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तो कितना है दुनिया का औसत वेतन?

 बुधवार, 4 अप्रैल, 2012 को 17:51 IST तक के समाचार
कुल वेतन

प्रक्रिया में काफ़ी खामियाँ हैं लेकिन फिलहाल इसे प्रामाणिक माना जाता है

अगर कोई अमीर या गरीब न होता और सभी की तनख्वाहें एक बराबर होती तो आखिर कितनी होती सबकी औसत तनख्वाह.

दुनियाभर का सालाना कुल आय 70 खरब डॉलर के करीब आंका जा रहा है. माना जाता है कि दुनिया में सात अरब लोग हैं, लिहाजा आसानी से हिसाब लगाया जा सकता है कि प्रति व्यक्ति औसत आय दस हजार डॉलर के करीब पहुंचेगा.

लेकिन इन सात अरब लोगों में शामिल लोगों की एक बड़ी जमात के पास नौकरी नहीं है, कई बच्चे भी है.

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तो अब शायद आप पूछेंगे कि, “दुनिया की औसत आय क्या है?”

इसका जवाब देना काफी कठिन है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन से जुड़े अर्थशास्त्रियों ने इसका पता लगाने की कोशिश की है. हालांकि इससे जुड़ी जानकारियां अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है.

गणना की प्रक्रिया

आइए एक नजर डालते है गणना की उस प्रक्रिया पर जिसे आइएलओ के अर्थशास्त्रियों ने आधार बनाया.

प्रक्रिया के तहत सबसे पहले वो दुनियाभर के देशों की कुल तनख्वाहें पता करते है.

इसके लिए उन्हें देशो के सांख्यिकी विभागों से औसत वेतन से जुड़े आंकड़े जुटाने पड़ते है जिसका गुणा देश में कमाऊ लोगों की कुल संख्या से किया जाता है.

इस तरह से वो उन देशों को ज्यादा वजन दे पाते हैं जहा ज्यादा काम करने वाले लोग रहते हैं. चीन की औसत तनख्वाह न्यूजीलैंड के मुकाबले ज्यादा दिखती है, क्योंकि वहां चीन के मुकाबले कम लोग रहते हैं.

अर्थशास्त्रियों के पास जब देशों की औसत तनख्वाह के आंकड़ें आ जाते हैं तो उन्हें जोड़कर कुल योग का भाग दुनियाभर के कमाऊ लोगों की कुल संख्या से कर दिया जाता है.

इससे जो नतीजा आता है वो हमारे सवाल की जवाब है. दुनिया भर की औसत माहवार तनख्वाह 1480 डॉलर है यानी कि 18000 डॉलर प्रति वर्ष.

हालांकि औसत तनख्वाहों की ये गणना आम डॉलरों में नहीं की जाती है. ये डॉलर खरीदने की क्षमता यानि की पर्चेसिंग पावर पैरिटी पर आधारित है.

खर्च

सालाना 18000 डॉलर की औसत वेतन आपको काफी अधिक लग सकती है. हालांकि अगर वैश्विक स्थिति देखी जाए तो पता चलता है कि दुनिया की एक तिहाई से ज्यादा की आबादी दो डॉलर प्रतिदिन के खर्च पर चलती है.

अगर सच्चाई देखे तो पता चलता है कि आईएलओ के अर्थशास्त्रियों को अधूरे आंकड़ों से काम चलाना पड़ा है. कई देशों के आंकड़े उपलब्ध नहीं है, यहां तक कि नाइजीरिया जैसे देशों के भी आंकड़े नही हैं. इसके अलावा ये भी गौर करने वाली बात है कि आइएलओ ने अपने शोध में केवल कमाऊ लोगों को शामिल किया है.

"मेरा मानना है कि ये शोध जाहिर तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास के बारे में काफी कुछ बताता है. हम इस संदर्भ में हमेशा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का प्रयोग करते हैं, लेकिन जीडीपी को समझना मुश्किल काम रहा है. वही वेतन जीवन की गुणवत्ता पता करने का ज्यादा सटीक उपाय है"

पैट्रिक बेल्सर, आईएलओ के अर्थशास्त्री

अर्थशास्त्रियों ने कई ऐसे लोगों को छोड़ दिया है जो गरीबी के आंकड़ों में तो शामिल हैं लेकिन औसत वेतन की गणना में नहीं, जैसे कि पेंशन पाने वाले, बच्चे, यहां तक कि स्वरोजगार से कमाने वाले भी इससे बाहर हैं.

स्वरोजगार से कमाने वाले लोगों की संख्या काफी अधिक है.

विकसित देशों में काम करने वाले 90 फीसदी लोग वेतन पर काम करने वाले लोग है, लेकिन विकासशील देशों में ये आंकड़ा काफी कम है.

एक उदाहरण के तौर देखे तो दक्षिण एशिया में केवल 25 फीसदी लोग वेतन पर निर्भर करते हैं, बाकी किसान हैं या स्वरोजगार से कमाते हैं.

लेकिन आइएलओ के एक अर्थशास्त्री पैट्रिक बेल्सर का मानना है कि दुनिया के औसत वेतन की गणना करना मेहनत का काम है.

उनके अनुसार, “मेरा मानना है कि ये शोध जाहिर तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के विकास के बारे में काफी कुछ बताता है. हम इस संदर्भ में हमेशा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का प्रयोग करते हैं, लेकिन जीडीपी को समझना मुश्किल काम रहा है. वही वेतन जीवन की गुणवत्ता पता करने का ज्यादा सटीक उपाय है.”

बेल्सर का मानना है कि अगर लोग इन आंकडों का दायरा समझें तो ये औसत वेतन के बारे में काफी हद तक सटीक झलक दिखाता है.

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