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भारतीय कॉल सेंटरों से अमरीका में 'फर्जी वसूली'

 गुरुवार, 23 फ़रवरी, 2012 को 05:30 IST तक के समाचार
एक कॉल सेंटर (फ़ाइल फोटो)

अमरीका और यूरोप के कारोबार का खासा बड़ा हिस्सा भारतीय कॉल सेंटर संभालते हैं

भारतीय कॉल सेंटरों से फोन कॉल कर अमरीकियों से करोड़ों डॉलर की फर्जी कर्ज वसूली का घोटाला सामने आया है.

फेडरल ट्रेड कमीशन (एफटीसी) ने मंगलवार को बताया कि भारत से की गई दो करोड़ से ज़्यादा फोन कॉलों के ज़रिए वर्ष 2010 से 2012 के बीच अब तक लगभग 80 लाख अमरीकियों से करीब 50 लाख डॉलर वसूले गए हैं.

एक और अनुमान के मुताबिक प्रति कॉल 300 डॉलर से लेकर दो हज़ार डॉलर तक की मांग की गई.

एफटीसी ने कहा है कि उसने कैलिफोर्निया-स्थित दो कंपनियों को बंद कर दिया है जिन्होंने एक भारतीय कॉल सेंटर के ज़रिए पिछले दो साल में अमरीकियों को 50 लाख डॉलर से ज़्यादा का चूना लगाया.

मंगलवार को एफटीसी के कहने पर शिकागो की एक अदालत ने वरांग के ठाकेर नाम के व्यक्ति और अमरीकन क्रेडिट क्रंचर्स, एलएलसी और ईबीज़ एलएलसी, नाम की उसकी दो कंपनियों की संपत्तियों को सील कर दिया है.

हालांकि इस मामले में अब तक आपराधिक आरोप तय नहीं किए गए हैं.

लॉस एंजेलिस टाइम्स अख़बार के मुताबिक मंगलवार को अमरीकन क्रेडिट क्रंचर्स के फोन काम नहीं कर रहे थे और कंपनी की वेबसाइट बंद हो गई है.

जानकारियों का दुरुपयोग

एफटीसी का आरोप है कि ये कंपनियां भारतीय कॉल सेंटरों की मदद से अमरीका में लोगों को फोन करती थीं जिसमें फोन करने वाला व्यक्ति ख़ुद को कानूनी अधिकारी या कोई और सरकारी अधिकारी बताता था.

फिर वो व्यक्ति लोगों को हिरासत में लेने या नौकरी से हटाने या फिर उन पर मुकदमा चलाने की धमकी देकर उनसे कर्ज चुकाने के लिए कहता था.

"घोटाले में शामिल लोगों को अमरीकियों के बारे में जानकारी 'पे डे' लोन वेबसाइटओं से मिलती थीं. इनका निशाना ऐसे लोग भी थे जिन्हे कर्ज चाहिए था और इसके लिए उन्होंने इन 'पे डे' वेबसाइटों में निजी जानकारी दर्ज की थीं"

स्टीवन बेकर, एफटीसी के अधिकारी

लेकिन इन कंपनियों ने न तो कोई कर्ज दिए थे और न ही उन्हें कर्ज वसूलने का अधिकार था.

एफटीसी अधिकारी स्टीवन बेकर का कहना था, "घोटाले में शामिल लोगों को अमरीकियों के बारे में जानकारी 'पे डे' लोन वेबसाइटओं से मिलती थीं. इनका निशाना ऐसे लोग भी थे जिन्हे कर्ज चाहिए था और इसके लिए उन्होंने इन 'पे डे' वेबसाइटों में निजी जानकारी दर्ज की थीं."

पे डे कर्ज आमतौर पर कम राशि के, कम समय के लिए दिए कर्ज होते हैं जिनकी ब्याज दर बहुत अधिक होती है. ये कर्ज अगले महीने की तनख्वाह की एवज़ में दिया जाता है.

एफटीसी का कहना है कि जनवरी 2010 से ठाकेर की कंपनियों ने ऐसे लोगों के कर्ज आवेदनों से किसी तरह से उनकी निजी जानकारी हासिल कर ली और उसे इस्तेमाल कर इन लोगों से पैसा वसूलने की कोशिश की.

निर्दोष भी शिकार

एक कॉल सेंटर (फ़ाइल फोटो)

एफटीएस मामले की जाँच के लिए भारत सरकार से मदद मांगने की तैयारी कर रहा है

इस घोटाले का शिकार ऐसे लोग भी हुए जिन्हें मालूम था कि उन्होंने कोई कर्ज नहीं लिया था या फिर उनका कर्ज का आवेदन खारिज कर दिया गया था. लेकिन फिर भी उन्होंने पैसा दिया क्योंकि वे संभावित गिरफ़्तारी या शर्मनाक स्थिति से बचना चाहते थे.

अमरीकी फेडरल और राज्य क़ानूनों के तहत सभी वैध कर्ज वसूलने वाली कंपनियों को लोगों को लिखित नोटिस देना अनिवार्य है जिसमें लेनदारों के नाम, कर्ज की राशि, देनदार के अधिकारों के बारे में जानकारी होनी चाहिए.

एफटीसी ने अपनी वेबसाइट पर ऐसे नकली कर्ज वसूलने वालों के बारे में चेतावनी दी है.

एफटीसी अधिकारी स्टीवन बेकर का कहना है कि इस मामले में अब भी कई अनसुलझे सवाल हैं, मसलन, फोन करने वाले लोगों को पे डे कर्जों के बारे में इतनी ज़्यादा जानकारी कैसे मिली.

उनका कहना था कि मामले को सुलझाने के लिए अमरीकी सरकार को भारत की मदद चाहिए क्योंकि माना जा रहा है कि ये झूठी फोन कॉल्स भारतीय कॉल सेंटरों से की जा रही थीं.

ये भी कहा जा रहा है कि ठाकेर ने अपनी कंपनी के खातों से घोटाले के शिकार लोगों से लूटे गए हज़ारों डॉलर निकाल लिए हैं.

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