चीनी कंपनियां क्यों चली बांग्लादेश?

 गुरुवार, 30 अगस्त, 2012 को 20:26 IST तक के समाचार

चीनी उत्पादकों का कहना है कि अगर वे बांग्लादेश से कपड़ा लेते हैं तो कीमत 10 से 15 फीसदी तक कम हो सकती है.

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में सईद फैजुल एहसान की कपड़ों की फैक्ट्री है. इन दिनों उनके कदमों में अलग ही उछाल देखा जा सकता है.

उनकी फैक्ट्री में सैंकड़ों कारीगर एक विदेशी ग्राहक के लिए स्वेटर बनाने में जुटे हुए हैं.

यूँ तो ढाका में ऐसी हजारों फैक्ट्रियाँ हैं लेकिन एक बात है जो सईद फैजुल एहसान के कारखाने को अलग बनाती है.

यहाँ बन रहे स्वेटर अमरीका या यूरोपीय देशों को नहीं भेजे जा रहे जो बांग्लादेशी कपड़ों के लिए सबसे बड़े बाजार हैं. ये कपड़े चीन निर्यात किए जाएँगे.

चीन से बढ़ते ऑर्डर का मतलब है कि अमरीका और यूरोजोन में माँग में आई कमी के बावजूद फैजुल एहसान को चिंता करने की जरूरत नहीं है.

वे कहते है, “कुछ साल पहले तक मेरी फैक्ट्री से केवल पाँच फीसदी सामान चीन जाता था. अब ये 20 फीसदी हो गया है. मुझे उम्मीद है कि आने वाले सालों में ये और बढ़ेगा.”

उत्पादन लागत बढ़ी

ये सुनने में अजीब लग सकता है कि चीनी कंपनियाँ कपड़े बनाने के लिए बांग्लादेश का रुख कर रही हैं क्योंकि चीन कपड़ों के कारोबार में विश्व में अग्रणी है.

चीन के बदले रुख के पीछे कारण साफ है. फोर सीज़न्स लिमिटिड की रोसा डाडा चीन की कपड़ा कारोबारी हैं. वे कहती हैं कि चीन में कारीगरों के बढ़ते वेतन और उत्पादन मूल्य में बढ़ोत्तरी के कारण चीनी फैक्ट्रियाँ अब उतनी प्रतिस्पर्धी नहीं रहीं.

"हमारे कारखाने में कर्मचारियों की तनख्वाह पिछले कुछ सालों से लगातार बढ़ी है. अब ये 400 से 500 डॉलर प्रति महीना हो गई है. अगर मैं चीन में ही उत्पादन करती रही तो मेरा बिजनस खत्म हो जाएगा. जबकि बांग्लादेश में कारीगरों का वेतन 70 से 100 डॉलर प्रति माह है. अगर मैं यहाँ उत्पादन करती हूँ तो ज्यादा फायदा होगा."

रोसा डाडा, चीनी कारोबारी

रोसा डाडा पिछले दो सालों से कपड़ों की फैक्ट्री चला रही हैं.

हाल में जब वे बांग्लादेश आईं तो उन्होंने मुझे बताया, “हमारे कारखाने में कर्मचारियों की तनख्वाह पिछले कुछ सालों से लगातार बढ़ी है. अब ये 400 से 500 डॉलर प्रति महीना हो गई है. अगर मैं चीन में ही उत्पादन करती रही तो मेरा बिजनेस खत्म हो जाएगा. जबकि बांग्लादेश में कारीगरों का वेतन 70 से 100 डॉलर प्रति माह है. अगर मैं यहाँ उत्पादन करती हूँ तो ज्यादा फायदा होगा.”

रोसा डाडा ने ढाका में अपना दफ्तर खोल लिया है. वे न सिर्फ अपनी कंपनी के लिए ऑडर के अवसर ढूँढ रही हैं बल्कि दूसरे चीनी ऑनलाइन रिटेलरों को भी बांग्लादेश से काम करवाने के लिए जुटा रही हैं.

ड्यूटी फ्री पहुँच

चीनी उत्पादकों का कहना है कि अगर वे बांग्लादेश से कपड़ा लेते हैं तो कीमत 10 से 15 फीसदी तक कम हो सकती है.

बांग्लादेश के कपड़ा निर्यातक बताते हैं कि उन्हें इस बात का भी फायदा मिलता है कि उनके 90 फीसदी से ज्यादा कपड़ों की चीनी बाजार में ड्यूटी फ्री पहुँच है.

कम मेहनताना और ड्यूटी फ्री पहुँच का मतलब है कि चीन से माँग बढ़ेगी. कुछ साल पहले चीन में बांग्लादेशी निर्यात एक करोड़ 90 लाख डॉलर था जो पिछले साल दस करो़ड़ डॉलर हो गया है.

एच एंड एम जैसे पश्चिमी ब्रैंड भी चीनी ग्राहकों के लिए बांग्लादेशी फैक्ट्रियों में कपड़े बना रहे हैं. ऐसे में विकास की काफी संभावना है लेकिन ये आशंका भी है कि ये आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो पाएँगी.

कारीगरों का वेतन बना मुद्दा

बांग्लादेश में बेहतर वेतन की मांग उठाने के लिए कई बार प्रदर्शन हुए हैं, इनमें से कई ने हिंसक रूप भी ले लिया.

बांग्लादेश में चरमराता आधारभूत ढाँचा और राजनीतिक अस्थिरता कपड़ा उत्पादकों के लिए चिंता का विषय रहा है. इसके अलावा पिछले कुछ महीनों में कारीगरों ने बेहतर वेतन की माँग करते हुए हिंसक प्रदर्शन भी किए हैं.

मजदूर संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि बांग्लादेशी कपड़ा कारीगरों को दुनिया के बाकी कारीगरों के मुकाबले काफी कम पैसा मिलता है.

कई पश्चिमी संस्थाओं के विरोध के बाद वालमार्ट जैसी कंपनियों ने बांग्लादेशी फैक्ट्रियों से वेतन बढ़ाने के लिए कहा है.

लेकिन बांग्लादेशी उद्योगपति मानने के लिए तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि वेतन अभी बढ़ाए गए हैं, अगर तनख्वाह और बढ़ाई गई तो उद्योग प्रतिस्पर्धी नहीं रहेगा.

लेकिन जैसे-जैसे बांग्लादेश चीन के मुकाबले कम लागत वाला विकल्प बनकर उभरने की कोशिश करेगा, स्थानीय कारीगरों की स्थिति पर भी दुनिया की पैनी नजर रहेगी.

उद्योग को प्रतिस्पर्धा, ग्राहकों की तसल्ली और कारीगरों की माँगों के बीच तालमेल बिठाना होगा. ये कपड़ा उद्योग के लिए मुश्किल चुनौती होगी.

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