहा, "जब तक सरकारी राजस्व का लीकेज नहीं रोकेंगे, सरकार की कार्यकुशलता नहीं सुधारेंगे और तंत्र यानी अधिकारियों और मंत्रियों को जवाबदेह नहीं बनाएंगे ऐसा होने वाला नहीं है. लेकिन सरकार की दिलचस्पी इसमें दिखती नहीं है."

उनका कहना है कि सरकार एफ़डीआई खोल लें, राजस्व घाटा कम कर ले और चाहे तो नोट छाप ले लेकिन अर्थव्यवस्था इससे सुधरने वाली नहीं है.

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