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भारत-पाक व्यापार क्यों है ज़रुरी?

 शनिवार, 18 फ़रवरी, 2012 को 19:21 IST तक के समाचार

भारत के व्यापार मंत्री आनंद शर्मा और पाकिस्तान के व्यापार मंत्री मख़्दूम अमीन फ़हीम ने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के तरीकों पर बातचीत की.

भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले हफ़्ते आपसी व्यापार के मुद्दे पर मंत्रिस्तरीय बातचीत हुई, जिसमें भारत के व्यापार मंत्री आनंद शर्मा के साथ साथ कई बड़े व्यापारिक घरानों के प्रमुख भी पाकिस्तान पहुँचे.

पाकिस्तान की ओर से वहाँ के व्यापार मंत्री मख़्दूम अमीन फ़हीम ने बातचीत में हिस्सा लिया.

पाकिस्तान में जमात उद- दावा जैसे कट्टरपंथी संगठनों ने इस बातचीत से पहले एक विशाल रैली करके भारत के साथ व्यापार का विरोध किया था. इस बीच व्यापार की बातचीत में जो शब्द बार बार सुनाई पड़ता है वो है मोस्ट फेवर्ड नेशन अर्थात एमएफएन.

इस बीच भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार बढ़ाने की आवश्यकता और इसमें आ रही अड़चनों पर बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी ने बात की भारत-पाकिस्तान व्यापार मामलों की जानकार प्रोफ़ेसर निशा तनेजा से. प्रस्तुत हैं कुछ अंश:

व्यापारिक कोशिशों के बाद दोनों देशों ने क्या हासिल किया?

बहुत कुछ हासिल किया है. आप ये समझिए कि ऐसी नींव पड़ गई है कि अब दोनों देश तेजी से आगे बढ़ेंगे और व्यापार के जरिए हम शांति की ओर आगे बढ़ेंगे.

कौन सी चीजें हैं जिन्हें दोनों देश हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं?

भारत चाहता है कि हम जो चीज बनाते हैं और दूसरे देशों को बेचते हैं, उन्हें पाकिस्तान को भी बेचें. और, पाकिस्तान ने भारतीय चीजों पर काफी सालों से रुकावट डाली है.

पाकिस्तान का कहना है कि वे सिर्फ 1960 उत्पादों को लेंगे जिनकी लिस्ट उन्होंने बनाई है. ये लिस्ट सिर्फ भारत के लिए उन्होंने बनाई है दूसरे देशों के लिए नहीं. भारत को सदा ये मलाल रहता है कि पाकिस्तान और वस्तुओं के व्यापार की अनुमति क्यों नहीं दे रहा है.

पाकिस्तान काफी सालों से यह भी कह रहा है कि जब तक कश्मीर का मामला हल नहीं हो जाता तब तक वो भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा नहीं दे सकता है.

यहां आप मोस्ट फेवर्ड नेशन के बारे में विस्तार से बताएं, क्योंकि नाम से इसका अर्थ स्पष्ट नहीं होता और इसे लेकर पाकिस्तान में भी बड़ा भ्रम है.

ये असल में विश्व व्यापार संगठन का दिया हुआ शब्द है जिसका अर्थ है कि जो ट्रीटमेंट आप एक देश को देंगे, वही दूसरे को भी देंगे, यानी यदि किसी वस्तु पर हमारा टैरिफ या आयात शुल्क जो है उसे एमएफएन में शामिल सभी देशों को दिया जाएगा.

पाकिस्तान में इसको लेकर काफी विवाद है कि भारत को एमएफएन का दर्जा दिया जाए या नहीं. इसके अलावा एक नेगेटिव लिस्ट की भी बात होती है.

ये नेगेटिव लिस्ट क्या है?

नेगेटिव लिस्ट का मतलब ये है कि ऐसी चीज़ें जो वो भारत से न लें. मोटे तौर पर हम पाकिस्तान को ज्यादातर कच्चा माल भेजते हैं.

