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'बजट से ज़्यादा उम्मीदें रखना ठीक नहीं'

 मंगलवार, 13 मार्च, 2012 को 12:19 IST तक के समाचार
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी

सरकार जिस तरह के मुश्किल आर्थिक और राजनीतिक संकटों से जूझ रही है उन्हें देखते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का काम काफ़ी मुश्किल है.


भारत में वित्त मंत्री द्वारा बजट पेश करना मात्र खातों का लेखाजोखा नहीं होता बल्कि ये मौका सरकार की व्यापक नीतियों को देश के सामने रखने का भी होता है.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन, यूपीए, सरकार जिस तरह के मुश्किल आर्थिक और राजनीतिक संकटों से जूझ रही है, उन्हें देखते हुए इस साल 16 मार्च को पेश किए जाने वाले बजट की ख़ास अहमियत है.

इसलिए इस बजट को यूपीए के इम्तिहान के तौर पर भी देखा जा रहा है जिससे पता चलेगा कि क्या सरकार में वित्तीय वर्ष 2011-12 की तीसरी तिमाही में 6.1 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच चुकी विकास दर वाली अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए आर्थिक सुधार लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है.

किसी को भी, यहां तक कि प्रधानमंत्री के प्रतिष्ठित आर्थिक सलाहकारों, को भी उम्मीद नहीं थी कि अक्तूबर-दिसंबर 2011 के दौरान सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी, 6.1 प्रतिशत के नाटकीय स्तर तक गिर जाएगा. इससे पहले की दोनों तिमाहियों में औसत जीडीपी की दर 7.3 प्रतिशत रही थी और इसके आधार पर ही प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद ने पिछले महीने, पूरे वित्त वर्ष के लिए 7.1 प्रतिशत जीडीपी विकास दर का अनुमान दिया था.

हालांकि अब 7.1 प्रतिशत विकास दर हासिल करना बहुत मुश्किल लगता है क्योंकि चालू वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही में जीडीपी के निराशाजनक प्रर्दशन की वजह से सालाना सकल घरेलू उत्पाद भी गिर कर लगभग 6.5 प्रतिशत रह जाएगा.

मुश्किल राह

इस वजह से वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का काम और भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि घटती जीडीपी के चलते राजस्व वृद्धि जैसे बजट के अन्य मुख्य अनुमान भी गड़बड़ा सकते हैं. अगर अर्थव्यवस्था वांछित रफ़्तार से नहीं बढ़ती, ऐसे में सरकार को किस तरह के करों से उसके अनुरूप राजस्व मिलेगा ताकि वो उन कल्याणकारी कार्यक्रमों को लागू कर सके जिसकी प्रति उसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता है.

प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि जिस तरह से सरकार विभिन्न उत्पादों पर साल-दर-साल सब्सिडी अदा कर रही थी, उससे उनकी रातों की नींद उड़ गई है. अगर तेल पर दी जा रही अप्रत्यक्ष सब्सिडी की बात करें, तो इस वर्ष राजकोषीय घाटा, सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत हो सकता है जबकि बजट में इसे 4.6 प्रतिशत के स्तर पर तय किया गया था.

विडंबना ये है कि सरकार द्वारा उपभोक्ताओं के लिए डीज़ल, मिट्टी का तेल, खाना पकाने की गैस और पेट्रोल पर दी जा रही 50 प्रतिशत तेल सब्सिडी असल में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के हिस्से में जा रही है. मध्यवर्ग के खाने पकाने की गैस और डीज़ल की गाड़ियों को सरकार क्यों सब्सिडाइज़ कर रही है, इस बात का कोई तर्कसंगत कारण नहीं है.

बढ़ती सब्सिडी

इस साल तेल पर दी गई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडी लगभग 30 अरब डॉलर तक जा सकती है जबकि 2009-10 में ये 10 अरब डॉलर से कम थी. ये आंकड़ा तीन साल में तिगुना इसलिए हो गया है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती गई हैं और राजनीतिक मजबूरियों के चलते सरकार तेल के घरेलू दाम उस हिसाब से नहीं बढ़ा पाई है. इसलिए तेल की घरेलू कीमत लंबे समय तक अनियमित रहती है और ख़ासकर तब जब विधानसभा चुनाव आने वाले हों. तेल पर दी जा रही सब्सिडी सरकारी कोष के घटने का एकमात्र सबसे बड़ा कारण है. खाद्य पदार्थ और उर्वरक पर दी जा रही सब्सिडी की कीमत 20 अरब डॉलर है और ये सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित करने के बाद आगे और भी ज़्यादा हो जाएगी.