हालांकि पाकिस्तान हमसे सारे आइटम नहीं लेता है, फिर भी निर्यात, आयात से ज्यादा है. हमने एमएफएन का दर्जा दिया हुआ है उन्हें और उनसे सारे आइटम लेते हैं, इसके बावजूद हमारा निर्यात ज्यादा है.


पान के निर्यात को लेकर क्या विवाद है...सुनने में आता है कि पान को ग़ैर कानूनी तरीके से वहां पहुंचाया जाता है?

जी हां, पान भी नेगेटिव लिस्ट में है इसीलिए गैर कानूनी तरीके से पहुंचाया जाता है. यही नहीं, हल्दीराम की नमकीन खुले आम बिकती है. मैंने खुद बाजारों में देखा है.

हिन्दुस्तान में बना गुटखा हिन्दी नाम से कराची के बाजारों में बिकता है. जबकि हिन्दी वहां नजर नहीं आती है. तो क्या लगता है कि व्यापार के जरिए दोनों देशों के बीच तनाव कम हो सकता है?

अवश्य कम हो सकता है. इसमें दोनों तरफ से कदम उठाना होगा. एक तो पाकिस्तान को भारत को एमएफएन का दर्जा देकर व्यापार के दरवाजे खोलने होंगे और दूसरे भारत सरकार के लिए एक कदम उठाना बहुत जरूरी है. और वो ये कि वीजा प्रक्रिया को आसान करना होगा.

हम हर पाकिस्तानी को चरमंपथी समझ के उसे रोक नहीं सकते. ऐसा करने से दोनों देशों के रिश्तों में काफी बदलाव आएगा.

इस बार वाणिज्य मंत्री के साथ बहुत बड़ा प्रतिनिधिमंडल गया उसमें बड़े-बड़े व्यापारिक घरानों के लोग गए. इससे क्या कुछ ठोस हासिल हुआ? क्योंकि जो तीन समझौते हुए हैं, उनसे तो ये लगता नहीं.

देखिए, कुछ हासिल होने में अभी समय लगेगा. जब तक विश्वास बहाली नहीं होगी, वीज़ा नहीं खुलेगा, व्यापार नहीं बढ़ेगा, तब तक कुछ हासिल करना थोड़ा मुश्किल है.

क्या कट्टरवादी तत्व इस रास्ते में अड़चन डाल सकते हैं?

ऐसी आशंका बहुत से लोगों को है. लोग ये नहीं समझ पा रहे हैं कि पिछले आठ सालों से धीरे-धीरे हमने बहुत कुछ हासिल किया है. पहले 2000 में सिर्फ छह सौ आइटम ही पॉजिटिव लिस्ट में थे, आज 1960 आइटम हैं.

हमारा एक शिपिंग प्रोटोकॉल था, जिसके तहत एक दूसरे के जहाज़ उनकी सीमाओं में नहीं जा सकते थे. वर्ष 2005 में वो खुला. सड़क मार्ग था, वो खुला. तो इस तरह के कई बड़े कदम पिछले आठ सालों में लिए गए हैं जिन्हें लोग जानते नहीं हैं.

इन आठ सालों में इतनी नींव तैयार हो गई है तो कोई अड़चन आनी होती तो अब तक आ चुकी होती. इसलिए उम्मीद अच्छी दिख रही है.

जो विरोध-सभा कर रहे हैं जमात उद- दावा जैसे संगठन, तो ये सिर्फ राजनीति कर रहे हैं या इनका कोई असर भी होगा.

देखिए जब समझौता ब्लास्ट हुए थे, मुंबई हमला हुआ था तो सभी ये कह रहे थे कि अब बातचीत रुक जाएगी, व्यापार रुक जाएगा.

बावजूद इसके दोनों देशों ने व्यापार के रास्ते खोले. रुकावटें पैदा करने की कोशिशों के बावजूद. इसके लिए पाकिस्तान और भारत दोनों ही देशों को श्रेय देना चाहिए.

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