एक और चिंता की बात ये है कि अगर तेल की घरेलू कीमत अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुरूप हो जाएंगे, इससे 8-8.5 प्रतिशत स्तर पर मौजूद मंहगाई दर 3.6 प्रतिशत तक बढ़ सकती है. इसलिए तेल सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के खाते में डाल कर सरकार महंगाई दर को काफ़ी कम कर रही है.

यानी आर्थिक स्थिति असल में बहुत स्थिर नहीं है और ये बजट इस पृष्ठभूमि में तैयार किया जा रहा है.

हाल के वर्षों में खनन क्षेत्र में नकारात्मक बढ़ोतरी हुई है.

इस सब के बावजूद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशक इस बजट से राजकोषीय समेकन, सब्सिडी पर लगाम लगाने और राजस्व कमाने के नए तरीकों की उम्मीद कर रहे हैं. सरकार के लिए ये काफ़ी ऊहापोह की स्थिति है.

घटता निजी निवेश और खपत

आंकड़े दिखाते हैं कि 2008 में 36 प्रतिशत की तुलना में बचत दर लगातार घटकर सकल घरेलू उत्पाद का 32 प्रतिशत ही रह गई है. अर्थव्यवस्था में निजी निवेश की दर गिर कर इकाई अंक में ही रह गई है. कई विश्लेषकों का मानना है कि कंपनियों द्वारा निजी निवेश में इस कदर गिरावट, सरकार की नीति निष्क्रियता की वजह से पैदा हुई निराशा है. हाल के वर्षों में कोयले और अन्य खनिजों के खनन में नकारात्मक विकास इसका उदाहरण है. अगर कोयले का उत्पादन कम हो रहा है तो अर्थव्यवस्था किस तरह से बढ़ सकती है?

निजी निवेश के साथ ही खपत में भी कमी आने के संकेत हैं. याद दिला दें कि 2008 में वैश्विक आर्थिक संकट के दो साल बाद भारत के ग्रामीण इलाकों में खपत काफ़ी ठोस थी. इसकी वजह से ही भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2010-11 में 8.4 प्रतिशत रहा. लेकिन अब खपत में कमी दिखाई दे रही है. वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को बजट बनाते समय इस बारे में भी सोचना होगा.

निर्भीक कदमों की ज़रूरत

इसलिए अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए यूपीए सरकार को कुछ कड़े और साहसी कदम उठाने होंगे. लेकिन क्या सरकार ऐसा कर पाएगी? खुदरा क्षेत्र में विदेश निवेश जैसे कई निर्णय, जिन्हें सरकार ने उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों तक टाल दिया था, सरकार को ऐसे निर्णय फिर से लेने होंगे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा भी था कि उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मामले पर फिर से विचार होगा.

बाज़ार को इस और इस जैसे अन्य आर्थिक सुधारों की उम्मीद है.

लेकिन ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि गुड्स एंड सर्विसिज़ टैक्स, जीएसटी, जैसे आर्थिक सुधारों को क्षेत्रीय दलों और मुख्य विपक्षी दल, बीजेपी, का समर्थन नहीं मिलेगा. साथ ही हाल ही में हुए पंजाब और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन के चलते यूपीए के घटक दलों सहित कई क्षेत्रीय दलों में भी मध्यावधि लोकसभा चुनावों के बारे में कयास लगने शुरु हो गए हैं. केंद्रीय रेल मंत्री, तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी, ने कहा है कि मौजूदा राजनीतिक हालातों में ऐसे सुधारों को लागू करना मुश्किल हो सकता है जिनके लिए व्यापक राजनीतिक सहमति की ज़रूरत है.

ऐसे हालातों में आने वाले भारतीय बजट से ज़्यादा उम्मीदें न रखी जाएं, यही ठीक होगा.

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